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नी मुईये, मैला मन मेरा...

इस साल की सुराही में एक बूँद बची है. जो पी लिया वह ये था कि प्रायोजित गांधीवाद के एक तालिबानी नेता ने साल भर लड़ाई लड़ी. उसके सामने नूरा कुश्ती के पहलवान भारतीय राजनेता थे. परिणाम ये रहा कि देश की जनता फिर हार गयी. मैं नहीं जानता कि नूरा कुश्ती के जनक कौन है मगर पाकिस्तान में यह बहुत फेमस है. इसमें कुश्ती लड़ने वाले दोनों पहलवान पहले से तय कर लेते हैं कि कोई किसी को हराएगा नहीं. दांव पर दांव चलते रहते हैं. दर्शक परिणाम की उम्मीद में हूट करते रहते हैं. आख़िरकार नाउम्मीद जनता अपने ढूंगों से धूल झाड़ती हुई घर को लौट जाती है. पहलवानों के समर्थक विपक्षी की नीयत में खोट बताते हुए अगली बार की नयी लडाई के वक़्त देख लेने की हुंकार भरते रहते हैं.

हमारी निष्ठाएं यथावत रही. भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कोलाहल रचते रहे, कामचोर बने रहे, सरकारी फाइलें अटकी रही. देश फिर भी आगे बढ़ता रहा. टाइम मैगजीन के लोग रालेगण सिद्धि में इंटरव्यू करने को आये. देश का बड़ा तबका धन्य हो गया. हमारे आदर्श बड़े भ्रामक हैं. टाइम मैगजीन के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि मनुष्य का भला करने वाली किसी घटना या व्यक्ति को सालाना कवर के लिए चुना गया हो. उन्नीस सौ सत्ताईस से लेकर दो हज़ार ग्यारह तक मात्र एक बार महाविनाशक रोग एड्स पर शोध के लिए ताईवानी वैज्ञानिक डेविड हो को पर्सन ऑफ़ द ईयर चुना गया है. शेष सभी अमेरिकी और रूसी राष्ट्राध्यक्ष, लड़ाईखोर, धार्मिक उन्माद फ़ैलाने वाले अयातुल्लाह खुमैनी जैसी लोग रहे हैं. टाइम मैगजीन मनुष्यता की नहीं वरन उथल पुथल की दीवानी है. ऐसे ही एक खुशफहमी ये भी रही कि भारतीय मिडिया को अन्ना प्रिय हैं और यूपीऐ का चेहरा काला दिखाना, जनता की पक्षधरता का प्रमाण है. वास्तविकता ये है कि मिडिया को किसी से प्रेम नहीं है. उन मनुष्यों से भी नहीं जिन्होंने बारह घंटे की शिफ्ट में अमानवीय कार्य करके गला काट प्रतिस्पर्धा में अपने समूह को नयी पहचान दी है. मिडिया के मालिक सिर्फ़ पैसा और सत्ता में अघोषित हिस्सेदारी के एजेंडा पर ही कार्य करते हैं.

हमारा देश सभी संस्कृतियों और विचारों का दिल खोल कर स्वागत करता है. जिनको कहीं पनाह नहीं मिलती वे हमारे यहाँ राज करते रहे हैं. पिछले कुछ एक सालों में आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक के सौजन्य से सप्रयास दुनिया भर के विकासशील देशों में सिविल सोसायटी की अवधारणा को अमली जामा पहनाया जा रहा है. इसका पहला उद्देश्य है कि वहाँ के संविधान के समानांतर एक समूह तैयार किया जाये. जो उसे निरंतर चुनौती देता रहे. इस कार्य को ऐसे समझा जा सकता है कि पिता के विरुद्ध परिवार के एक सदस्य को खड़ा किया जाये. इससे निरंकुश पिता परिवार को गर्त में न धकेल सके. इसके परिणाम क्या होंगे यह तो हम रेगिस्तान में भेड़ें चराने वाले लोग भी जानते हैं. देश में जंतर मंतर करने वाले इसे और बेहतर जानते ही होंगे. फिर भी शराबियों को खम्भे से बांध कर पीटने वाले इस तालिबानी गाँधीवादी से देश को बहुत उम्मीदें हैं. हम भ्रष्टाचार से मुक्त होना चाहते हैं, हम लूट के राज से बाहर आना चाहते हैं. हम सुकून और इज्जत से जीना चाहते हैं.

हमारा संविधान कहता है कि चुनी हुई सरकार जनता के लिए है. सरकार ने पाया कि चुन कर जनता के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, भोजन, जनसंचार और आवागमन की सुविधाएँ जुटाने में लगे रहना कोई राज करना थोड़े ही होता है. असली राज है कि आदेश हमारा चले, काम कोई और करे. इसलिए जनता की सभी जरूरतों का निजीकरण कर दिया गया है. पानी चाहिए पैसे दो, बीमार हो तो पैसा दो, आने जाने को साधन चाहिए तो पैसे दो, बच्चों को पढ़ाना है तो पैसे दो... अनवरत, सब जरूरतों का हल है पैसा. जेब में नहीं है तो कमा के लाओ. रोज़गार नहीं है अब क्या करें? सरकारों के पास इसका भी जवाब है कि पूरी दुनिया में नहीं है क्या करें? इन सवालों और जवाबों के कुचक्र में इतना तो तय है कि इस भ्रष्टाचार का आका निजीकरण है. मेरे प्यारे तालिबानी गाँधीवादी उसके ख़िलाफ़ नहीं लड़ेंगे कि ऍनजीओ के लिए पैसा बड़े मुनाफाखोरों की तिजोरियों से आता है.

