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बेशकीमती चिट्ठी - मलयालम में अनुवाद

ये ठीक बात है कि मैं हिंदी पढ़ना चाहता था. मैंने साहित्य में स्नातक किया. मेरे मन में लेखक होने के प्रति गहरा चाव था. इस सबके बावजूद मैंने कभी लेखन को गंभीरता से नहीं लिया था. मैं अपनी आरामपसंद ज़िंदगी का ही दीवाना रहा. मैंने कम सुविधाओं में अपने मन का पोषण किया. जो मिला वह पढ़ लिया. मजदूरों के साथ रेलियां कीं. छात्रों के साथ हड़तालें की. तेईस बरस की उम्र से रेडियो में नौकरी करने लगा.

नौकरी करते, शराब पीते, खूबसूरत ख्वाब देखते और घर बनाते हुए बीतता गया. 

फिर अचानक लिखना शुरू हुआ. आंधी का कोई बीज था और फूट पड़ा. बूँद में समाया हुआ दरिया था बह निकला. हाथ से फिसल कर वक्त की अँधेरी सतह के नीचे गिरे हुए अक्षर थे, अपने आप उगने लगे.

सब कुछ अचानक, दफ़अतन, सडनली.

नौजवान होने के जो दिन थे, वे शहरों में घूमते, दोस्तों से कवितायेँ सुनते, सिगरेट के धुंए भरे कमरे और छतों पर शामें बिताते, गाँव के स्कूलों के बच्चों से बातें करते और किसानों से उनके अनुभव सुनते हुए बीते थे मगर जो कहानियां लिखीं वे सब नाकाम मोहब्बत की कहानियां निकली.

अक्सर भाग जाता था. चुप्पी की गहरी छायाओं में खो जाता था. शहरों से दूर बिना कुछ बताये. इसलिए कि किसी को कुछ कहने की आदत न थी. लगता था जो बात कहना चाहता हूँ उसका मोल नहीं है. वह बात इसी लम्हे बिखर जायेगी. बाद चुप्पी ही श्रेष्ठ थी. अपनी उदासी, तन्हाई और बेकसी को अपना करते जाना.

कहानियां क्यों इस कदर टूटन से भरी है? उनमें इतनी तन्हाई और कितना सारा वीरान रेगिस्तान बसा है. कैसे कोई अपनी बेदिली को शब्द देता है, ये सब नहीं मालूम.

तीन किताबें बन पड़ीं. दोस्तों ने पढ़ी, वाह वाही की. आलोचकों ने मिठास भरी नज़र रखी. पत्रिकाओं ने प्रेम से प्रकाशित की. सब तरफ बिना किसी कोशिश के कहानियां फैलती गयी. मेरे अपने शहर के लोग, मेरे रेगिस्तान के लोग, मेरे हमजोली, मेरे जानकार सब खुशी भरे अचरज में डूबे. एक छोटे से भी छोटे नाम केसी की पहचान दूर दूर तक.

लोग खूब एफर्ट लेते हैं. मैं कुछ नहीं करता. मुझे मालूम है कुछ भी स्थायी नहीं है, ख़ामोशी के सिवा जो कुछ है एक दिन बचा नहीं रह पाता. नाम के लिए जीने वाले लोग भुला दिए गए. यश का कोई भरोसा नहीं है. कथा कविता की उम्र क्या है कोई नहीं जानता. आज की खुशी आज भर चले ये भी ज़रुरी नहीं. दुःख ज़रूर कुछ दिन टिके रहते हैं मगर आख़िरकार उनका भी नाश हो जाता है.

मैंने किताबों का कुछ नहीं किया. बस शैलेश भाई से पूछा था छापोगे? उन्होंने कहा- पढाओ. मैंने दो कहानियां पढवाई और फिर वे दो किताबें बन गयी. जिस हिंदी को लोग उपेक्षा से देखते हैं उसी हिंदी को शैलेश ने ऐसी पहली किताब दी जिसकी प्री बुकिंग हुई. ये शैलेश भारतवासी का ही आइडिया था. मैं कहता पचास एक किताब बिक जाये तो समझेंगे जिन दोस्तों ने किताब मांगी थी उन्होंने खरीद ली है. मगर दृश्य कुछ और बन गया. पचास दिन में किताब का दूसरा संस्करण आया.

अहा ज़िंदगी, आउटलुक, भास्कर, जागरण, प्रथम प्रवक्ता और जाने कहाँ कहाँ किताबों की चर्चा हुई. सबने कहा- बढ़िया, खूब बढ़िया.

मैं मगर आदतन जैसा था वैसा ही रहा. अपने मन के जीवन को जीता रहा. दफ्तर, घर, महबूब और शराब. जब मौका मिला और दिल हुआ तब लिखता गया. कुछ पुराने ड्राफ्ट थे जिन पर काम करता था. लेकिन पिछले महीने नयी किताब का मन हुआ तो नयी कहानियां लिखनी शुरू की. पहली कहानी का ड्राफ्ट बनाया- परदे के पार चिड़िया. दोस्तों को पसंद आया. अब कुछ और लिख रहा हूँ.

आज एक चिट्ठी मिली. कायदे से उसके मिलने की कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए थी. पिछले बरस जब आउटलुक में कहानी आई तो उसके साथ मेरे पते में स्टेडियम रोड की जगह स्टेशन रोड हो गया और पिन कोड बिल्कुल गलत. छः एक महीने पहले एक चिट्ठी आई थी वह भी घूमती फिरती. आज जो चिट्ठी आई वह ब्यावर पहुँच गयी थी. वहाँ से किसी सज्जन ने इसे बाड़मेर का रास्ता दिखाया.

चिट्ठी बेशकीमती.

मलयालम भाषा के विद्वान और पालघाट में स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य श्री वी डी कृष्णन नंपियार जी ने आउटलुक के सितम्बर 2013 के अंक में छपी मेरी कहानी “प्रेम से बढ़कर” का अनुवाद मलयालम भाषा में किया. ये अनुवाद वीक्षणम पत्रिका के ओणम विशेषांक सितम्बर 2014 में छपा. इस पत्रिका की प्रति मुझे भेज दी गई थी किन्तु चिट्ठी की तरह वह मुझ तक नहीं पहुँच पाई.

किसी अन्य भाषा में अनुवादित होना गर्व की बात है. ये कोई मूल्य चुकाकर करवाया हुआ अनुवाद नहीं है. ये एक विद्वान किन्तु मेरे लिए अपरिचित आदरणीय का कथा को दिया हुआ सम्मान है. जिस व्यक्ति के पास मेरा सही पता और फोन नंबर भी नहीं है. कितने प्रेम से इस कहानी को उन्होंने बरता होगा.

मैं दफ्तर से घर आया तब ये खुशी मेरे गले लगने को थी. दोस्त मुझे कहते हैं- आपको मालूम नहीं है, आने वाले समय में हर भाषा में आपकी रचनाओं का अनुवाद होगा. हर भाषा में आपको प्रेम और गहरे दिल से पढ़ा जायेगा.

इस बात पर मैं हमेशा हंस कर चुप हो जाता रहा. लेकिन आज मेरा जी चाहता है उन दोस्तों की दुआओं का शुक्रिया कहूँ.

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
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उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…