ठीक तुम्हारे पीछे - मानव की कहानियां

एक रोज़ उसका फोन आया. उसने कहा आपकी तस्वीर बहुत अच्छी है. आपकी तस्वीर का बैकड्रॉप बेहद सुन्दर है. फिर एक रोज़ वो मेरे सामने थी. उसने कहा- केसी ! आप दीखते भी अच्छे हैं. जाने क्यों मेरे मुंह से निकला बैकड्राप के बारे में क्या ख़याल है? असल में मेरे पीछे का दृश्य किसी भी प्रकार से सुन्दर न था. ये एक छोटे से हवाई अड्डे का हिस्सा था. जहाँ पार्किंग का टाइम बचाने के लिए भागने को तैयार खड़ी कारों की कतार थी. दो चार लोगों के सिवा हर किसी की नज़रें कोई किसी न किसी खोज रही थी. मैं अपने पीछे के दृश्य बिना देखे देखते हुए उसके चहरे की तरफ लौटा तो पाया कि वह मुस्कुरा रही थी. मैंने पल भर को सोचा कि मुस्कुराने की वजह क्या है? मैंने अपने चेहरे को ऊपर उठाते हुए इशारा किया कि क्या? उसने कहा- बैकड्राप.

मुझे एक दोस्त की याद आई और जयपुर का हवाई अड्डा याद आया. 

सुबह तीन बजे थककर बिस्तर से उठ गया था. रात साढ़े बारह बजे जो आँख लगी थी वह दो बजे खुल गयी. पानी पीने और वाशरूम हो आने के उपक्रम के बाद कोई कितनी देर बिस्तर पर पड़ा रह सकता है. मैं रोज़ सोचता हूँ कि सुबह जल्दी उठूँगा और देर तक नेट सर्फ करूँगा. मेरा डेटा प्रोवाइडर सुबह के वक़्त फ्री डेटा देता है. मैं कभी उठ नहीं पाया. जिस तरह आप जब उठना चाहते हैं तब नहीं उठ पाते, उसी तरह कई बार आप गहरी नींद सोना चाहते हैं और नहीं सो पाते.

मैं जिस कहानी संग्रह को बेताब था, वह बहुत पहले आ गया था. उस भले आदमी को मैंने आज से आठ एक साल पहले कभी-कभी पढ़ा था. कभी-कभी इसलिए कि मुझे रोज़ पढने की ज़रूरत नहीं होती. मेरे अन्दर एक बियाबां है. वहां कुछ मृदा पात्र पड़े हुए हैं. वे देखने में तो अनगढ़ तरीके से रखे, फेंके हुए या यूं कहूँ कि बेदिली से ठुकराए हुए जान पड़ते हैं. मगर उनका इस तरह होना ही एक खूबी हो गया है. कि जब कभी मेरे मन में उदास हवा चलने लगती है तो मृदा पात्रों के भीतरी हिस्से और बेढब पड़े होने का ढब हवा को संगीत में ढाल देता है. हवा किसी कुल्हड़, किसी सुराही, किसी तांवणीए या ऐसे ही किसी पात्र से अलग अलग सुर पाती है. मन में एक वाद्य वृन्द रूपायित हो उठता है. तो बहुत साल पहले मैं जब कभी इन सुरों के करीब होता था तब मानव कौल के ब्लॉग का फेरा दिया करता था. वहां पहली नज़र में मुझे ऐसा लगता कि एक आदमी अपने आप से अनेक बातें करता है. जैसे बीजगणित की पहेली में बाहर से कुछ भी लिए बिना भीतर ही अंकों के हेरफेर और संयोजन से हल खोज लिया जाता है. वैसे ही मानव के पास कई मानव हैं और वह उन सब मानवों से एक मानव को सुलझा लेता है. कई बार मानव की बात दरिया के कटाव से बनी नुकीली पहाड़ी के छोर की तरह ठहर जाती है. मैं उसी जगह बैठना पसंद करता था. वहां पहुंचकर मुझे लगता कि अब इस दृश्य को मन की आँखों से समझा जाये. असल में उस समय मैं खुद को कुदरत को सौंप देता थावे शब्द सहारा थे.


