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लड़की, जिसकी मैंने हत्या की


उसका नाम चेन्नमा था. उसके माता पिता ने उसे बसवी बना कर छोड़ दिया था. बसवी माने भगवान के नाम पर पुरुषों की सेवा के लिए जीवन का समर्पण. चेनम्मा के माता पिता जमींदार ब्राह्मण थे. सात-आठ साल पहले वह बीमार हो गयी तो उन्होंने अपने कुल देवता से आग्रह किया था कि वे इस अबोध बालिका को भला चंगा कर दें तो वे उसे बसवी बना देंगे. ऐसा ही हुआ. फिर उस कुलीन ब्राह्मण के घर जब कोई मेहमान आता तो उसकी सेवा करना बसवी का सौभाग्य होता. इससे ईश्वर प्रसन्न हो जाते थे.

नागवल्ली गाँव के ब्राह्मण करियप्पा के घर जब मैं पहुंचा तब मैंने उसे पहली बार देखा था. उस लड़की के बारे में बहुत संक्षेप में बताता हूँ कि उसका रंग गेंहुआ था. मुख देखने में सुंदर. भरी जवानी में गदराया हुआ शरीर. जब भी मैं देखता उसके होठों पर एक स्वाभाविक मुस्कान पाता. आँखों में बचपन की अल्हड़ता की चमक बाकी थी. दिन भर घूम फिर लेने के बाद रात के भोजन के पश्चात वह कमरे में आई और उसने मद्धम रौशनी वाली लालटेन की लौ को और कम कर दिया.

वह बिस्तर पर मेरे पास आकार बैठ गयी. मैंने थूक निगलते हुए कहा ये गलत है. वह निर्दोष और नजदीक चली आई. फिर उसी ने बताया कि मैं बसवी हूँ. ईश्वर की आज्ञा है कि मैं मेहमानों की सेवा करूं. यह उनके लिए आदेश की पालना है. मैंने कहा यह तो वेश्या जैसा कार्य है. यह सुन कर उसकी भोंहें चढ़ गयी. नथुने फड़क उठे. बहुत गुस्से में आने वाली स्त्री के मुख पर एक प्रकार भीषणता आ जाती है. वही उसके मुख पर स्पष्ट थी.

इसके बाद रात देर तक हम दोनों ने स्त्री और उसके मान के बारे में चर्चा की. धर्म की आड़ में मनुष्य को इस तरह के नारकीय जीवन में धकेलने वाले अज्ञान और स्वार्थ पर बहस की. लेकिन उसने एक भी बात न सुनी. मैंने पूछा कि इससे पहले तुमने किसी की सेवा की है. चेनम्मा ने सर झुका लिया. मैंने कहा कि अगर तुम खुद को ईश्वर का प्रसाद समझती हो तो ये झूठन हुई ना? और इस तरह झूठन को परोसना पाप ही हुआ ना?

इसी तरह के सवाल जवाब के दौरान चेनम्मा के चेहरे पर सुख दुःख के भाव आते गए. चिंताओं की लकीरें बनती गयी. आखिर उसने मान लिया कि यह मनुष्यता का कोई रूप नहीं है. वह बढ़ कर मेरे पांव छूने को ही थी कि मैंने उसे रोक लिया. अब वह बहुत प्रसन्न थी. किन्तु उसने कांपते हुए कहा "भगवान... अब आगे से ऐसा काम नहीं करुँगी." मुझे लगा कि उसके चेहरे से शांति बह रही थी. मैंने कहा "चेन्ना अब तुम जाकर सो जाओ." दरवाज़े के पास उसका हाथ पकड़ कर कहा कि "तुम्हें मुझसे कोई गुस्सा तो नहीं." फिर उसके माथे को चूम लिया.

मैं विवाहित हूँ. मेरी पत्नी मेरी प्रतीक्षा में हैं. मेरे बच्चे हैं. अगर मैंने दस साल पहले विवाह किया होता तो चेनम्मा जितनी बड़ी मेरी बेटी होती. ऐसी बातें सोचता हुआ मैं सो गया. सुबह जब जागा तो पाया कि करियप्पा ने मुझे पुकार कर जगाया है. बाहर देखा तो हो हल्ला था. चेनम्मा बाग़ के कुएं में गिर गयी थी. मैं बदहवास कुंएं की ओर भागा. उसका शव रखा था. देह में छिपा हिमकण उड़ चुका था.वह पुण्य और पाप से परे हो गया था. बची थी केवल विष की खली.

