An illegally produced distilled beverage.


June 1, 2014

याद की पगडंडियाँ और सुख

हवा हर कोने में रखती है ज़रा ज़रा सी रेत। रेत पढ़ती है रसोई की हांडियों को, ओरे में रखी किताबों को, पड़वे में खड़ी चारपाई को, हर आले को, आँगन के हर कोने को।

रेत कहीं जाती नहीं, बस आती रहती है।
रेत सुख की तरह आकर उड़ जाने की जगह हर कोने में पसरी रेत से मिलकर चादर बुनती है मगर दुःख नहीं है रेत। ये बस इसकी एक आदत है दुखो की तरह आना और फिर ज़िद्दी होकर पसरते जाना।

रेत उड़ती है तो ये सुख हुई न।

एक घना सुख, गहरे समंदर, ऊँचे पहाड़ और असीम रेगिस्तान जैसा होता है। ऐसे विशाल, वृहद् और पैमाइश से बड़े सुख की पहचान भूलवश दुःख के रूप में की जाती है।

भूल फिर होती है कि सुख ऐसी चीज़ों को समझ बैठते जैसे दो पहाड़ों के बीच कहीं एक गीली नदी बहती हो, रेगिस्तान के बीच सात सौ हाथ गहरे कुएं में खारा पानी रहता हो और जैसे समंदर के बीच किसी टापू पर बची हो थोड़ी ज़मीन।

रेत, पत्थर और पानी जहाँ असीम है वह असल सुख है। नदी, गहरा खारा पानी और ज़रा सा ज़मीन का टुकड़ा सुख में दुःख का छलावा घोलता है। ये विलासिता रचता है। ऐसी विलासिता जो हमें भिगोती सुखाती है कुछ इस तरह कि रेगिस्तान प्यास से भरा उड़ता बिखरता रहता है, पहाड़ अपनी कौंध, तपन और ठंडी सिहरन भरी चादर को फैंक देना चाहते हैं। समंदर की, ज़मीन की ओर भाग जाने की बेचैनी भी वाचाल बनी रहती है।

असल सुख को दुःख समझने से ही दुःख का अवतरण होता है। इतने बड़े सुख को भोगने का सामर्थ्य नहीं इसलिए उसे दुःख कहकर मुक्त होना चाहते हैं।

दो दिन से रेत उड़ उड़ कर आ रही है। मैं बालकनी में बैठा होता हूँ। पैमाइश कर काटे हुए ज़मीन के टुकड़ों पर अभी घर नहीं बने हैं इसलिए पगडंडियाँ बची हुई है। उन पर चलकर कोई नमी आँख में भर आती है। एक टीस उठती है और मैं खुश हो जाता हूँ कि अपने उसी विशाल, असीम, वृहद् सुख के बीच हूँ जिसे भूल से कभी कभी उदासी, तन्हाई समझ बैठता हूँ।

याद ही तो असल सुख है

* * *

सुखों की लिप्सा और दुखों के नैराश्य एवं पीड़ा से भरे ज़िन्दगी के इस बीहड़ में हम आँख मूँदे हुए आए। जैसे युद्ध भूमि में रात के अबोले को तोड़े बिना कोई सिपाही छतरी से टंगा उतरा हो।

हमने युद्ध आरम्भ करने के लिए अँधेरा इसलिए चुना कि हलचल और पहचान को छुपाये हुए सुरक्षित रहें। हम बचे रहें संकटों की नज़र से। हम अपने कार्य को निर्बाध करते रहें।

समझ होने का भुलावा ख़ुद को आने लगा तो हमने अँधेरे का तिरस्कार आरम्भ किया। हमने उजाले की धार को मित्र जाना। हमने खुद को उस बुत की तरह खड़ा किया जिसे प्रशिक्षु रंगरूट अपनी बंदूक की नोक से बींधता हुआ पारंगत होता है।

अँधेरे में जो सुरक्षा चुनी थी उसे त्यागकर उजाला अपनाया और दुखों की चुभन से बिलबिला उठे। रहम की अर्ज़ियाँ रखने के लिए नाना ईश्वर गढ़े। प्रार्थनाएं रचीं। दंडवत हुए। कई रंगों के वस्त्र धारण किये। पत्थरों को भाग्य समझ सीने से, कलाई से लगाया। सर पर मुकुट बना कर पहना। मगर आखिर दुःख के साथ खुद को सूचित किया कि हम खेत रहे।

वह क्या प्रयोजन था कि हम अंधरे में चुपचाप आये थे।

दृश्य को देखना, समझना और उसके साथ अपने सम्बन्ध को पहचानना और फिर अलोप हो जाना था। हमें सुखों से प्रेम उस योद्धा की तरह करना था जो अपनी बंदूक के बट पर ठोडी टिकाये मातृभूमि को निहारता रहता है। लेकिन हम सुखों के पीछे भागे जैसे लालच से भरा सियार रेगिस्तान के खरगोशों के पीछे भागता हुआ हांफ कर मर जाता हो। हमें दुखों से मल्लयुद्ध करना था, आओ आजमाओ। मगर हम दुखों से इस तरह लिपटे जैसे सहवास की पुरजोर हवस से भरे हुए हों। हमने दुखों के साथ रहकर और दुःख बुने।

वो नन्हा सिपाही क्यों उतरा था उस जादुई छतरी से मुझे मालूम नहीं।

मैं बालकनी में बैठा हुआ देखता हूँ कि कितनी ही भौतिक चीज़ें दौड़ी, भागी, उड़ी जाती हैं। कितना ही शोर सड़कों गलियों में बरपा है। मौसम का मिज़ाज भी तल्खी से भरा है मगर मेरे चेहरे पर ख़ुशी है।

ज़िन्दगी जा नहीं रही, प्रेम को जी रही है

डरते हैं बंदूकों वाले