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पतनशील पत्नियों के नोट्स

फरवरी का पहला सप्ताह जा चुका है मगर कुछ रोज़ पहले फिर से पहाड़ों पर बर्फ गिरी तो रेगिस्तान में भी ठण्ड बनी हुई है. रातें बेहिसाब ठंडी हैं. दिन बेहद सख्त हैं. कमरों में बैठे रहो रजाई-स्वेटर सब चाहिए. खुली धूप के लिए बाहर आ बैठो तो इस तरह की चुभन कि सबकुछ उतार कर फेंक दो. रेगिस्तान की फितरत ने ऐसा बना दिया है कि ज्यादा कपड़े अच्छे नहीं लगते. इसी के चलते पिछले एक महीने से जुकाम जा नहीं रहा. मैं बाहर वार्मर या स्वेटर के ऊपर कोट पहनता हूँ और घर में आते ही सबको उतार फेंकता हूँ. एक टी और बैगी पतलून में फिरता रहता हूँ. याद रहता है कि ठण्ड है मगर इस याद पर ज़ोर नहीं चलता. नतीजा बदन दर्द और कुत्ता खांसी. 

कल दोपहर छत पर घनी धूप थी. चारपाई को आधी छाया, आधी धूप में डाले हुए किताब पढने लगा. शादियों का एक मुहूर्त जा चुका है. संस्कारी लोगों ने अपनी छतों से डैक उतार लिए हैं. सस्ते फ़िल्मी और मारवाड़ी गीतों की कर्कश आवाज़ हाईबर्नेशन में चली गयी है. मैं इस शांति में पीले रंग के कवर वाली किताब अपने साथ लिए था. नीलिमा चौहान के नोट्स का संग्रह है. पतनशील पत्नियों के नोट्स. 

तेज़ धूप में पैरों पर सुइयां सी चुभती हैं. मैं उनको बारी-बारी से धूप में रखता हूँ और किताब पढता जाता हूँ. संग्रह के पहले अध्याय के नोट्स का शीर्षक है क़ैद में है बुलबुल. मैं बुलबुल के ख़याल से बाहर दूजी जगह पहुँच जाता हूँ. वह जगह है बाबा मोहम्मद याहया खान का एक नावेल. पिया का रंग काला. वहां पर कहानी रहस्यमयी है. बचपन में एक नन्हा सुनहला दिखने वाला प्यारा सा सांप जैसे जैसे बड़ा होता है, उसकी रंगत काले रंग में बदलती जाती है. अंततः वह भयावह काला, विशालकाय और बेहद डरावना हो जाता है. उसके पूरे स्याह बदन में केवल आँखें सफ़ेद होती है. वह सांप जब चाहे आदमी-औरत का रूप धारण कर लेता है. इस रहस्य और जुगुप्सा से भरी कहानी की याद नीलिमा चौहान के नोट्स के साथ आना मुझे हैरत में नहीं डालता. 

हमारे बचपन की नन्हीं जिज्ञासाएं एक रोज़ भयावह कामुक अपराधों भरी सोच में बदल जाती है. औरत और आदमी का जीवन सहगामी है. किसी एक के बिना क्या जीवन. मैं साफ़ आसमान में कुछ सफ़ेद फाहे और क्षितिज पर बादलों की एक लकीर देखता हूँ. सोचता हूँ कि आदमी और औरत ही क्या, हर एक जो हमारे जीवन से गायब हो उसके बिना कितना अधूरा सा होता है. पंछियों, बादलों, तारों के बिना आसमान भी कैसा होता? एक और सवाल आता है कि आदमी और औरत के बीच कुदरती भिन्नता अथवा पूरक होने का ये सुन्दर सहज रूप शोषक और शोषित के दो खेमों में क्यों बंट जाता है. इसका भान बहुत देर से और बहुत कम लोगों को क्यों होता है. कम ओ बेश कुंठाएं पल्लवित होती जाती हैं. समाज का आदमियों के वर्चस्व वाला खेमा उनको अपनाता जाता है. इस पर किसी को कोई अचरज नहीं होता, कोई लज्जा नहीं आती. याहया खाना साहब के नन्हे सुनहले सांप की तरह काम इच्छाओं का नन्हा सुनहला सांप बड़ा होकर क्या कुछ निगल जायेगा, इसकी कल्पना कोई नहीं करता. हम नहीं सोचते कि लस्ट, पोर्न और सेक्स के स्याह अँधेरे से रिस रहा आसव आदमी और औरत के बीच कैसा लिजलिजा सम्बन्ध स्थापित करता है? 

