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ऐ दुनिया, अपनी दुनिया ले जाओ...

हवा में तपिश थी और कई दिनों से मौसम थके हुए सरकारी हरकारों की तरह उखड़े हुए जवाब देने लगा था. कहवाघर के मालिक ने अपने कान को खुजाने के लिए अंगुली को सीधा किया तो उसकी आँख किसी यन्त्र की तरह बंद होने लगी यानि जब अंगुली ठीक कान को छू गयी उसी समय एक पलक बंद हुई. नसरुद्दीन की नज़र तीसरे घर के मेहराब से टकरा रही थी और गधा थका हुआ सा उदास बैठा था. अपने दाई तरफ करवट लेते हुए गधे ने कहा. वे अगर क्रीमिया में युद्ध के सिपाही न बने होते तो क्या वार ऐंड पीस नहीं लिखते ?

नसरुद्दीन ने जवाब नहीं दिया. वह अक्सर ऐसा ही करता है. उसका मानना है कि अपनों का कहा हुआ सुनने के लिए होता है, जवाब देने के लिए नहीं. इसलिए उसने एक प्यार भरी निगाह मात्र डाली. गधे ने उसी करवट के एंगल में थोड़ा सा उठाव लाते हुए किसी ज्ञानी की तरह एक साँस भर का मौन धारण किया और कहने लगा.

रात, मैंने एक सपना देखा. उस सपने का भूगोल कई सपनों में पहले भी देखा हुआ है यानि इसी सपने को मैंने कोई पांचवीं बार देखा. एक तीन मंजिला दुकानों वाली बिल्डिंग है. उसमें से एक पतला सा दरवाज़ा किसी होटल में ले जाता है. वहां सीलन भरे कमरे और एक बड़ा खुला हाल है. अपने कमरे से बाहर देखो तो लगता है कि सड़क पर गिरने वाले हैं. इस बिल्डिंग के आगे बहुत ही चौड़ी सड़क नुमा खुली जगह है जैसी रोमन नृत्य शालाओं के आगे हुआ करती है. मैं उस जगह से होता हुआ हमेशा उत्तर-पूर्व की दिशा में जाता हूँ. कुछ ही दूरी पर रास्ता ख़त्म होकर नीचे उतरने वाली सीढियों में तब्दील हो जाता है.

इन सीढियों के पास जाते हुए ऐसा लगने लगता है कि मैं खो गया हूँ. कई बार ख़याल आया कि वे सीढियाँ किसी अंतिम फैसले वाली जगह की ओर जाती है. यह विचार मुझे भय से भर देता है. इस सूनी जगह पर सीढियों से पहले पत्थर की एक लम्बी रेलिंग लगी हुई है. उसको देखने से आभास होता है कि कोई नदी या बड़ा झरना उसके नीचे से गुजरता होगा, हालाँकि मैं कभी वहां तक गया नहीं और हर बार मेरा सपना यहीं टूट गया. सपने से आधे जगे हुए खुद का हाल कुछ ऐसा पाया कि निर्जन प्रदेश में समय ठहर गया है और बेरहम मृत्यु अकेला छोड़ चुकी है. किसी प्रिय की अनुपस्थिति में आँखें भीगी हुई है और मार्मिक पुकारें गले में घोंट दी गयी है.

नसरुद्दीन ने पूछा कि इस सपने का टाल्सटॉय से क्या सम्बन्ध है ?
गधे ने कहा कि इस सपने का सम्बन्ध तो सोफ़िया आन्द्रीवना से भी नहीं है. रैल्फ कडवर्थ, क्लार्क, शेफ्ट्सबरी और ब्रीड्ले से भी नहीं है. शराब का पीपा लिखने वाले एडलर एलन पो और रेतीले मैदानों में एक अकेली सुंदरी के इर्द गिर्द रहस्य गढ़ने वाले राबर्ट लुई स्टीवेंसन से भी नहीं है. आत्मा से गुलाम लोगों की कथा लिखने वाले हंगरी के कथाकार ज़ोल्तान सितन्याई से भी नहीं है. ऐसा कहते हुए गधे का गला भर आया था. वह रो रहा था या हांफ रहा था, कहना मुश्किल था. गधे ने आगे कहा कि सब गधे भी एक से नहीं होते. सबके सुख और दुःख अलग होते हैं और कोई किसी को समझ नहीं सकता...

नसरुद्दीन चुप बैठा था कि ईरान में बेसतून पहाड़ को काटते समय फ़रहाद को न पत्थर दिखता था न दूध की नदी. उसकी आँखों में बस एक शीरीं थी. पास ही कहीं इब्ने इंशा की ग़ज़ल बज रही थी, कल चौदहवीं की रात थी...

दो अश्क़ जाने किसलिए पलकों पे आके टिक गए
अल्ताफ़ की बारिश तेरी इक़राम का दरिया तेरा !

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…