Skip to main content

मौज लेण की टेम मतबल आदमी के साथ आदमी फ्री

रे लंगङों थम बैठे हो यहाँ
इब तो मौज लेण की टेम आई है
ल्या रे बाबू मेरे भी ढक्कन भर पूरी तो....
सहायक अभियंता साब टांग चढाये मुर्गे से हो के आराम की मुद्रा में गए पीण आले सब बोतल ने देखते से आण आले टेम में कित्ते बजट की और जरूरत का हिसाब करण लगे जद के भागू ने अपणे कान पर हाथ धर के पता लगाया की कित्ती चढी है मरजाणी घराली ने 'बिना बताये शराब छुड़ाये' वाले हकीम के झांसे में आके सात दिन दवा दे दी
उसकी तो भेन के... आठवें दिन पता चला कि बरसों का खेलाड़ी भागू दो पैग में फ़ैल हो गया, गरीब की गधी लुटगी, इससे तो मर जाणा भला, भागू दो पैग अन्दर ठूंसता तो तीन बाहर गिरते, पानीपत से बड़ी लड़ाई चली कई दिनां के बाद भागू ने अपने जाट दिमाग का काम लिया फेर पता चला के बिना बताये दवाई काम करगी।

कान
धीरे धीरे लाल हो रहे थे मतबल के आज चढ़नी है।

चुस्की
दर चुस्की... साब बड़े मजे ले रया था के आँख चमक पड़ी।

रे
भगवान की लीला न्यारी पण बी से भी "न्याव" न्यारा से भाई आज तो मौज करा दी, के फैसला सुनाया है इब कोई भी किसी की ले सकता है बशर्ते "देणी है के थाणे जाणा है" की नीयत ना राखो मतबल के भाई "तूं राजी है तो भी लूंगा, नहीं है तो भी लूँगा" के मामलों को छोड़ कर कोई करो कहीं करो छूट मिल गई है।

सब
भेन के एक ही साँस में अपणे अपणे गीलास खाली कर गए, भागू की चढ़ने वाली उतरगी, कूद के बोल्या साब मतबल तो बताओ केहता सा अपणी पेंट की जिप ठीक करण लाग्या।

कमीने तो सब और इनमे सबसे भडा भागू बाक़ी सब ने ते गीलास खाली करे पण ये तो बिना बात सुने ही गधी चढ़ग्या ।

एक एक ढक्कन और डालो फेर सुनो लंगडों।

बाईबील के टेम से माईकिल के टेम तक यही झगडा चाल रया था के आदमी आदमी, की ले तो गुनाह है के नई ? इब आपणे देश में भी बात साफ़ हूगी के इब मरद के ऊपर दूजा मरद होवे तो उसको अपराध ना समझा जाके मातर मुर्गे के ऊपर मुर्गा समझा जावे, थम चूतियों को याद नहीं राजकपूर ने इक गाणा फिलम में धरा था, तीतर के आगे दो तीतर, तीतर के पीछे दो तीतर... इब समझे

सोनी साला दांत काढ के बोल्या थम सब न्यूं ही गांडू होए जा रए हो साब वे तीतर आगे पीछे थे ऊपर नीचे नहीं।
साब ने बात खटक गी " रे लंगड़ तूं मेरे से राजी हो जा कल फेर बाबू बुला के लावेगा पुलीस फेर न्याव केवेगा की पुलीस ने अत्याचार करा है, दो पीयार के पंछियों को अपराधी ठहराए जाने का ये मामला ढाई ढूस किया जाता है और सलाह दी जाती है के आयन्दा ऐसे काम में खलल डालने और हतोत्साहित करणे पे कड़ी सजा दी जावेगी "
न्यूं तो रगडा पड़ जावेगा भागू ने घर जाणा नी और भाभी ने किसी को घर आन देणा नी।

रे सर फुटवल्ल हूगी, भागू ने जूत की धर दी।

ईच
बीच बचाव में घणा टेम नी लाग्या गीलास की सौगंध पे पाल्टी फेर जमगी ...

इब आंख्यां तक आगी तो सोनी संजीदा होके बोल्या साब है तो ग़लत, समाज भ्रष्ट हो जावेगा लड़के बरबाद हो जावेंगे। इस्सका कोई फायदा नई।

सुण,
काल तक रामगोपाल्यो अर रघुवीरियो साथ-साथ ड्यूटी के लिए भेन के युनियन बाजी करते थे। आज मैंने पूछा के भाई तुम भी तो दोनों उस तरीके के तो नहीं हो, मरगे साले शरम से, इब इस जीरो हेड पे ड्यूटी का कोई संकट नहीं होगा, थम समझते हो के न्याव करण आले समझते नहीं।

भागू एस ज्ञान भरी बात के पूरा होने से पहले ही लुढ़क ग्या था सोनी ने घर की याद आगी तो उठ गया उसके बाद साब अर बाबू निकल पड़े छिन्न मस्ता के दरवाजे, रे ग़लत ना समझियो कोई
सिर्फ़ पीण वास्ते...ई ?


Popular posts from this blog

मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…