मैं और बेटी दो दिन पुस्तक मेला में घूमें. कुछ मेरे दोस्त हैं, उनसे मिलने और बतियाने का सुख बटोरा. तीसरे रोज़ हमें कुछ किताबें खरीदनी थीं. उनमें से एक किताब ये भी थी. पतनशील पत्नियों के नोट्स. कहीं किसी अख़बार या पत्रिका में छपे नोट्स में से कोई एक दो नज़र से गुज़रे होंगे. तभी सोचा कि ये संग्रह पढना चाहिए. पहली नज़र में किताब को देखते ही आपको राजकमल से आई रविश कुमार की किताब की याद आयेगी. आवरण का रंग, रेखांकन और छोटे-छोटे नोट्स. हालाँकि इश्क़ में शहर होना, उन लम्हों की कल्पना है. जो रविश जी नहीं पाते और दुनिया को अपने पत्रकारिता जैसे काम के बाहर देखते हुए रचते हैं. वे लघु प्रेम कहानियां हैं. ऐसी कहानियां जो आपको शहर के भूगोल की प्रोपर्टी पर बिठा देती है. वहां से आपको जीवन की छूटी हुई अनुभूतियों की छोटी गहरी याद दिलाती है. उस किताब में भी सुन्दर रेखांकन हैं. ऐसा रेखांकन की कई बार आपको लग सकता है किताब के दो बराबर के हिस्से हैं. एक लेखक का दूसरा चित्रकार का. रविश हर दिन हर पल समाज के छिछले ओछे आवरणों से रु ब रु होते हैं और उनको सवाल की शक्ल में हमारे सामने रखते हैं. तो उनकी लघु प्रेम कहानियाँ ये आशा दिखाती है कि इस आदमी को अबतक रुखा और कठोर हो जाना चाहिए था लेकिन बचा हुआ है. पतनशील पत्नियों के नोट्स वाली नीलिमा जी प्रोफ़ेसर हैं और उनका सामना बच्चों से होता है. वे ऐसी चिंताएं करती हैं जो आने वाली पीढ़ी के लिए हैं. वे आज को लिखकर सवाल करना चाहती हैं कि कल को कैसा बनाओगे. इस किताब में सुन्दर रेखांकन हैं. अपराजिता शर्मा ने हमारे दिमाग में बसी फूहड़ छवियों को कोमलता से शालीन और ज़रूरी छवियों में बदल दिया है.  

इस तरह धूप-छाँव में लेटे पढ़ते हुए, मुझे अचानक से याद आता है कि रूमी ने कहा कि जहाँ कहीं खराबा है उम्मीद का खजाना भी वहीँ हैं. पतनशील नोट्स पढ़ते हुए एक संत कवि दार्शनिक की कही बात का याद आना फ़ौरी तौर पर बेवजह लग सकता है. कहाँ ये पतनशील बातें और कहाँ वह आध्यात्म से भरा सूफी जीवन. लेकिन ये इसलिए याद आता है कि हम खराब हो चुके हैं और मैं इस खराबे में उम्मीद तलाशना चाहता हूँ. नोट्स का संग्रह औरत के शरीर, काम और इच्छाओं के विज्ञापनी संसार से खींचकर आपको उस जगह ले जाता है, जहाँ से आपकी चाहनाओं और हरकतों की बद सूरत सामने आती है. इसी दुनिया के दो हिस्सों में आदमियों के फूहड़ लतीफे और औरतों की भद्दी मसखरियां एक परदे के इस और उस तरफ ख़ूब एंजॉय की जाती हैं. नीलिमा के नोट्स इस परदे को हटा देते हैं. पढ़ते हुए जिन छुपी बातों पर मजे लेना चाहते हैं. उन्हीं बातों से आत्मा के पैरहन उतरने लगते हैं. अपनी नंगई किसी और के शब्दों में पढ़ते जाना कुछ ऐसा है कि दिल से आह उठती रहे और मुंह उसे दबाये हुए चुप बैठा रहे. ऐसे चुप कि कुछ हुआ नहीं है

