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तुम्हारे होते हुए भी तुम्हारा न होना

मैंने जब किसी से सुना 'लव यू' तब मुड़कर उसकी जामातलाशी नहीं ली. मैं मुस्कुराया कि अभी उसमें ज़िन्दगी बाक़ी है. उसके आस-पास के लोग ख़ुश रहते होंगे. मैंने जब कभी कोई सस्ता फ़िकरा सुना तो दुखी हुआ कि उस व्यक्ति को कितने दुःख और कुंठाएं घेरे हुए हैं. वह जहाँ होता होगा, उसके आस-पास सब कैसा होता होगा?

हालाँकि मेरी खामी ये ठहरी कि मैं लव यू कहने वालों को भूल गया और नफ़रत वालों को भुला न सका.

कुछ एक असहज टिप्पणियाँ नई दिल्ली नाम के तंगहाल शहर की भीड़ भरी गलियों से.

एक

फ़रवरी का महीना इतना ठंडा न था कि बंद कमरे में रजाई ओढ़कर दो लोग सो सकें. इसलिए रजाई पांवों पर पड़ी थी. तकिये पुश्त से टिके थे. हमारी पीठ उनका सहारा लिए थी. एक तरफ कार्नर वाला स्टूल रखा था दूजी तरह कॉफ़ी टेबल थी. दोनों पर लम्बी गिलासें रखीं थीं. दोनों में हंड्रेड पाइपर्स नाम वाली व्हिस्की के साथ पानी मिला हुआ था. स्टार टीवी के सिनेमा चैनल पर बर्फ़ से भरा भूभाग था. स्क्रीन के कोने में एक लड़की स्नो-शूज में नज़रें गड़ाए बैठी थी. उसके जैकेट का कॉलर जब भी हिलता वह नज़रें उठाकर देखती लेकिन दृश्य में आता हुआ कोई नहीं दीखता था.

उसने कहा- "एक कविता पढ़कर सुनाती हूँ."

उससे कुछ दूर पड़े हुए ही उसकी तरफ देखा. वह कविता सुनाने लगी. कविता का कथ्य था कि जीवन में किसी के लिए कुछ करना. वही तुम्हारा होना होगा वरना क्या होना.

कुछ महीने बाद उसने फ़ोन कॉल रिकॉर्ड किये और लोगों को मेल किये.

दो

वहाँ ज़्यादा भीड़ न थी लॉन में आधी जगह बाक़ी थी. फ़ोन उठाया और ये बोलने को ही था कि हम किस तरफ बैठे हैं तभी वह आती हुई दिखी. उसके भारी कूल्हों पर बंधी कीमती साड़ी बेमिसाल लग रही थी. मैं अपने स्वभाव के विपरीत इस बार जामातलाशी ले रहा था. उसको देखने के असर में कुछ तो जनवरी की धूप थी और कुछ उसकी आँखों से बरसती मुस्कान का असर था कि उसकी कोहनियों तक से उजाला झाँक रहा था. जबकि मेरी कोहनियों को माँ रगड़-रगड़ कर लाल कर देती थी लेकिन वे कभी साफ़ न हुई.

मेरा मन बिंध गया था.

हम सूखी दूब वाले लॉन में मिट्टी पर बैठे हुए एक दूजे की आँखों में देखते और फिर कोई एक आँखें चुरा लेता. हम समझदार लोग थे. इसलिए उतना ही देख पाते थे जितना देखना अफोर्ड हो सकता था. अचानक इस ठहरी हुई बात से उकता कर हम एक रेस्तरां की ओर चल दिए. साथ चलने के एकांत में उसने कहा- "तुम बेहद प्यारे आदमी हो"

"अच्छा. तुम कुछ खाओगी?" मेरे इस प्रश्न पर उसने कहा- "मैं घर से खाकर आई हूँ. जो तुम खाना चाहो वही लो"

लोगों की भीड़ यहाँ पर ज़्यादा थी. सैंकड़ा भर कुर्सी लगी थीं मगर सब पर लोग थे. कुछ देर उसके साथ कोई मेज़ तलाशने के बाद हम बाहर आ गए. उसे अपनी ओर देखते हुए देखकर मैंने कहा- "क्या?" उसने कहा- "तुमको देखना था" मेरे हाथ में मोमोज की प्लेट थी. उनके साथ की चटनी में दम था. मेरे मुँह में आग थी, आँखों में पानी था. उसके चेहरे पर मुस्कान थी.

दो एक महीने बाद उसने मेरी दोस्त से कहा- "तुम कोई और दोस्त खोज लो, वह अच्छा आदमी नहीं है.

तीन

मुझे एक मैसेज मिला. "भाई जी मेले में मिलोगे?" मैंने जवाब दिया था- "हाँ ज़रूर मिलूँगा. आप को खोज लूँगा" मैं और बेटी भीड़ भरे गलियारों के बीच लोगों के ठेलम-ठेल में गुज़र रहे थे. वो दोस्त सामने बैठा हुआ दिख गया. उसके हाथ में खाना था. उसने दोनों बाहें फैलाई और कोमल प्रेम भरा हग करते हुए कहा- "आप मेरी जान हो. क्या लिखते हो. जी चाहता है आपके पास बैठकर आपको सुनता रहूँ." मैंने बेटी से उनका परिचय करवाया. ये फलाँ हैं. इनका लिखना मुझे पसंद है. उन्होंने बेटी के सर पर हाथ फेरा.

