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ख़ुशी की गोली

उसने आमंत्रण भरी एक मतवाली करवट ली. उसकी पीठ से थोड़ा नीचे कूल्हे पर हाथ रखते ही डर की लहर दौड़ पड़ी. आंगन पर अधलेटे हुए दिखा कि टेबल के ऊपर से शीशे के उस तरफ चार-पाँच लोग किसी काम में लगे हैं. उनमें से दो आदमी कमर के ऊपर नंगे थे. उन दो बिना बनियान वाले लोगों में से एक उस पार के कमरे के ठीक बीच में खड़ा था. जबकि दूजा दाईं तरफ के दरवाज़े की ओर जा रहा था. 

उनको देखते ही इस तरफ देखा तो मालूम हुआ कि दोनों ने कपड़े न पहन रखे थे. एक दूजे के बदन से सटे हुए उत्तेजना की फिसलन पर थे. अचानक देख लिए जाने का, पकड़े जाने का भय पसर गया. इसी भय में कपड़े तलाश किये. वे जाने कहाँ गुम थे. हड़बड़ी में खड़े होकर दरवाज़े की ओर लपककर हत्थी पकड़ कर खींची और बाहर आ गया. 

उस दरवाज़े से बाहर आने ने बेहद हल्का कर दिया था मगर उसी पल दस एक आदमी आये. जिस कमरे से भागा था, वापस उसी कमरे खड़े पाया. नया काम होने लगा. वे लोग कालीन उखाड़ रहे थे. उनसे कहा- "इस कालीन को पूरा ही उखाड़ दो." उन्होंने कबूतरी कालीन उखाड़ा तो नीचे एक गहरे हरे रंग का कालीन चिपका हुआ दिखने लगा. 

ऐसा लगा कि गहरे हरे रंग वाला कालीन ही सबसे पहले इस कमरे में लगा था. लेकिन याद में वही प्लास्टिक की टाइल्स वाला आँगन था जिस पर फर्राश महीने दो महीने में पोलिश करता था. वह चिकना आँगन कुछ दिन चिपचिपा सा दिखता और फिर जाने कहाँ से बंद कमरे में गर्द उतरती रहती. आँगन पर एक धूसर पपड़ी जमने लगती. कभी जमादार आता था तो झाड़ू लगा देता था. लेकिन झाड़ू से लकीरें बन जाती. 

कमरे में जगह बन आई. कामगारों से कहा कि इस टेबल को पीछे धकेल दो ताकि इसके आगे भी लोग बैठ सकें. आमने-सामने बैठकर बात कर सकें. वहां इतनी जगह बन आई थी कि अब आराम से कुर्सियां लग सकती थीं और आस-पास खाली जगह भी बची थी. 

वह सुनील नहीं था. उसका कद बराबर था. उसने कुछ हँसते हुए कहा. उसको जवाब देने के लिए मन में छुपे डर पर साहस बांधकर कहा कि तुम अपने बाप की उम्र के आदमी से मजाक करते हो. कल के लड़के हो और इस तरह कंधे पर हाथ रखकर चलने कि हिम्मत कैसे हुई? दाढ़ी वाले लड़के ने हार मान ली थी. उसने झगड़ा करने की जगह स्वीकार कर लिया कि ऐसा नहीं करना चाहिए था. 

रेगिस्तानी क़स्बो में नए मोहल्लों की बसावट जैसा रास्ता था कि हितेश के हाथ से सिगरेट गिर पड़ी. वह आधी टूट चुकी थी. उसे झुककर उठाता उससे पहले ही देख लिया कि बाकी की सिगरेट अब काम की नहीं रही है. बाईं तरफ कोई दूकान न थी. लगा कि अब यहाँ कहाँ सिगरेट मिलेगी. अचानक दाईं तरफ एक भरा पूरा किराणा का स्टोर दिखा. बोरियों में भरा अन्न और मसाले. कोने में रखे झाड़ू. एक ख़ास गंध में डूबा हुआ सबकुछ. उसी दढ़ियल नौजवान ने सिगरेट आगे की. सिगरेट लेते हुए पाया कि ये वही ब्रांड है. जिसकी तलब थी. उसे कैसे मालूम हुआ?
* * *
जागते ही पाया कि वह नंगे बदन औरत कहाँ गयी? वे सारे काम क्या हुए? माँ और बच्चों के साथ चलते हुए दफ़्तर के लोग अचानक कैसे साथ हो लिए. 

पड़ोस में एक आदमी दो दिन से शैय्या पर है. उसके परिवार वाले जुट गए हैं. वे चारपाई के आस-पास बैठे रहते हैं. मोहल्ले में एक बात चुपचाप घूम रही है कि गले का केंसर है और मरने वाला है. मैंने भी आते-जाते दो तीन बार उस पर नज़र डाली. लेकिन वह जाग नहीं रहा था. उसका सर या तो चादर से ढका होता या उसकी आँखें बंद होती. 
* * *

मैं अपने आपको हाथ पकड़ कर कहीं ले जाता हूँ. यहाँ बैठो. इसे देखो. इसे पढो. मैं अपना कहा नहीं मानता. मैं उठकर उधर चल देता हूँ जिधर उलझनें हैं. जिधर एक ही बात रखी है कि किसलिए कुछ करना चाहिए. मरना है तो मर जायेंगे. मरने के मामले एक ही भयावह बात है कि जब भी ऐसा गहरा ख़याल आता है तब लगता है कि ये सब पीछे छूट जायेगा. यहाँ कभी लौटना न होगा. 

साँस उखड़ जाती है. पसीना होने लगता है. लगता है सीने के आस-पास किसी ने कुंडली मार ली है. बदहवास उठकर बिस्तर पर बैठ जाना और चलाकर बाहर आ जाना. इसके सिवा कोई रास्ता नहीं होता. सामान्य होने में बहुत देर लगती है.
* * *

उसने कहा था- "ये ख़ुशी की गोली है." उसे सुनकर देर तक मुस्कुराया. जो कोई दवा कुछ भुला देती है वह सबके लिए ख़ुशी की गोली है.

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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

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* * *

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