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ऐ दोस्त तेरे लिए !


इस संदूक में जाने कितने ख़ुशी और अफ़सोस के मीठे नमकीन अहसास, विरह के आंसू और मिलन के उदात्त क्षणों की रंगीन झालरों के टुकड़े रखे हैं. मखाणे, बताशे और खटमिठियों के स्वाद के बीच सोने की चूड़ियाँ, गुलाबी पन्नों पर लिखे हुए सुनार के हिसाब, लाल रंग के गहने रखने के बक्से, पिताजी की कुछ डायरियां, बीकानेर के सरदार स्टूडियो में खिंची हुई मेरी माँ की श्वेत श्याम तस्वीर रखी है. और इस बड़े संदूक के अन्दर कीमती सामान रखने का एक छोटा संदूक भी है.

उम्रदराज़ अगड़म बगड़म के बीच रखे हुए इस छोटे से सदूक को माँ संदूकड़ी कहती है. इस पर किसी सिने तारिका की रंगीन तस्वीर छपी है. सुहाग की साड़ी में माथे पर लाल रंग की बिंदिया सजाये हुए नायिका, रेगिस्तान की दुल्हन से मिलती जुलती दिखती है. माँ जब भी बड़ा संदूक खोलती, एक खुशबू पूरे घर में बिखरने लगती. मैं दौड़ा हुआ उस तक पहुँच जाता. मेरा मन जिज्ञासा और मिठास की लालसा से भरा संदूक के आस पास अटका रहता. जब मखाणे खाने का मजा चला गया तो पहली बार देखा कि उस छोटे से सुन्दर संदूक की तस्वीर के पास से कुछ रंग उतर गया है.

मैंने पूछा. माँ इसको ये क्या हुआ ? माँ उस संदूक पर हाथ फेरते हुए शायद कुछ साल पीछे लौट गयी थी. मेरे ताउजी का सुन्दर पीला ऊंट और उस पर कसा हुआ पिलाण (काठी) माँ को विगत के हिचकोलों में खींच ले गया होगा. माँ को शहर तक पहुँचाने के लिए ताउजी ऊंट के साथ पैदल थे और माँ ऊंट पर मुझे लेकर बैठी थी. पिलाण के अगले सिरे पर लगी पीतल की सुन्दर खूंटी पर माँ ने अपनी कपड़े की थैली को टांगा हुआ था. उस थैली में यही सुन्दर सा नन्हा संदूक भी था. ऊंट की चाल के साथ पिलाण की खूंटी से रगड़ खाता गया और बाड़मेर आते आते उस पर गहरे निशान हो गए.

बरस बीतते गए और माँ अपना सुख दुःख समेट कर इसी डिब्बे के आस पास जमा करती गयी. उम्र की खरीदारी में क्या पाया और खोया इसका हिसाब नहीं होता. कितनी सुन्दर आरसियाँ आई. उनमें अपने चहरे देखे, खुश हुए और वे धुंधली होकर टूट कर बिखर गयी. माँ की सोने की चूड़ियाँ हर दो चार सालों में बदलती रही. कमर का कंदोरा उपेक्षित होकर सुनार के यहाँ टूट गया. पाँव की चांदी की कड़ियाँ एक दिन शहर के फैशन ने उतरवा दी आखिर हाथी दांत के चूड़े की जगह भी लाल रंग के मूठिये ने ले ली. कानों में पहने जाने वाली गोल टोटियों की जगह सोने के टॉप्स आ गए. गले की हंसुली की जगह सोने की चेन आ गयी. माँ के अधिकतर जेवर समय के साथ बदलते गए मगर यह छोटी संदूकची नहीं बदली.