ये कहानी बहुत विस्तार में है. अन्जपुर के रहने वाले सीताराम ने इसे लिखा था. वे खुद को आनंद लिखा करते थे. विज्ञान में स्नातक पढ़े हुए आनंद साल उन्नीस सौ तिरेसठ में इस दुनिया को छोड़ गए. उनकी कहानी एक तमाचा जड़ कर रात भर जागने को विवश करती है. पाठक की आत्मा को कुरेदती रहती है.
* * *

उस कहानी का शीर्षक ही इस पोस्ट का शीर्षक है.

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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

मन में छुपे बुलावे

टूटे पंख की तरह  कभी दाएं, कभी बाएं  कि कभी हवा में तैरता मन। 
आँखें पास की दीवार, छत, पेचदार सड़क या खुले आसमान की ओर रह जाती है जबकि मन चुपके से कहीं दूर निकल जाता है। मैं उसी जगह बैठा हुआ पाता हूँ कि खोया हुआ मन जहां गया है, वह कोई चाहना नहीं है। मन का जाना ऐसा है जैसे वह निरुद्देश्य भटक रहा है। 
मैं उसे पकड़कर अपने पास लाता हूँ। उसी जगह जहां मैं बैठा हूँ। वह लौटते ही मुझे उकसाता है। अब क्या करें? मैं भी सोचता हूँ कि क्या करें? कुछ ऐसा कि नींद आ जाए। थकान आँखें बुझा दे। कोई मादक छुअन ढक ले। कोई नशा बिछ जाए। ये सब हो तो कुछ ऐसा हो कि जागने पर नींद से पहले का जीवन भूल सकें। 
यही सोचते, मन फिर बहुत दूर निकल जाता है। * * *
पर्दा हल्के से उड़ता है  जैसे कोई याद आई और झांककर चली गयी। 
हम किसी को बुलाना चाहते हैं मगर ऐसे नहीं कि उसका नाम पुकारें। हम उसके बारे में सोचते हैं कि वह आ जाए। वह बात करे। किन्तु हम इन बुलावों को मन में ही छुपाए रखना चाहते हैं। 
कभी-कभी हम इस चाहना से शीघ्र मुक्त हो जाते हैं और कभी हम सोचने लगते हैं कि किस तरह उसे बुला लिया जाए और साथ ही ये भी न लगे कि हमने बुलाया ह…

सपने में गश्त पर प्रेम

होता तो कितना अच्छा होता कि हम रेगिस्तान को बुगची में भरकर अपने साथ बड़े शहर तक ले जा पाते पर ये भी अच्छा है कि ऐसा नहीं हुआ वरना घर लौटने की चाह खत्म हो जाती. 
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* * *

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कैसे उग आई उस पर शाखाएं
कैसे खिले दो बार फूल
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* * *

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कि मैं एक प्रेम का बिरवा हूँ
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कभी लगता है
कि मैं लकड़हारा हूँ और पेड़ गिरा रहा हूँ.
मुझे ऐसा क्यों नहीं लगता?

कि मैं एक वनबिलाव हूँ
और पाँव लटकाए, पेड़ की शाख पर सो रहा हूँ.
* * *

प्रेम एक फूल ही क्यों हुआ?
कोमल, हल्का, नम, भीना और मादक.

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तक लेता मौसमों की राह और कर लेता सारे इंतज़ार पूरे.
* * *

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तब एक बड़े पेड़ की कल्पना करते हैं.

प्रेम के समय हमारी कल्पना को क्या हो जाता है?
* * *

प्रेम
उदास रातों में तनहा भटकता
एक काला बिलौटा है.

उसका स्वप्न एक पेड़ है
घनी पत्तियों से लदा, चुप खड़ा हुआ.

जैसे कोई मह…