October 24, 2010

इन आवाज़ों को शक्ल मिलने की दुआ करता हूँ

विकीलीक्स द्वारा सार्वजनिक की गई रपट के प्रति विश्व समुदाय को लम्बे समय से जिज्ञासा थी. पेंटागन और विकी के बीच पिछले कई सालों से इन तथ्यों को उद्घाटित किये जाने को लेकर कशमकश जारी थी. चार महीने पहले कुछ तस्वीरों के सार्वजनिक किये जाने के बाद अमेरिकी प्रशासन ने 'राष्ट्र हित' को ध्यान में रखने का बड़ा ही मार्मिक और देशभक्ति पूर्ण इमोशनल अनुरोध भी किया था कि विकी को अमेरिकी करतूतों को सार्वजनिक नहीं करना चाहिए. वे तस्वीरें ईराक में मानवीयता का गला रेत रहे गोरे, दम्भी और अमानुषिक अत्याचारों की थी.

युद्ध अपराध से सम्बंधित जो दस्तावेज़ विकीलिंक्स पर सार्वजनिक किये गए हैं, उनका सत्य अमेरिका के इतिहास जितना ही पुराना है. ये साम्राज्यवादी चरित्र के असली चेहरे की घूंघट से दिख रही एक धुंधली सी छवि है. दुनिया पर काबिज हो जाने के लिए जंगल के कानून से भी बदतर तरीकों वाला ये साम्राज्यवादी अभियान समाज में नस्लभेद, जाति और चमड़ी के रंग के भेद को खुले आम बढ़ावा देता हुआ नस्लीय घृणा का सबसे बड़ा पोषक है. ज़मीन और समुद्र के बीच अपने अड्डे बनाते हुए दुनिया को अपने रहम और करम से पालने के इरादे से भी आगे उसे अपना गुलाम बनाने की ओर अग्रसर है. शोषण और खून खराबे वाली इस संस्कृति के बारे में जानने के लिए विकी की रिपोर्ट रौशनी की एक किरण मात्र है. वास्तविकता को हम कभी नहीं जान पाएंगे क्योंकि राजनीति विज्ञान और समाज शास्त्र का पाठ्यक्रम निर्धारित करने वाले लोग आज भी वही गेंहू खा रहे हैं जो मछलियों को डाल दिये जाने बाद बचा रह गया है और उसके निस्तारण के लिए तीसरी दुनिया के सिवा कोई ठिकाना बचा नहीं है.

विकी के दस्तावेज़ कोई नई कहानी नहीं कह रहे हैं. उनके अध्ययन से सिर्फ एक पंक्ति का नतीजा निकाला जा सकता है कि इस बर्बर व्यवस्था का अंत होना मानव समाज का पहला लक्ष्य होना चाहिए. मैं उन देशों के नाम नहीं लेना चाहूँगा जिन्होंने पिछले पचास बरसों से अमेरिका के पड़ौस में रहते हुए उसके पिछवाड़े पर लात लगा रखी है. वे देश सम्मान का जीवन जीने का प्रयास कर रहे हैं. उनके कोई मुआमले संयुक्त राष्ट्र में लंबित नहीं है. उन्होंने अपने अपने कश्मीरों को ताल ठोक कर खुद का बता रखा है और दुनिया को खुली चुनौती है कि वे हस्तक्षेप करने का साहस ना करें. उन देशों के बारे में हमारे मन में पूर्वाग्रहों के बीज रोपे जा चुके हैं और उनके राज्य के विचार को इन्हीं साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा 'असफल विचार' करार दिया जा चुका है.

दुनिया में हुई क्रांतियों के उत्सव उन्हीं देशों ने मनाये हैं जिन्होंने राजशाही को उखाड़ फैंका था. औपनिवेशिक देशों के पास उत्सव मनाने के जो ख्वाब हैं, वे उधार के हैं और उनमें ब्रिटेन और अमेरिका के सितारे जड़े हुए हैं. इन दिनों मेरे ख्वाब भी बहुत उलझते जा रहे हैं. मैं अपनी धुन का पक्का नहीं हूँ. मनमौजी हूँ इसलिए मेरे पास एक ही समय में कई सारे काम होते हैं और मैं लगभग सब कामों को अधूरा छोड़ दिया करता हूँ. यहाँ तक कि अपनी तमाम मुहब्बतों को अंजाम तक नहीं ले जा सका.

एक मुहब्बत, दुनिया में सब को बराबरी का हक़ मिले की लडाई से भी थी. ये मुहब्बत भी अभी अधूरी है. बाईस साल की उम्र में मेरे लिखे लेखों का अंग्रेजी में अनुवाद मुझे पढने को मिलता था. आज उन पन्नों को देखता हूँ तो रोना आता है कि मैंने कैसे खुद को बरबाद किया है. मुझे मयकशी से कुछ दिनों के लिए मुक्त होने की जरुरत है. मैं कई बार सोचता हूँ कि मुझे प्रोफेशनल राईटिंग पर ध्यान देना चाहिए लेकिन फिर डर जाया करता हूँ कि ये काम मुझसे मेरी सहूलियतें छीन लेगा. कभी लगता है कि बीस साल पुराने धंधे में लग जाऊं, अख़बारों के लिए राजनैतिक विश्लेष्णात्मक लेखन आरम्भ करूं ताकि मेरी रूह को चैन मिले किन्तु मैं कुछ नहीं कर सकता जब तक अपनी बुरी आदतों से छुटकारा न पा लूं.

दुनिया में कोई काम आसान नहीं होता. किसी के तलवे चाटना भी आसान कहां होता है ? इसलिए मैं उन सब को बधाई देना चाहता हूँ जो अंकल सैम के गुलाबी कदमों को सदियों से चूम रहे हैं.

उसकी आमद का ख़याल

शाम और रात के बीच एक छोटा सा समय आता है। उस समय एक अविश्वसनीय चुप्पी होती है। मुझे कई बार लगता है कि मालखाने के दो पहरेदार अपनी ड्यूटी क...