कुछ समय बाद मैंने सुना कि उन्होंने अपनी मित्र को कहा- "आपने आने में देर कर दी. अभी कुछ देर पहले लाल कारपेट पर अट्ठारह-बीस कवयित्रियाँ बेहोश होकर गिरी पड़ी थी. उन्होंने अपने सामने से केसी को गुज़रते हुए देख लिया था."

कुंठा आत्मघाती होती है. मुझे दुःख है कि वह आदमी नहीं रहा.

चार

सड़क के किनारे खड़े हुए एक लड़की से बात कर रहा था. लड़की सिविल सर्विस के लिए तैयारी कर रही थी. मैं उससे पूछ रहा था कि स्टडी मेटेरियल और अध्ययन योजना के बारे में हम कब बात कर सकते हैं. तभी दिल्ली विश्वविद्यालय के दो तीन शिक्षक और एक नवेले प्रकाशक अपने दल के साथ पास से गुज़रे.

प्रकाशक बाबू ने जाने किस वजह से छूट ली होगी कि उन्होंने अपने समूह को सम्बोधित करते हुए कहा- "केसी जहाँ खड़े हों वहाँ चार औरतें न हो ऐसा नहीं हो सकता." उसका कहना मेरे लिए कोई अचरज की बात न था. अक्सर हलके-चतुर लोग इस तरह की ही बातें कहते हैं कि अपमान और मित्रता के बीच का फासला अस्पष्ट रहे.

उनके चले जाने के बाद वहीं खड़े हुए मैं सोचता रहा कि नारीवादी प्रोफ़ेसर साहिबा इस बात पर मुस्कुराई क्यों थी?

पाँच

अकसर फील में पोश्चर का ख़याल कहीं खो जाता है. अजाने ही किसी के कंधे से कंधा छू जाता है. किसी के कंधे पर मित्रता भरा हाथ ठहर जाता है. कभी हाथ पकड़े हुए खड़े रह जाते हैं. कभी हाथों में हाथ लिए दूर तक साथ चल लेते हैं. कोई फर्क नहीं पड़ता. मित्रता की सफेदी में हवस की स्याही नहीं लगती.

इस बार उससे मिलना हुआ और इस एक वजह से जान पाया कि मित्र कहलाने के हक़ जताने वाले लोग उस दिन से ही आपका खाका खराब किये जाते हैं जिस दिन पहली बार आपने उनका हाथ अपने हाथ में लिया होता है. "उसने मेरा हाथ इस तरह पकड़ा कि छोड़ने का नाम तक न लिया. मुझे समझ न आया कि मैं क्या करूँ? मुझे कहता है पब्लिसिटी से दूर रहो और देखो उसे... जहाँ देखो बस औरतें उनके साथ तस्वीरें, चाय, और खाना और... "

उसने और भी इतना कुछ कहा था कि मेरी सोच और समझ तार-तार हो गयी.

रात को देर तक एक जाम में फंसा रहा. एक दोस्त गाड़ी चला रही थी. उसकी एक दोस्त पीछे की सीट पर थी. मैं और वह एक दूजे के लिए अजनबी थे लेकिन सहज थे. मैं उनसे बातें करते हुए बार-बार खोया जा रहा था? दोस्त ने पूछा - "हमारी गाड़ी पसंद न आई?" मैंने चौंकते हुए कहा- "हाँ बहुत सुन्दर एसयूवी है. मुझे ये गाड़ी बाहर से तो पसंद थी ही इसका इंटीरियर बहुत ख़ूबसूरत है."

जाम ऐसा था कि गाड़ियाँ रेंग भी नहीं रही थी. हम कोई नयी बात खोजते और वह बात जल्द खत्म हो जाती.

दो बेहद प्यारे लोगों के साथ बैठे हुए भी मैं उस बात से बाहर नहीं आ पा रहा था. मैं सोच रहा था कि क्या दोस्तों का इंटीरियर भी देखा जा सकता है?

छः

बात कहने का मन नहीं हो रहा. कुछ खुलासे इसलिए अच्छे नहीं होते कि उनका असर जाता नहीं है. किसी संत ने कहा कि विश्वास की आड़ में किये गए धोखे किसी को न सुनाना कि इससे लोग विश्वास करना छोड़ने लगते हैं. इसी तरह मैं किसी भूखे और भोजन की कहानी में आई खराबी नहीं सुनाना चाहता हूँ कि इसे सुनकर जाने कौन कल भूखा रह जाये और जाने किसका खिलाने का मन मर जाये.

असल बात ये है कि कोई अच्छा लेखक, शिल्पकार, चित्रकार, नाट्यकर्मी या किसी भी कला का कलाकार है तो जब आप उससे रूठ जाएँ तो गाली देने की जगह ये खोजना सीखना कि उसमें कुछ अच्छाई भी कहीं होगी.

सात

आख़िरकार खत्म हो जाता है 
शराब का कड़वापन.

जैसे तुम्हारे होते हुए भी तुम्हारा न होना. 
* * *

शाम ढले अक्सर लिखता हूँ लेकिन ये पोस्ट मुल्तवी होती रही. इसलिए कि शाम को इसे लिखने का ख़तरा ये बना रहता कि अगली सुबह ख़ुद को कोस रहा होता कि किस झौंक में लिख दिया. इसे लिखने की ज़रूरत क्या थी. दुनिया और लोग जैसे हैं वैसे हैं?

दिन में लिखने का फायदा ये है कि मैं पूछ सकता हूँ - "केसी, तुम ख़ुद कौनसे कम हो?"
* * *

[Picture credits : watercolour study by Bakuma]

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