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तुम मेरी फेवरेट ड्रग हो।

गर्मियां अचानक आई। एक पल में बदल गया सब कुछ। रूह पर जैसे कोई आंच का लिबास उतरा। रात-दिन छोटे बड़े हिस्से चुराते हुए कभी कोई लम्बा अंतराल कुंडली मारने लगता। मन उदासी की गति में, तन शिथिलता की ओर। फिर अल्पविरामों के प्रेम में पूर्ण विराम के भय से सिहरे हुए भारी-उखड़ी सांसों के मध्य लव स्माइली और छोटी-छोटी पुकारें बिखर जाती हैं। दुनिया की गिरहों से परे, दुनिया से किसी चाहना के बिना, बस एक बार रेत की पीठ के तीखे कटाव के पास प्रेम लिख देने और फिर मिटाकर चले जाने की सोच में खोयी हुई नाकारा, बेढब, बेसलीका ज़िन्दगी। सिर्फ बेदिली और इंतज़ार जिसका हासिल है।

ये कुछ एक बातें कभी किसी दोपहर या रात को छत पर लेटे तारों को देखते हुए कह दी। उस तक पहुंचे भी तो क्या वह समझ सके? कमसिन अल्हड़पन कई बार उम्र का मोहताज़ कहाँ होता है। कब सादगी समझती है पेचीदगी को। कल दिन को लू चूमती रही। आओ मेरे केसी तुम्हारी बाँहों और गरदन पर लिख दूं ताम्बई रंग। लिख दो जाना जो लिखना चाहो। एक ज़िन्दगी है जो थोड़ी सी बाकी है...

जैसे शाम ठिठकी हो बुझने से पहले
रात आग़ाज़ को झुकी जाती हो।

तुम उधर इंतज़ार में, मैं इधर बेक़रारी में
* * *

गरम दोपहरों वाले मौसम के साथ एक कश्मीरन लड़की ने दस्तक दी।

रेत भर हैरत पसर गयी है।
* * *

जिस किसी ने कहा था
तुमसे मोहब्बत थी इसलिए शादी की
अब जाने क्यों मोहोब्बत नहीं है मगर वादा कायम है।

ऐसे लोगों से अच्छे कहलाये वे लोग
जिन्होंने वादे सब तोड़े मगर कहा मोहोब्बत कायम है।
* * *

जी चाहता है तुम्हारे पहलू में सिमट जाऊं
फिर ख़याल आता है रहने दो कि जी और भी बहुत कुछ चाहता है।
* * *

दो दिन और रात बरसती रही रेगिस्तान की आंधी की काली पीली रेत। ऊंटों का टोला बैठा रहा बिना जुगाली गोल घेरे में। मुसाफिरों ने छोटे तुंबुओं से झाडी नहीं धूल।

प्रेमिकाएं मगर कोसती रही इंतज़ार को।
* * *

डॉक्टर ने कहा दुरस्त है तुम्हारी आँखें
ये सिर्फ इंतज़ार की चुभन का दर्द है।

शैतान की आँखों में उतरा है रोग नया।
* * *

तुमने मुझे क्या कुछ दिया है सोचकर मन प्रसन्न हो जाता है। इसके कुछ देर बाद मेरा लालच असंख्य तकलीफें बटोर लाता है।
* * *

अब फिर वही सब गुज़र रहा होगा। बाद इसके वही सब गुज़रेगा।
* * *

जो पेशानी की सीध में था सितारा
अब वह टूटा तो गिरेगा उस कान के पास
जिसमें तुम्हारे होठ सरगोशी फूंकते हैं।

शैतान ! ओ शैतान मैं प्रेमिका हूँ तुम्हारी।
* * *

रोहिड़ा कुछ रोज़ आकाश को
फिर धरती को रंगता है अपने फूलों के रंग से।

जाना अब तुम भी टूटकर गिर पड़ो मुझपर।
* * *

गरमी ने इस तरह दस्तक दी है
जैसे गुबरैले रेत पर भागे जातें हों कहीं घर बसाने को।
जाना क्या तुमने भी सोचा है
कि कोई दस्तक दूं, हम कहीं बस जाएँ ठंडी जगह पर।
* * *

एक तेरा वो कहना
कि उम्र भर याद रहेगा मुझे
कैसे कैसे लोगों को बरदाश्त किया है तुम्हारी खातिर।
* * *

अगर वह टूट पड़े तो
सीधा मेरी पेशानी पर आये।

एक तेरी याद सा तारा आसमान में चमकता है
* * *

नींद उतरती है
कच्ची बात की तरह ठिठकी हुई।
तुम जो पास रहो तो कोई नयी शिकायत भी आये।
* * *

झूले में एक मद्धम मचल है
तुम्हारी बाहों की तरह।
रात के आठ चालीस हुए हैं।

ज़िन्दगी किसी गुज़री हुई चीज़ का नाम नहीं है।
* * *

तलब बेहिसाब और लम्हे ज़िन्दगी के कम-कम। एक बेवक़्त की बेख़याली में कही बात लिपटी रहती है ज़िन्दगी की शाख से। मुझे तुम्हारे तंज भी प्रिय हैं। और तेरी याद भी, जैसे सूखी बेल की धूसर सलवटों से झांकती कच्चे हरे रंग की कोंपलें।
* * *

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…