सरगोशी की तरह मानव के कहानी संग्रह की बात कान में पड़ी थी. मैं अचानक कई साल पीछे लौट गया. मैंने कहा कि मुम्बई में रहने वाले मानव कौल जो कश्मीर से भी वास्ता रखते है. जिनको अधिकारपूर्वक चंदा माँगने वालों को देखकर ख़ुशी नहीं होती. वह जो व्यक्ति की निजता को एक समूह में बदल दिए जाने की खिलाफत करता है. शैलेश मानव को मुझसे ज्यादा जानते थे. उन्होंने कहा- आपने कहानियां पढ़ी हैं. मैंने कहा- हाँ वे मुझे पसंद हैं. शैलेश ने बताया कि उन्होंने कहानियां बहत साल पहले लिखी थी. मैं उन कहानियों को याद करने लगा. मगर मुझे छायावाद में घुला दर्शन याद आता रहा. मैंने फिर ये याद किया कि मैं मानव को कैसे भूल गया हूँ. भूलना ऐसे कि शैलेश मुझे प्यार करते हैं. मैं इसका काफी फायदा उठाता हूँ. जैसे मैंने उनसे कहा कि मैं चाहता हूँ आप प्रत्यक्षा, प्रमोद सिंह, अशोक पांडे और संजय व्यास को छापेंगे तो मुझे अच्छा लगेगा. मुझे नहीं मालूम कि अशोक पांडे का लपूझन्ना कब पूरा होगा और उसे कौन छापेगा. प्रत्यक्षा परदेसों में की गयी अविराम यात्राओं की कहानियां कब लिखेंगी. मगर मुझे मानव कौल की याद आनी चाहिये थी. 


आज सुबह या यूं कहूँ आधी रात के बाद से मानव कौल का कहानी संग्रह ठीक तुम्हारे पीछे अलमारी से निकाल लाया. ये किताब बहुत दिनों तक शयनकक्ष में पलंग पर रही थी. फिर मैं जाने किस दुनिया में चला गया कि किताब चुपके से अलमारी में एक दूजे के ऊपर रखी किताबों में शामिल हो गयी. आभा जब भी स्कूल से आती है मुझे पहला सवाल पूछती है, क्या पढ़ रहे थे? मैं उसे बता दिया करता हूँ कि कुछ काम किये. थोडा पढ़ा, थोडा सा लिखा और कुछ नहीं. मानव की किताब के आने के बाद तीन दिन में एक मुस्कुराने जैसी बात हुई. मैं दफ्तर से आया और मैंने आभा से पूछा क्या किया? वह बोली पहली कहानी पढ़ी आसपास कहीं. वह स्कूल से आई और उसने पूछा क्या किया? मैंने कहा- मुमताज भाई पतंग वाले पढ़ी. फिर जब अगली बार मैंने पूछा तो उसने बताया कि अभी-अभी से कभी का पढ़ी. और आपने? मैंने कहा- मुमताज भाई पतंग वाले पढ़ी. वह बोली ये आप पढ़ चुके थे. मैंने कहा हाँ. अगली बार आभा ने एक और कहानी का बताया. कहा अच्छी है, ये कहानियां बातें खूब करती हैं. फिर अगले दिन उसने कहा- कुछ पढ़ा क्या? सुना दो. मैंने कहा आज फिर एक कहानी पढ़ी. वह बोली कौनसी. फिर मेरे कुछ कहने से पहले खुद ही जवाब दिया. मुमताज भाई पतंग वाले. इसके बाद हम दोनों देर तक मुस्कुराते रहे. उस दोपहर सांगरी का साग बना था और छाछ खूब भली ठंडी थी.

