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गलियों की लड़की मैगी और रेत में मशालें

दुनिया बर्फ में दबी जा रही है. मैं सुबह उठ कर देखता हूँ कि व्हाईट स्पाईडर लिली पर अभी फूल आने बाकी है. एलोवेरा के धूसर लाल रंग के फूलों की बहार है. दूब ने अब नई जड़ें निकालनी शुरू की है और इन सर्दियों में वह यथासम्भव भूमि पर बिछ जाने की तैयारी मैं है. पिछले पंद्रह दिनों से चुटकी भर धूप के निकलते ही छोटे भाई की बीस साल पहले खरीदी गई बाइक पर सवार हो कर गाँव चला जाता हूँ. गाँव की ओर जाने वाले रास्ते पर चलते हुए ऐसा लगता है कि कोई अपनी माँ के पास लौट रहा हो. पेड़, पत्थर, कटाव, मोड़, जिप्सम और जो भी रास्ते में आता है सब जाना पहचाना लगता है. इस सफ़र में कम होती हुई दूरी भावनाओं को गाढ़ा करती रहती है. फ्लेशबैक में आहिस्ता घुसने की तरह कैर के पेड़ों में बैठे हुए मोर पर क्षणिक नज़र डाल कर नई चीजों की ओर देखता हूँ. घरों के आगे बन आई नई चारदीवारी और काँटों की बाड़ें मेरी ध्यान मुद्रा को तोड़ती है.

सब रिश्तेदार गाँव में हैं. गाँव का एक ही फलसफा है लड़के लड़कियों के हाथ पीले कर दो कि बड़े होने पर रिश्ते नहीं मिलते. घर का कोई बूढा चला जाये, अब गाँव को जीमाणा तो है ही फिर क्यों ना बच्चों को निपटा दिया जाये. शादियाँ अभी कर देते हैं और बाकी बाद में बड़े होने पर होता रहेगा. ऐसे में एकाएक ख़बर आती है. भाई एक उठाऊ नारेळ आ गया है. कल सुबह आ जाओ. उठाऊ नारेळ यानि अचानक आया हुआ लग्न जो पहले से निर्धारित नहीं था. गाँव जाओ तो शहर की फर्जी व्यस्तता से मुक्ति मिलती है. देखता हूँ कि क्या बदल रहा है. कभी रास्ते में अकेला रुक जाया करता हूँ. बड़ा पेड़, अँधा मोड़ या फिर कुआ और तालाब जैसी जगहों के आस पास घंटा भर बिता लेता हूँ. सोचता हूँ कि सिगरेट और चाय पीने की आदतें होती या फिर हथेली में खैनी मसलने का चाव होता तो और भी मजा आता. तम्बाकू को रगड़ता और फिर हल्की थपकियाँ देकर चूना उड़ाता रहता.

परसों शहर की ओर लौट रहा था तब शाम होने को थी. चाचा के घर के बाहर बैठे हुए देखा सड़क के पार दो चिमनियों के ऊपर आग जल रही थी. ये आयल पोर्सेसिंग टर्मिनल की चिमनियाँ है. दिन में किसी विशालकाय मशाल जैसी दिखती है और रात को किसी ड्रेगन की मुखज्वाला सी. सामने एक बड़ा कारखाना बना हुआ है. रेत के धोरों के बीच ये एक जगमगाता हुआ टापू है. मेरे देश का बाईस फीसद कच्चा तेल यही से निकाला जायेगा. इन रेत के धोरों में उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में कल-कारखानों की क्रांति के समय से भी अधिक भयावह संक्रमण जारी है. इस विकास को देखता हूँ तो एक कथा की पात्र स्मृत होती है. उसका नाम मैगी था. मैगी की कथा रचते समय युवा पत्रकार स्टीफन क्रेन ने ऐसे ही संक्रमण को चिन्हित कर शब्दों में ढाला था. उन्होंने अपने स्वप्रकाशित प्रथम उपन्यास "मैगी : अ गर्ल ऑफ़ स्ट्रीट" के जरिये निम्न वर्ग के जीवन की दुरुहताओं को उकेरते हुए एक खूबसूरत लड़की की कहानी रची.