विनोद अथवा प्रहसन और खास तौर से सामाजिक मुद्दों पर लिखे गए ऐसे लेख जो हमारी कुरूपता पर सीधे प्रहार करने की जगह चिकौटी काटते हों. लोकप्रिय होते हैं. उनकी उम्र बड़ी लम्बी होती है. इसलिए कि आदमी का स्वभाव बदलने में कई पीढियां लग जाती हैं. वाणी प्रकाशन से आये इस संग्रह को नॉन फिक्शन के अलावा फेमिनिज्म और ह्यूमर की क्लास में भी रखा गया है. इसमें फेमिनिज्म कितना है ये कहना बड़ा मुश्किल है. लेकिन इसमें मनुष्यता की आशा भरपूर है. ऐसी किताबें हर भाषा में आती रहती हैं. अक्सर व्यंग्य अपने सस्तेपन का शिकार हो जाता है. लतीफों के अनुवाद और विस्तार भर शेष रहते हैं. 

मानु जब पांच साल के आस पास थी तब मैं उसे कहानियां सुनाया करता था. मानु ने जो कहानियां बार-बार सुनी वे इब्न ए इंशा साहब की किताब से ली गयी थी. किताब का शीर्षक है- उर्दू की आखिरी किताब. मैंने व्यंग्य कम पढ़ा है. हालाँकि मैंने सबकुछ बहुत कम पढ़ा है. फिर भी उर्दू की आखिरी किताब मेरी प्रिय किताबों में से एक है. उर्दू किताबों की चर्चा में कुछ बरस पहले हुसैन अहमद शेराज़ी साहब की किताब की काफी चर्चा हुई थी. किताब का शीर्षक है बाबू नगर. ये किताब बाबू साहेब कहे जाने वाले छोटे से बड़े क्लर्क तक के जीवन और उनके आचरण पर कसाव भरी चुटकियाँ लेने वाली कही जाती है. इस किताब का कलेवर भी पतनशील पत्नियों के नोट्स जैसा ही है. यानी रंग तो पीला ही रहेगा, चाहे कोई भी व्यंग्य लिखे. वैसे पीला रंग किताबों के लिए बेहतर भी माना जाता है. इस किताब में भी मशहूर कलाकार जावेद साहब का इलेस्ट्रेशन है. 

नीलिमा चौहान की किताब के शुरूआती नोट्स औरतों के निजी हिस्सों के बाबत आदमी की सोच का खाका है. ये ठीक ऐसा नहीं है मगर आप ऐसे समझिये कि नीलिमा जी ने हमारी ढकी हुई सोच को उल्ट कर सामने रख दिया है. ये प्राइवेट पार्ट्स और लाइफ के बारे में आदमी की सोच को इनसाइड आउट सुखा देने जैसा है. कहीं कोई-कोई बात इतनी सीधी है, जैसे दो धार वाली तलवार होती है. जो जाते हुए भी चीरती है और लौटते हुए भी. आगे के लेख आपको अनुभूतियों की ओर ले जाते हैं. जीवन के छोटे दृश्यों के पीछे की गहरी संवेदना भी छूटती नहीं है. मन के कोनों में दबे-छुपे स्त्री होने के अहसास को नई शक्ल और नया ढब देकर उकेरा है. 

पतनशील पत्नियाँ कहाँ होती हैं. वे पतनशील क्यों हैं. ये सब पढने की बात है. 