मुझे उस लड़की की याद इसलिए आई कि उसने कहा था- बैकड्राप सुन्दर था. मैं मानव की कहानियां पढ रहा होता हूँ तब कहानियों का बैकड्राप मुझे सम्मोहित करता है. आप जानते ही होंगे कि एक हर कथा में एक अव्यक्त कथा प्रवाहित होती है. वही उसका बैकड्राप होती है. जैसे किसी तस्वीर में पीछे उतर आया दृश्य वैसे ही अजाने संवाद और कथानक के सघन बुनाव में कोई एक रेशा ऐसा आ जाये जो अनेक अर्थ देता हो, वही कहानी का बैकड्राप है. मानव की भाषा लकीर के उस या इस तरफ चलती है. या तो पात्र बोलते हैं या कथा कहने वाला अविराम कहे जाता है. मुझे दोनों प्रिय हैं, ये कहना ठीक न होगा. मुझे वो ज्यादा प्रिय है जहाँ मानव खुद कहते जाते हैं.

मुमताज भाई पतंग वाले, वो पहली कहानी थी जिसे कोई सात आठ साल पहले पढ़ा था. और इसका पाठ मुझे छूकर गुज़र गया था. मन ने चाहा कि वही छुअन फिर-फिर आये तो इसे कई बार पढ़ा. ये कहानी प्रतीक्षा की कहानी है. अगर आप सतही तौर पर इसे पढेंगे तो पाएंगे कि एक पतंगबाज़ और उसका नन्हा दीवाना और पतंगबाज़ी से जुड़ी हुई घटनाएँ हैं. असल में कहानी का स्थायी भाव है प्रतीक्षा. एक नन्हा लड़का पतंगों के संसार के सम्मोहन में डूबा हुआ टपरी में पतंग बेचने वाले मुमताज भाई को अपन आदर्श मानता है. वह लड़का एक दिन अच्छा पतंगबाज़ बनना चाहता है. मुमताज भाई सायकिल के पंचर बनाने के पेशे से पतंग की दूकान खोलने का ख़्वाब देखते हैं. इस ख़्वाब का वजन ये है कि वे अपनी सुहागरात को पत्नी को बताते हैं कि वे पतंग बेचना चाहते हैं. लड़के के जीवन में उडती हुई पतंगों के सिवा बाकी सब ठहरा हुआ है. निर्जीव है. मुमताज भाई का सफ़ेद लिबास फुग्गे वाले की छड़ी की तरह है. जिसपर अनेक रंगबिरंगे फुग्गे टंगे हैं. तो मुमताज़ भाई के सर पर मंडराते हुए अनेक रंगों के पतंग हैं. उनके हाथों में कांच लगे माझे से कटने के निशाँ हैं.

कहानी के मध्याहन में नन्हा लड़का अपने सपनीले संसार में चुभी हुई नुकीली वास्तविकता से आक्रोशित होकर किसी रात पतंगों की टपरी को आग लगा देता है. इसी एक घटना के दो तरफ अकूत प्रतीक्षा है. एक तरफ शानदार पेंच लड़ा रहा माहिर पतंगबाज़ बनने की प्रतीक्षा दूसरी तरह जलती हुई टपरी से उठते धुएं की असहनीय गंध और बेचैनी से मुक्ति की प्रतीक्षा. कहानी के रस इतने सरल हैं कि वे साथ बहा ले जाते हैं. हम अपने बचपन के फेरे लगाने लगते हैं. कहानी में भावनाओं के आवेश हैं. वे स्पार्क करते हैं. कथा की सुघड़ता से इतर कुछ एक पंक्तियाँ ऐसी है कि विस्मय, हास्य, विनोद, प्रहसन जैसे किसी भाव से आपको छूकर गुम हो जाती हैं. उनको रूककर पकड़ कर लाना होता है.

अरे को भाई, क्या ख़याल है?
ख़याल दुरुस्त है मुमताज भाई.

सच तो ये है कि मैं इन कहानियों से आनंदित हो सकता हूँ मगर आपको बता नहीं सकता कि ये कहानियां कितनी अच्छी है. मुझे बहुत से चाहने वाले कहानी लिखने के बारे में पूछते हैं तो मैं उनसे कहता हूँ कि हिंदी कहानी में केसी कोई नहीं है. न वह कुछ होना चाहता है. फिर वे कहते हैं आप क्या पढ़ते हैं? तो मैंने उनको अनेक नाम गिनाता हूँ. आज मैं एक और नाम जोड़ना चाहता हूँ कि मैं मानव कौल को भी पढता हूँ.

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