इस साल के लिए एक दुआ थी कि थोड़ी सी शराब बरसे. दुआ कुबूल हो गई. साल भर लाजवाब स्वाद का सिलसिला चलता रहा. शराब बहुत काम आई कि स्मृतियों के उत्सव मनाने में आसानी रही. देश की आत्मा कही जाने वाली संस्कृति के अनमोल तत्व सिलसिले से बिछड़ते गए. मक़बूल चित्रकार, रुपहले परदे के नायाब सितारे, आवाज़ों से अमृत बरसाने वाले फ़नकार, किताबों के रचयिता इस लोक को अलविदा कह गए. उनके अमूल्य योगदान पर बरबस आँखें भीगती रही मगर देश, दिल्ली और दिल्ली की गलियों में स्वांग रच रहे लोगों के समूहों को देखता रहा. एक यकीन फिर भी बना रहा कि लोकपाल के लिए पैंतरे चला रहे लोग किसी के दिल में नहीं धड़क सकेंगे. वहाँ सिर्फ़ जगजीत जैसी मखमली आवाज़ें होंगी. कोई साज़ याद दिला रहा होगा कि बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं, तुझे ऐ ज़िन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं...

इस साल मंदिरों के तहखानों में दबी अविश्वसनीय अकूत धन सम्पदा देखी, पहली बार टीवी पर करोड़ों का ईनाम जीतता आम आदमी देखा, नक्सलियों की पैरोकार को कुर्सी पर बैठते देखा, अट्ठाईस साल बाद क्रिकेट के नए अवतार देखे. ऑटो रिक्शा में लाया जा रहा कबड्डी का विश्व कप देखा, तैतीस साल बाद झुका हुआ लाल झंडा देखा और सदी का सबसे बड़ा पूर्ण सूर्य ग्रहण देखा. सच, इस साल की सुराही में भरा पेय अद्भुत था कि बगलें झांकता विपक्ष देखा, मात दर मात खाता पक्ष देखा. दो चार के सिवा नेताओं का कुछ नहीं बिगड़ा बस आम आदमी को पस्त देखा. दिन भर कैमरे घूमते रहे तिहाड़ के आस पास और उनको रात में किसी बार में मस्त देखा. हाँ, शायद इसीलिए इक़बाल साहब ने कहा था, कुछ और बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी...

एक दुआ थी कि बहुत सारा सुकून बरसे, कुबूल नहीं हुई. जिनको अपना कहते हैं, उन मेहरबानों की मेहरबानियाँ बरसती रही. उन्होंने ज़ुबान पर लगे चाँदी के वर्क को उतार दिया और अपने नाखूनों को धार देते रहे. सब दुआएं कहां कामयाब होती है? मंदिरों में खड़े पुराने वृक्षों की डाली डाली पर और मस्जिदों की जालियों के हर कोने में बंधे हुए मन्नतों के धागे कब खुलते हैं. ऐसे ही सब रंग बिरंगी दुआएं समय की धूप में बेनूर हो जाया करती है. कमबख्त दुनिया का कारोबार चलता रहता है. इस सुराही से खट्टा मीठा जो भी बरसता है, वही ज़िन्दगी की नियाज़ है. किसी दिन ज़िन्दगी की सुराही रीत जाएगी. उस दिन हम भी बेनियाज़ हो जायेंगे.

* * *

नए साल में भले ही शराब न बरसे मगर एक लम्बी कहानी लिखनी है, उसे लिख सकूँ. कुछ किताबें, कुछ आवाज़ों का जादू बना रहे. जिन पर क्रश है, वे पहलू में हों. हिंदुस्तान जैसे विरले देश की हर गली में असंख्य किस्सागो, संगीतकार, चितेरे और अनूठी कलाओं के धनी रहते हैं. उन सब का हुनर सितारों में चाँद सा रोशन हो. जिन मित्रों ने साल भर मेरी इन कच्ची बातों को पढ़ा है, अलभ्य खुशियां उनका पता पूछती फिरे. वे अपनी चौखट पर महबूब को बोसे देता हुआ देखें... इसके बाद होने वाली तकलीफों को आंसू भरी आँखों और मुस्कुराते हुए होठों से बरदाश्त भी कर सकें. वैसे अभी इस साल की सुराही में एक बूँद बाकी है. उस्ताद सुल्तान खां साहब को याद करते हुए, श्रेया की दिल चुराने वाली आवाज़...

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
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मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…