मैं धूप के और तल्ख़ होते जाने से बेपरवाह किताब पढता रहता हूँ. सोचता हूँ कि समय हमारे साथ कभी अन्याय नहीं करता. मेरी बेटी जब पांच साल की थी तब मैं उसे इब्ने इंशा साहब द्वारा आगे बढाई गयी कहानियां सुनाता था. जैसे "टोपियाँ बेचने वाला व्यापारी और बंदर" कहानी आप सब ने पढ़ी ही होगी. लेकिन इसे इब्ने इंशा साहब ने इस तरह आगे बढ़ा दिया. “टोपीवाला व्यापारी जंगल से गुज़रते हुए थककर एक पेड़ के नीचे आराम करने लगता है. उसे नींद आ जाती है. कुछ बन्दर आते हैं और उसकी सब टोपियाँ ले जाते हैं. वह जागता है तो टोपियाँ बंदरों के पास देखकर अक्ल से काम लेता है और बंदरों को दिखाकर अपनी टोपी फेंक देता है. बन्दर भी उसकी नक़ल करते हुए टोपियाँ फेंक देते हैं. अगली बार व्यापारी का बेटा वहां से जाता है. यही घटना फिर होती है तो व्यापारी का बेटा अपनी टोपी फेंकता तो एक नन्हा बन्दर जिसे टोपी नहीं मिली होती है, वह उसे लेकर पेड़ पर चढ़ जाता है. नया व्यापारी अचरज से कहता है कि मेरे अब्बू ने कहा था कि उन्होंने जब ऐसे टोपी फेंक दी तो सब बंदरों ने भी फेंक दी थी. इस पर एक बन्दर कहता है- क्या तुम्हारे ही अब्बू थे, हमारे नहीं थे.”

तब मेरी बेटी के पास सुनने को इंशा जी की कहानियां थी. अब जब वह दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ती है तो उसका वास्ता ऐसी किताबों से भी पड़ना चाहिए जो पतनशील पत्नियों के नोट्स जैसी हों. लेखक पीछे छूटते जाते हैं तो इसका अर्थ ये नहीं है कि उन खाली जगहों को भरने कोई आता नहीं है.

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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…

मन में छुपे बुलावे

टूटे पंख की तरह  कभी दाएं, कभी बाएं  कि कभी हवा में तैरता मन। 
आँखें पास की दीवार, छत, पेचदार सड़क या खुले आसमान की ओर रह जाती है जबकि मन चुपके से कहीं दूर निकल जाता है। मैं उसी जगह बैठा हुआ पाता हूँ कि खोया हुआ मन जहां गया है, वह कोई चाहना नहीं है। मन का जाना ऐसा है जैसे वह निरुद्देश्य भटक रहा है। 
मैं उसे पकड़कर अपने पास लाता हूँ। उसी जगह जहां मैं बैठा हूँ। वह लौटते ही मुझे उकसाता है। अब क्या करें? मैं भी सोचता हूँ कि क्या करें? कुछ ऐसा कि नींद आ जाए। थकान आँखें बुझा दे। कोई मादक छुअन ढक ले। कोई नशा बिछ जाए। ये सब हो तो कुछ ऐसा हो कि जागने पर नींद से पहले का जीवन भूल सकें। 
यही सोचते, मन फिर बहुत दूर निकल जाता है। * * *
पर्दा हल्के से उड़ता है  जैसे कोई याद आई और झांककर चली गयी। 
हम किसी को बुलाना चाहते हैं मगर ऐसे नहीं कि उसका नाम पुकारें। हम उसके बारे में सोचते हैं कि वह आ जाए। वह बात करे। किन्तु हम इन बुलावों को मन में ही छुपाए रखना चाहते हैं। 
कभी-कभी हम इस चाहना से शीघ्र मुक्त हो जाते हैं और कभी हम सोचने लगते हैं कि किस तरह उसे बुला लिया जाए और साथ ही ये भी न लगे कि हमने बुलाया ह…