उस उपन्यास को पढ़ते हुए आपको कई बार बांग्ला साहित्य के पात्र याद आयेंगे. ऐसे पात्र जिनको मजबूरी में देह व्यापार को एक पेशे के रूप में चुनना पड़ा था. स्टीफन की नायिका अपने सारे फैसले जल्दी करती है. वह खूबसूरत है. उसके समक्ष चुनौतियाँ है. उसके माँ और पिता अव्वल दर्जे के शराबी हैं. समाज तेजी से अमीर होने की ओर भाग जा रहा है. एक दिन भाई के दोस्त से प्रेम हो जाता है और वह उसके साथ भाग जाती है. प्रेमी उसका अधिकतम उपयोग कर उसे ठुकरा देता है. घर लौटती है तो माँ और भाई स्वीकार नहीं करते... आखिरी रास्ता उसे बदनाम पेशे में ले जाता है और वह जल्द ही मर जाती है.

इस कहानी में सिक्स्थ सेन्स के बीज हैं. कुछ घटनाएँ स्टीफन के जीवन से मिलती जुलती है. पेशे से पत्रकार ये साहित्य सृजक इस उपन्यास के बाद एक वेश्या के बचाव के लिए व्यवस्था से लड़ता है फिर मात्र उन्नतीस वर्ष की आयु में दुनिया को छोड़ जाता है. पैसे के पंख पर सवार और मनुष्यों के ढूंगों पर कीमतों के गोदने का ब्लू प्रिंट लिए फिरते सौदागरों के समाज की इस कथा में जो दारुण दृश्य खुल कर सामने आता है. वह मुझे इस थार की ज़मीन पर भी दीखता है.

स्टीफन ने बहुत सारी कविताएं लिखी, निरंतर छोटी कहानियां लिखी और अख़बार के लिए लगातार काम किया था. क्या उसे कुछ अहसास था कि उसके पास बहुत सीमित दिन है. क्या मनुष्य के साथ भाग्य जैसा कोई टैग लगा होता है जिसमें उसकी एक्सपायरी डेट लिखी होती है ? कितने लोग ये अहसास कर पाते हैं कि उम्र प्रतिपल छीजती जा रही है और हमें दुनिया की इस यात्रा को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए. हमें निरंतर सामाजिक बदलाव को चिन्हित करते हुए अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ छोड़ कर जाना चाहिए. परसों में रेत के धोरे पर बैठा हुआ यही सोचता रहा कि इन बदलावों की कहानी कौन लिखेगा ? मैं कुछ और भी सोचता लेकिन रात होने के साथ रेत का तापमान तेजी से गिरता है और एक हल्का सा जेकेट मेरे लिए पर्याप्त गर्मी नहीं सहेज सकेगा.

इसलिए वहां से उठते हुए मैंने थोमस बीर को स्टीफन क्रेन की जीवनी लिखने के लिए धन्यवाद दिया कि इससे बहुत लोगों को दो खूबसूरत उपन्यासों और एक नौजवान की सोच से रूबरू होने का अवसर दिया. मैंने अपनी जींस पर चिपकी धूल को हटाते हुए दूर खड़े चाचा को देखा. वे अनार के झाड़ को इग्नोर करते हुए अपने काश्तकार से बात कर रहे थे. मुझे चाचा ने बहुत बार कहा है मेरे इस घर में रहो... मैंने कभी सोचा ही नहीं कि यहाँ रुक कर भले ही कोई महान रचना ना लिख सको फिर भी ब्योरे तो दर्ज कर ही दो. ये जगह भी इतनी सुंदर और शांत है कि यहाँ बैठ कर खूब शराब पी जा सकती है और सुंदर स्त्रियों के बारे में सोचा जा सकता है.

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
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मेरी आँखों में
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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…