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दो ढक्कन


मेरे सब दोस्तों में बाबू लाल एक मात्र सच्चा शराबी था उसने ब्रांड, स्थान और शराबियों में किसी भी प्रकार का भेदभाव किए बिना मयकशी को सुन्दरता प्रदान की। उसका दिल प्यार से भरा था और वह एक पैग से ही छलकने लग जाए इतना हल्का भी नहीं था। मैं हमेशा अपनी शाम उसके साथ ही बिताना चाहता था किंतु सच्चा शराबी एक ही बंधन से बंधा होता है शराब के... उसके लिए बाक़ी सब चीजें होती ही नहीं और होती है तो कहीं रेत के टिब्बों में किसी हरी झाड़ी के समान विरली। पीने और ना पीने वाले तमाम शायरों के शेर में मुझे उसी का हुस्न जगमगाता दिखाई पड़ता था। हम बीस साल पुराने पियक्कडों में वह सबसे अधिक लोकप्रिय था। मेरे सिवा पूरी टीम के समक्ष संविधान की अनिवार्य शर्तें लागू थी वे कभी बच्चे का जन्म दिन, कभी रीलिविंग पार्टी, कभी कभी किसी राष्ट्रीय आपदा पर गंभीर चर्चा के बहाने अपनी बीवियों को पटाते और फ़िर पीने आते थे। उनके लिए वो दिन अत्यधिक उत्साह से भरा होता था जबकि मैं और बीएल [बाबू लाल] शराब के हुस्न के नए रंग तलाशते थे।

हमारे ढक्कन अभियंता साहब [वे एक पैग को ढक्कन कहते थे और पार्टी में आते ही दो ढक्कन लेने का ऐलान करने के बाद साकी की सामर्थ्य के अनुसार पीते और उसे कभी निराश नहीं करते थे] रोहतक गए हुए थे और उन्होंने बीएल को वहीं से फोन करके बता दिया था कि आज रात साढ़े ग्यारह बजे मैं रेल से पहुँच रहा हूँ और दो ढक्कन तुम्हारे साथ लूँगा। बीएल के साथ हुए इस करार का मुझे ज्ञान था और मैं रात नौ बजे तक इंतजार करने के बाद बालकनी में अपनी बोतल निकल लाया और पहला पैग बनाया ही था कि दूर से हुस्न परी आती दिखाई दी और उसके पीछे भागू भी लगा हुआ सा दिखाई दिया।

दोस्तों के आते ही बालकनी से मयखाना विस्थापित हो कर मेरे सरकारी आवास की बैठक में शिफ्ट हो गया। भागू के चूँकि तापमापी लगा हुआ था तो उसे मैंने आशंकित निगाहों से देखा। इस तापमापी के बारे में मैंने पिछली पोस्ट में लिखा था "बिना बताये शराब छुड़ाए... वाला " भागू ने तुंरत बता दिया कि आज गंगानगर से ही गाड़ी हाईड्रोलिक लेके चल रही है चिंता की कोई बात नहीं. दो घूँट लिए ही थे कि डोरबेल बज उठी। हमेशा दरवाजा मैं ही खोलता था क्योंकि किसी के घर से बुलावा आने पर वो यहाँ है या नहीं और है तो कब तक आएगा का जवाब देना होता था। दरवाजे पर सोनी था, आंखों में शरारत चमक रही थी मैंने समझा लिया आज की रात बहुत छोटी होने वाली है।

रे भेन के बड़ी जम रही है इधर... उसने अन्दर आते ही अपना पसंदीदा वाक्य उछाला और चाकू ढूँढने लगा। रे सालों बिना सलाद के ना पीयो कर बिल्डिंग कंडम हो जावेगी जल्दी है। सोनी का पसंदीदा काम था सलाद काटना और उसमे ' साळी कुछ वैरायटी भी होनी चाये कि नहीं वाला अंदाज भी।

रोहतक से आने वाली रेल ने दस मिनट की देरी कर विश्वास दिलाया कि समय की कीमत हमेशा बनी रहेगी लेकिन ढक्कन साहब ने रिक्शे वाले का पिछवाडा थपथपा कर लेट निकालने का अपूर्व कार्य कर दिखाया डोरबेल बजी। ढक्कन साहब अन्दर कर इस तरह बैठे जैसे घायल बाज को ऊँचे पेड़ डाल मिल गयी हो।

हम देसी पी रहे थे सोनी और ढक्कन साहब ने अंग्रेजी से गलबहियां डाल रखी थी उनका दिल हमारे जितना बड़ा नहीं था हम सब को निरपेक्ष भाव से देखते थे। सबसे मुहब्बत थी, छोटी-बड़ी, जवान-बुढ़िया और विवाहित-कुंआरी का भेद अपराध तुल्य था शराब सिर्फ़ शराब थी।

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…