March 24, 2012

तुम लौटा नहीं सकते

कितने साल हो गए कोई सस्ता सा लतीफा सुनाये हुए और आख़िरी बार कई बरस पहले दिल्ली के एक ढाबे पर दोस्त को दिया था धक्का. कितना ही वक़्त हो गया दस बीस लोगों के बीच बैठे हुए कि खो दिए दोस्त और किसी एक झूठी बात के लिए रोते ही रहे.

तुम लौटा नहीं सकते बरबाद दिनों को
और मैं भूल भी नहीं सकता हूँ उनको. 
मुश्किलों के बाद सख्त हो गया है दिल
कहो अब करें भी क्या इसका
कि इसे छूना नहीं चाहता है, कोई संगतराश.  

हालाँकि आदमी आया नहीं है दुनिया में
खिलने फूल की तरह
उसे उठानी है आसमान को छूती हुई
मेहराबें ईमान की,
उसे खिलानी है रौशनी इल्म की. 

मगर उम्मीद बाकी है, मेरे पास
कि एक नन्हीं लड़की के हाथ में है जादू
चीज़ों को वापस असल शक्ल में लाने का.
हालाँकि कोई भी
लौटा नहीं सकता है, किसी के बरबाद दिनों को.
* * *

[Image courtesy : Satya]

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Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.