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प्रेम का कोई तुक नहीं होता

उसे तो बात कहने का भी सलीका न था. साँझ ढले रात की चादर पर खुद को बिखेर देता. सूखे पत्तों के टूटने जैसी उसकी आवाज़ थी. कहता था कि मुझे रात के माथे की सलवटें गिनना आता है. इसी कारण देर तक जागने की आदत हो गयी है. सुबह अनार के फूलों पर आने वाली पतली लम्बी चोंच वाली नीले रंग की चिड़िया उसे कहती सुबह हो गयी है. वह कहता इतने सवेरे कैसे उठ जाती हो, तुम किसी से प्रेम नहीं करती क्या ? चिड़िया कहती हाँ करती हूँ. चिड़िया ने उसे एक अतुकांत गीत सिखाया. क्योंकि प्रेम का कोई तुक नहीं होता.

हर शाम संवरती थी, तेरे साथ से महकती थी
जिसमें कांटे चुने, जिसने सपने बुने
ये बीते दिनों की एक बात है
वो लड़की भी नहीं रही, वो दिन भी तो बदल चुके
और मैं भी कोई और हूँ....

बारहा न पूछो हवाओं से, अनमनी सी घटाओं से
इस किस्से में आएगा उसका नाम भी
जिसके हाथों उसका खून हुआ, ज्यों मरते हैं ख्वाब हज़ार बार
वो ख्वाब भी नहीं रहे, वो रुत भी तो बदल चुकी
और मैं भी कोई और हूँ...

ये सवाल ही गलत है कि ना सूद ना उधार थे
क्या देखना, क्या पूछना, उसके ज़ख्म बेहिसाब थे
गणित भी क्या कीजिये, झड़ चुके सब पात का, बीते हुए हालात का
वो सूखे पात भी नहीं रहे, वो हालात भी तो बदल चुकी
और मैं भी कोई और हूँ...

मोती तो सारे बह चुके, ना बाकी कोई आस है
मुझे शाम से अब इश्क़ है, तुझे सुबह की तलाश है
सुबह की तलाश, सुबह की तलाश है....

और वह किसी खोयी हुई उम्मीद की तरह लौट आई. घन गर्जन के बाद का सन्नाटा घनीभूत हो गया. सजल आँखों की कोरों पर उपत्यकाओं की ख़ामोशी ठहर गयी. खुशबुएँ तितलियाँ बन कर उड़ गयी. हसीन हैरानी की तरह दूर किसी देश के गुप्त खजाने के बीजक की कुंजी सामने खड़ी थी. वह अभागा गाने की जगह चिल्लाने लगा...

तुम जाओ कि रंग दू उदास शाम को
तुम जाओ कि भर दूं यादों के जाम को
तुम जाओ कि आवाज़ दूं तेरे नाम को
तेरे नाम को, तेरे नाम को, तेरे नाम को....

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…