मेरे नाना के पास भी ऊँटों का टोला था. माँ उनकी गर्दन से लटक कर उन पर चढ़ जाने में माहिर थी. कभी वैसे ही मामा मुझे लटका देते तो मैं रोने लगता. वे हँसते, नेनू ये लड़का कहां से लाई है ? ऊंट रोजाना पानी पीने जालिपा या उतरालाई नाडी तक जाया करते थे. मैं सिर्फ़ ऊंट की पीठ पर सीधा बैठने में ही खुश रहता था. ऊंट की पीठ से भेड़ें और छोटी दिखाई देती थी. समय के साथ आये बदलावों ने ऊंट को मनुष्य से दूर कर दिया. नाना ने सारे ऊंट बेच दिए. ताऊजी ने भी पीले ऊंट को बेच दिया. अब उसकी याद इस छोटे संदूक पर शेष है.

समय की अदृश्य नदी अपने साथ हमारे प्रियजनों को बहा ले गयी है. मेरे नाना, दादा, ताऊ, पिता, सब मामा और भी जाने कितने हँसते बोलते हुए चहरे अनंत में खो गए हैं. माँ चीज़ों से बातें करती हैं. उनके सुख दुःख पूछती है. छोटे भाई छुट्टी बिता कर वापस नौकरी पर जा रहे होते हैं तब घर के किसी कोने में आंसू सुखाती हुई कुछ बोलती है. जिसे सिर्फ़ ये पैंतालीस साल पुरानी दो हथेली पर रखने जितनी बड़ी संदूकची ही समझ सकती है. ये माँ की सच्ची मित्र है. मैंने माँ से कहा अपना संदूक दिखाओ ना... आज मित्रता दिवस है.

* * *

दोस्त आज तुम्हें लोकगीत करिया सुनवाता हूँ. करिया का अर्थ है नौजवान ऊंट. रेगिस्तान वासियों के सुख दुख के इस सच्चे साथी पर अनगिनत गीत रचे गए हैं. यहाँ के लगभग हर लोकगीत में इसका ज़िक्र आ ही जाता है. मुझे इस उदासीन दार्शनिक पर बहुत प्यार आता है कि ऊंट न होता तो रेगिस्तान की अनेक प्रेम कहानियां अधूरी रह जाती. इस गीत को हालाँकि मैंने ही रिकार्ड किया है मगर आदतन गफूर ने उत्साह में कुछ बंद अपनी मर्ज़ी से जोड़े घटाए हैं. यूं भी गफूर खाँ मांगणियार और उनके साथियों की गायिकी का मैं दीवाना हूँ इसलिए सब गलत सलत भूल जाता हूँ. गीत का आगाज़ एक दोहे से है जिसमें प्रेयसी कह रही है "ओ पिया तुम से तो ये जानवर भी अच्छे हैं जो दिन भर वन में चरते हैं और सांझ घिरने पर दिन के अस्त होने के समय तो घर की आस करते हैं".

ढोला थां सूँ ढोर भला, चरे वन रो घास
साँझ पड्या दिन आथमें करें घरों री आस.

सांवलें रे गैरो, म्हारे अन्नदाता रो करियो,
करिए रे घूघर माळ...
तड़के झकावों हाँ जी करियो रे, फड़के मंडावां पिलाण
सरवर सोने रा हाँ जी पगड़ा रे, मोतिड़े जड्योड़ी मुहार
करियो बंधायो हाँ जी कोटड़ी रे, घोड्लो गढ़ री भींत
करिए रे घूघर माळ.

गीत का भाव ये है कि मेरे पिया जी का सांवले रंग का सुन्दर नौजवान ऊंट है और घुंघरुओं की मालाओं से सजा हुआ है. भोर भये इसे झोक में बिठाएं और जल्दी से पीठ पर रख दें पिलाण (होदा). इसके सोने जैसे सुन्दर पाँव है और मोहरी (लगाम) में मोती जड़े हुए हैं, ओ नौजवान ऊंट तुझे बिठाएं मेहमानखाने के पास और घोड़े को बांधें गढ़ की दीवार के पास. इस सुन्दर गीत में नायिका ऊंट की प्रसंशा कर रही है और प्यार जता रही है ताकि वो इसके पिया जी को तुरंत घर ले आये.

तुम देखना एक दिन मेरे पास भी सुन्दर नौजवान ऊंट होगा और मैं उस पर चढ़ कर महबूब के घर चला जाऊँगा.

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…