एक चुटकी उदासी - अनुमिता
करोल बाग में एक पुरानी हवेली है। इसमें एक गुलाबी कमरा है। यह नई दुल्हन का कमरा है। स्नेह-सिक्त परिणय-क्षण पुराने नहीं हो पाते उससे पहले नई दुल्हन अल्पकाल में पुरानी हो जाती हैं। उसे कमरे से बाहर कर दिया जाता है।
अनुमिता की कहानी “दूसरी मंज़िल का कमरा” घर की बालकनी में, दफ़्तर की टेप लायब्रेरी में और थोड़ी स्टूडियोज़ में पढ़ी गई।
ये दूसरी कहानी है। पहले ग्यारहवाँ घंटा पढ़ी थी। दोनों कहानियाँ उत्तरार्ध तक पहुँच कर पाठक को तीव्र घटनाओं में ले जाती हैं। पाठक का मन चौकन्ना हो जाता है। पढ़ने की गति शिथिल होने लगती है कि दृश्यों की डिटेलिंग छूट न जाए। पुस्तक के पन्नों पर अंगुलियों का दबाव बढ़ जाता है।
सावधानी के अतिरेक के बाद भी मैंने कहानी संग्रह को एक ओर ये सोचकर रखा कि इसका पुनर्पाठ अनिवार्य है। टेप लाइब्रेरी में सहकर्मियों की बातचीत का स्वरवृंद मुझे कथानक से बाहर लाता है।
इसके बाद भी मन कहानी के किसी दृश्य तक पहुंचता रहता है। मानसिक व्यस्तता एक प्रकार की दुविधा होती है। कि हम काम कम कर रहे होते हैं, सोच के अनगिनत बेलगाम घोड़े अरूप भूगोल में दौड़ते-फिसलते और उचक कर संभलते रहते हैं। उस समय लगता है कि मानसिक दौड़ में घंटे भर के अल्पविराम आते रहें।
स्मृति की ऊटपटांग छलाँगों के बीच हम उठते हैं और किसी काम में लग जाते हैं। जैसे कहानी सा ही जीवन चल रहा है। किसी रचना में रचे गए जीवन से बाहर आने में समय लगता है। हवेली में तन्हा रह रही कथा नायिका के अकेलेपन में जीवन की आवश्यकताएं ही हैं जो उसे भयावह सन्नाटे से बचाती हैं।
कहानी के कथानक में समाई अनेक घटनाओं, दार्शनिक तत्वों और यथार्थ की नीली सियाह परिस्थिति को एक शोर्ट स्टोरी में संपन्न कर देना आसान नहीं है। जबकि लगता है, कथा साथ लिए चली जा रही है तो अच्छा है।
जीवनयापन के लिए धन की पूर्ति हेतु दूसरी मंज़िल का कमरा किराए पर उठता रहता और कथा में नए पात्रों को आगमन होता रहता है। किरायेदार स्त्रियां आती हैं और गुम हो जाती हैं। कथा की अंतिम किराएदार के संग शिखर तक पहुंचते हुए, कथा परोक्ष- अपरोक्ष समाज में हर वर्ग की, अनेक प्रकार के कार्यों और कला से जुड़ी स्त्रियों के माध्यम से थोड़ा डरावना और अधिक सोचने जैसा हाल कर देती है। कि इस समाज में स्त्रियां कैसे गुम हो जाती हैं।
गुम हुई स्त्री के लिए सिस्टम कहता है “औरतें तो भाग ही जाती हैं, मैडम जी” और जो बच जाती हैं, उनका स्थान बहुत कठोर हृदय से अनुमिता ने घर के सबसे अधिक कड़े और ठंडे आँगन को बताया है या फिर रसोई घर।
मधुमक्खी का छत्ता एक बिंब है। हवेली के अनेक कमरे और अनेक दरवाज़े छत्ते की भाँति ही हैं। किंतु इस छत्ते में रानी मधुमक्खी दर-ब-दर है। कहने का अभिप्राय रहा होगा कि मनुष्यों के समाज की तुलना में मधुमक्खियों का समाज अधिक सुंदर है। जहाँ हर एक का अपना स्थान है। वहाँ कोई गुलाबी कमरा नहीं है।
ये सब मैं सोच रहा हूँ। कहानी इतनी भर नहीं है। कथा में कहा गया संसार सजीवता से पाठक के आस पास उपस्थित रहता है। ख़ालीपन नहीं है। कथा के तत्व मुखर हैं। किंतु एक बार पढ़ लेने भर से कथा की गूढ़ता तक पहुँच पाना सम्भव नहीं होता।
कहानी संग्रह एक सहकर्मी माँग लेती है। ये किताब मुझे दे दीजिए। अब वे सोमवार को मिलेंगी। मेरा मन है कि कहानी पढ़ने वाला बताए कि क्या पढ़ा और कैसा लगा। हर एक कहानी हर व्यक्ति के मन में अलग तरीके से घुलती है। उसका अलग रंग बनता है।

