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अबूझ और उदास सपनों की रातें

एक धुंधलका था. चुप्पी थी और चंद शक्लें थी. कहीं जा रहा था. रास्ते की पहचान को लेकर कोई जिज्ञासा नहीं थी. संभव है कि एक दस साल के लडके का हाथ पकड़े हुए था या उसके साथ चलते हुए ऐसा फील होता था कि हाथ को थामा हुआ है. वह एक अनवरत घेरती हुई शाम थी. जैसे वक़्त के साथ शाम अपना रंग बदलना भूल गयी थी. सफ़र कुछ क़दमों पर रुका हुआ सा था. यानि कहीं जा नहीं पा रहा था और ऐसा भी नहीं था रुक गया हूँ. मन उदास, डूबता हुआ. कौन देस, कौन मुसाफ़िर... जिसे जानते थे, वो खो गया. अचानक प्यास लग आई. देखा दोनों बच्चे छत पर बिछी हुई चारपाई पर सोये हैं. नीचे बिछी हुई एक सफ़ेद रंग की राली पर मैं उठकर बैठ जाता हूँ.

शोर है. रौशनी है. कुत्तों की आवाजें हैं. रेल का इंजन शंटिंग की तैयारी में हल्की विशल देता हुआ घर की ओर बढ़ा आ रहा है.

दूसरी रात
अपने चश्मे को उतारता हूँ और आँखों के आगे धुंधले वृक्षों की कतार खड़ी है. आँखों को मसलते हुए फ़िर से खोलता हूँ मगर पेड़ों की कतार कायम रही. कनपटी से उतरता हुआ पसीना है. गीला और डरावना. एक बार फ़िर आँखें खोलते हुए अपना चश्मा लगा कर देखता हूँ. चश्मा भी ख़राब. उस पर भी गहरा धुंधलका. चश्मे के किनारों से कुछ सूझता है. यानि दुनिया बची हुई है मगर मेरी आँखें जवाब दे गयी है. चेहरा उदास हो जाता है. मन अधीर होने लगता है. बिना आँखों के जीने का ख़याल... चौंक उठता हूँ. बंद कमरे में ऐसी की ठंडक से बच्चे बेडकवर ओढ़े हुए हैं. जया तकिये की गोद में सर रखे सो रही है. मेरी चादर गायब है.

अँधेरा. विंडो ऐसी के फैन की आवाज़ और अचानक चुप हुए झींगुर. उन धुंधले पेड़ों से बिछड़े हुए एक पेड़ की तरह बाएं हाथ से बिजली का स्विच खोजता हुआ सीधा खड़ा होता हूँ. अलमारी के निचले हिस्से में रखी चादर लेकर सो जाता हूँ.

कल की रात
हरी भरी जगह है. एक ढलवां पहाड़ी पर दस पंद्रह कदम चलते ही दो नौजवान बातें कर रहे हैं. वे आधुनिक और एक अविश्वसनीय यन्त्र में लेट कर एक बेहद ऊंचे वाटरफाल से कूदने को तैयार है. सिहरन है. भय है. गिर जाने के असंख्य ख़याल है. पीछे नहीं मुड सकता हूँ. मेरा किसी से कूदने का वादा भी नहीं है. वे दोनों अपनी छलांग लगा देते हैं. मैं कूदने की जगह से नीचे देखता हूँ, एक अतल गहराई. वे टूटी हुए उल्का की गति से ओझल हो जाते हैं. मेरे भीतर की बुनावट के पत्थर आपस में टकरा कर शोर करते हुए टूटने लगते हैं मगर बाहर से उदासीन और साबुत दीखता हूँ.

अगली बारी मेरी है. असहाय और नितांत अकेला पानी की ओर खिंचा चला जाता हूँ. रो नहीं सकता. प्रतिरोध के लिए कोई नहीं है. पानी बुला रहा है. कोई मुझे देख रहा है. मैं गिरना नहीं चाहता...

किसका इंतज़ार है, क्यों बचे रहना है ?

* * *

सरल गायिकी के उस्ताद हैं. आलाप, गिरहें और सरगम को शब्दों में पिरो लिया है. समंदर खां और साथी दुनिया की चाल के साथ चलते हैं. इतना आसान गाते हैं कि मांगणियार गायन शैली से अलग नज़र आते हैं. हिचकी गाते हुए खड़ताल का सुन्दर प्रयोग इन्हें बचाए रखता है. तुम्हें समझ आये इसलिए इतना सरल गीत चुना है.

ओ सजन ये न समझना कि तुमसे बिछड़ कर मुझे चैन है. जल बिन मछली की तरह दिन रात तड़पती हूँ. सजन आये ओ सखी क्या भेंट करूँ, थाल को मोतियों से भर दूँ और उनके ऊपर रखूं अपने दो नयन.

मेरा पिया याद कर रहा है और मुझे हिचकी आ रही है, बाजरी के नन्हे दाने चिड़ियाएँ चुग रही हैं. ओ पिया मैंने तुम्हें मना किया था कि यूं परदेस न जाना वहां की जादूगर स्त्रियाँ तुम्हें अपने सम्मोहन में कैद कर के रख लेगी. तुम बिन मुझे छत सूनी लगती है और गढ़ गिरनार भी सूना लगता है. कुदरत ने पहाड़ के ऊपर सुन्दर पहाड़ रच दिए हैं ओ सुनार तुम तो मेरी पायल के लिए बजने वाले बिछिये घड़ दो. घर के आँगन में एक बेल लगी हुई है और उसमें से काला नाग निकल आया, वह डस ही जाता मगर मैं तुम्हारे भाग्य से बच गयी हूँ... ओ पिया तुम याद कर रहे हो और मुझे हिचकी आ रही है...

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…