मन के कीटनाशक

स्वप्न अर्थहीन नहीं होते। किंतु वे अरूप होते हैं। हम ऐसे लोगों को देखते हैं, ऐसे लोगों से बात और प्रेम कर रहे होते, ऐसे लोगों से घबरा रहे होते हैं, जिनके बारे में कभी सोचा न था। 

रात के रसायनों की अवधि समाप्त होते ही प्रातःकाल की निंद्रा से स्वप्न स्मृति लिए जागना, जितना असमंजस से भरा होता है, उससे कहीं अधिक उलझनों से घिरा हुआ दिखाई देता है। 

स्वप्न क्या मन से उपजते हैं या मस्तिष्क के अवचेतन में बची, अनजानी और न सोची गई बातों को एक सिनेमा के रूप में प्रस्तुत होती है? ये सब जाने क्या है किंतु इतना तय है कि एक ऐसी अविनाशी बेल है, जिस पर असमय नए पत्ते आ रहते हैं। हम कितने ही पूर्व को विस्मृति में खो चुके होते हैं लेकिन नए उत्साही, प्रेम और डरवाने दृश्य फिर उग आते हैं। 

मैं सियाही में पांव रखता हूँ। नहीं जानता कि इसका परिणाम क्या होगा। किंतु पाँव रखने के तुरंत बाद निरंतर भय की विषबेल को पसरते हुए देखता हूँ। इस बेल की जड़ सियाही में बहुत गहरी है। वहाँ तक मेरे समस्त उपकरण नहीं पहुंच सकते। इस से दूर भी नहीं भागा जा सकता कि जड़ मन के भीतर है। आशंकाओं से उसका निरंतर पोषण होता है। कोई कीटनाशक उतना प्रभावी नहीं है कि एक बार में जड़ सहित नष्ट कर दे। 

अब तक का पढ़ा लिखा नाकाम रहता है। कबीर मेरे प्रिय हैं। किंतु उनका "दुनिया से विरक्त होके दुनिया में जीये जाने का हुनर' मेरे पास नहीं है। वे अपने ज्ञान से मोहमुक्त हैं। मैं तो इतना अज्ञानी हूँ कि मेरा समस्त इसी जड़ संसार से बंधा हुआ है। 

अंधेरे में टटोलना और आँख बंदकर के सोचना कभी पूर्णता की ओर नहीं ले जा सकता है। एक आशा के बाद तीन निराशा हाथ लगती हैं। फिर मन को लगता है अपने समस्त जिये हुए को लेकर मुझे माफ़ी मांग कर आगे बढ़ जाना चाहिए। मुझे अपनी ही इस बार पर भरोसा नहीं होता कि एक साधारण व्यक्ति इतना साहसी निर्णय लेकर आगे बढ़ सकता है। 

कबीर मनहिं गयन्द है, अंकुश दै दै राखु। 
विष की बेली परिहारो, अमृत का फल चाखु॥’ 

मैं बाहर से आती रोशनी में धुंधले घर देखता हूं। उनके बारे में एक कच्ची छवि सी सोची जा सकती है। इस संसार का अंतिम सत्य या स्थाई सत्य क्या है? समझ नहीं आता। 

भीतर के अंधेरे में एक ख़ाकी कागज़ की थैली दिखाई देती है। जिस में मन के कीटनाशक रखे हैं। मैं दुविधा में रहता हूँ। न रोशनी की ओर बढ़ सकता हूँ न अंधेरे की ओर। 

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