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उन दिनों के बुलावे

परिवार का संकुचित जीवन, घर की चारदीवारी में बंद स्त्रियां और धन संग्रह की भावना राज्य की एकता और उसके समस्त घटकों के स्वतंत्र विकास की क्षत्रु है ~ अफलातून।

कुछ दोस्त मेरी डायरी के सबसे पुराने पन्ने ही पढ़ना चाहते हैं। वे असल में बार-बार उन्हीं पन्नों को पढ़ते हैं जिनमें जीवन के दुख और चाहनाएँ अनावृत हैं। जहाँ एक व्यक्ति सरलता से अपनी खामियों का चित्रण करते हुए, समाज के मानदंडों को अस्वीकार करता।

मैंने सचमुच वैसे डायरी लिखना छोड़ दिया है। ये भयग्रस्त होने का प्रमाण है। मैं वर्जनाओं के शंकु से घबरा कर दैहिक और मानसिक अपेक्षाओं को छिपाने लग गया हूँ। मैं अब नहीं लिखता कि किस आदर्श जीवन की अवधारणा गिरहें बनकर मेरी साँस को रोक लेती है। मैं ये भी नहीं लिखता कि हताशा, उदासी और अवसाद की पीड़ा से भरा जीवन कैसा दिखता है। एक दोस्त ने कहा कि जब तक आपको कोई जानता नहीं है तब तक आप लिखते है। जब आपको जानने का दायरा बढ़ता जाता है तब वह आपको अधिग्रहित कर लेता है। उसके बाद लिखना होने की जगह लिखवाना होने लगता है।

मैं कहता हूँ- हाँ, ये सत्य है। इसी सत्य की घबराहट में मैं अपनी कहानियों को स्थगित करता हूँ। मैं ऐसी कोई किताब नहीं चाहता जिस में बाहरी दबावों की लिखाई दिखे। वस्तुतः प्रेम करना, चाहना से भरा होना, दैहिक लालसा में बहना, कथित व्यभिचार में लिप्त होना और अनैतिक सम्बन्धों को जीना लिखना कठिन है। इसलिए कि कुछ एक रचनाएं और पुस्तकें आने के बाद आपके जीवन को सार्वजनिक मान लिया जाता है। तब आप लेखक हो चुके होते हैं और समाज के प्रति आपके दायित्व याद दिलाये जाने का अधिकार हर पाठक और परिचित को स्वतः मिल जाता है।

हम सब भीतर से कोमल होते हैं। कोमलता जब तक गहरी न हो उसे कमजोरी कहा जाना ठीक है। कि बेहद कोमल को तो तोड़ पाना असम्भव होता है। लेकिन हमारी भीतरी कोमलता वस्तुतः सख्त होने से पहले की स्थिति भर होती है, जो छोटी बातों से आहत होकर टूटती रहती है। हम जल्दी जजमेंटल होते हैं और फतवे सुनाने लगते हैं। ये ऐसा है तो इसका आशय ये है और इस स्थिति में केसी आपका प्यार, एक दिखावा है।

मैं कई बार तय करता हूँ कि ब्लॉग करने लगूँ। और हर बार ये पाता हूँ कि मेरे जीवन आरोहण में अब तक बहुत सफर हो चुका है और लोग इस बात से अनजान हैं। वे किसी पुरानी या बेहद पुरानी अपनी ओछी जानकारी से अर्थ ग्रहण करने लगेंगे। वे इस बात को कभी नहीं समझ पाएंगे कि मैंने जहाँ लकीर खींची थी, उसके आगे किसी सम्बन्ध के निकल जाने के बाद मेरे वृत्त में खालीपन के सिवा कुछ नहीं मिलेगा।

मैं किसी के प्रेम में नहीं हूँ। मैं किसी के प्रेम में था। इन दो स्थितियों के अतिरिक्त नवीन घटना ये है कि मैं अक्सर अपने बीते दिनों में लौटने का सोचता रहता हूँ। वे दिन जहाँ एक कच्चा और रूमान से भरा गैरज़िम्मेदार जीवन मुझे आमंत्रित करता है।

एक खोखला जीवन, दूसरे खोखले जीवन से मिलकर दुगना शोर करता है। तुम अपनी आवाज़ से पता करो कि भीतर का दृश्य क्या है? कहीं तुम आदर्श, व्यवहार, प्रतिष्ठा, सम्मान, प्रतिबद्धता जैसी बातें करते हुए भीतर से खोखले तो नहीं हो गए। क्या अब भी तुम किसी निषेध को आगे बढ़कर चूम सकते हो?

जाने क्यों, इन दिनों लगता है कि मैं कुशलता से उन्हीं दिनों में लौट जाऊँगा। जहाँ मैं केवल मैं था।

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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

मन में छुपे बुलावे

टूटे पंख की तरह  कभी दाएं, कभी बाएं  कि कभी हवा में तैरता मन। 
आँखें पास की दीवार, छत, पेचदार सड़क या खुले आसमान की ओर रह जाती है जबकि मन चुपके से कहीं दूर निकल जाता है। मैं उसी जगह बैठा हुआ पाता हूँ कि खोया हुआ मन जहां गया है, वह कोई चाहना नहीं है। मन का जाना ऐसा है जैसे वह निरुद्देश्य भटक रहा है। 
मैं उसे पकड़कर अपने पास लाता हूँ। उसी जगह जहां मैं बैठा हूँ। वह लौटते ही मुझे उकसाता है। अब क्या करें? मैं भी सोचता हूँ कि क्या करें? कुछ ऐसा कि नींद आ जाए। थकान आँखें बुझा दे। कोई मादक छुअन ढक ले। कोई नशा बिछ जाए। ये सब हो तो कुछ ऐसा हो कि जागने पर नींद से पहले का जीवन भूल सकें। 
यही सोचते, मन फिर बहुत दूर निकल जाता है। * * *
पर्दा हल्के से उड़ता है  जैसे कोई याद आई और झांककर चली गयी। 
हम किसी को बुलाना चाहते हैं मगर ऐसे नहीं कि उसका नाम पुकारें। हम उसके बारे में सोचते हैं कि वह आ जाए। वह बात करे। किन्तु हम इन बुलावों को मन में ही छुपाए रखना चाहते हैं। 
कभी-कभी हम इस चाहना से शीघ्र मुक्त हो जाते हैं और कभी हम सोचने लगते हैं कि किस तरह उसे बुला लिया जाए और साथ ही ये भी न लगे कि हमने बुलाया ह…

सपने में गश्त पर प्रेम

होता तो कितना अच्छा होता कि हम रेगिस्तान को बुगची में भरकर अपने साथ बड़े शहर तक ले जा पाते पर ये भी अच्छा है कि ऐसा नहीं हुआ वरना घर लौटने की चाह खत्म हो जाती. 
अक्सर मैं सोचने लगता हूँ कि
क्या इस बात पर विश्वास कर लूँ?

कि जो बोया था वही काट रहा हूँ.
* * *

मैं बहुत देर तक सोचकर
याद नहीं कर पाता कि मैंने किया क्या था?

कैसे फूटा प्रेम का बीज
कैसे उग आई उस पर शाखाएं
कैसे खिले दो बार फूल
कैसे वह सूख गया अचानक?
* * *

कभी मुझे लगता है
कि मैं एक प्रेम का बिरवा हूँ
जो पेड़ होता जा रहा है.

कभी लगता है
कि मैं लकड़हारा हूँ और पेड़ गिरा रहा हूँ.
मुझे ऐसा क्यों नहीं लगता?

कि मैं एक वनबिलाव हूँ
और पाँव लटकाए, पेड़ की शाख पर सो रहा हूँ.
* * *

प्रेम एक फूल ही क्यों हुआ?
कोमल, हल्का, नम, भीना और मादक.

प्रेम एक छंगा हुआ पेड़ भी तो हो सकता था
तक लेता मौसमों की राह और कर लेता सारे इंतज़ार पूरे.
* * *

जब हम बीज बोते हैं
तब एक बड़े पेड़ की कल्पना करते हैं.

प्रेम के समय हमारी कल्पना को क्या हो जाता है?
* * *

प्रेम
उदास रातों में तनहा भटकता
एक काला बिलौटा है.

उसका स्वप्न एक पेड़ है
घनी पत्तियों से लदा, चुप खड़ा हुआ.

जैसे कोई मह…