May 6, 2010

स्त्री विमर्श की किंवदंती पाकिस्तान चली गयी, तनहा कवि अब दीवारों से सर फोड़ता होगा

कवि के लिए दो ख़िलाफ़त भरे शब्द कोई कह दे तो उसके चमचे कांव - कांव करते हुए सर पर मंडराने लगते हैं, यही एक कवि के सफल और महान होने की पुष्टि का एक मात्र तरीका भी है. मेरी एक परिचित ने जब दूज वर चुना तो मुझे पहले हेमा मालिनी से लेकर करिश्मा और फिर सानिया मिर्ज़ा के बहाने अनिल गंगल की एक कविता की याद गयी. वे कितने बड़े या छोटे कवि हैं ये बहस का विषय नहीं है, मुझे जो बात गुदगुदा रही है. वह है कि उन्होंने भारत की इस टेनिस खिलाड़ी के लिए कविता लिखी. इस कविता को हंस ने प्रकाशित किया. इस कविता के प्रथम पाठ पर मुझे याद आया कि हंस ने कई प्रतिभावान कवियों को रुलाया है. वह सिर्फ उन्हें छापने से गुरेज करता रहा है बल्कि उनकी कविताओं को पाठकों के पत्रों के बीच प्रकाशित ( कर शर्मसार ) करता रहा है. इस पर हंस दावा ये भी करता है कि आप खुशियाँ मनाइये कि कहीं हंस ने आपको जगह तो दी. तौबा ये कवि और ये हंस का अभिमान.

अनिल गंगल, हंस जनवरी 2009 में छपी अपनी कविता 'सानिया मिर्ज़ा के लिए' में लिखते हैं, हाथों में भारी रैकेट लिए तुम्हें टेनिस खेलते देख मैं विस्मित और रोमांचित होता हूँ... जैसे शेष सभी महिला खिलाड़ी फूल छाप झाड़ू से खेलती हैं. वे लिखते हैं कि स्त्री विमर्श की नवीनतम किंवदंती हो तुम... अब ये स्त्री विमर्श, कुछ दिनों तक राष्ट्रवाद का विमर्श बना रहा कर सुप्तावस्था में चला गया है. आगे उन्होंने कविता में खेल और स्त्री देह पर खड़े बाजारवाद पर बने बनाये फोर्मुले में प्रहार किये हैं.

आपने कविता में सानिया के निजी जीवन को, उसके इश्क़ को और मुश्किलों को रेखांकित करते हुए अंत में बड़ी बेतुकी बात कही है कि कहीं तुम कोक, पेप्सी, क्रीम और पाउडर में दिखो ...? अगर सानिया मिर्ज़ा इन विज्ञापनों में दिखती तो क्या अनिल गंगल या उनके पाठक उन्हें जानते होते ? कोई पूछे कि पिछले सैफ खेलों में पदक लाने वाली उत्तर पूर्व की खिलाड़ी का नाम बताओ, जिसके घर से सड़क तक आने के लिए तीन किलोमीटर तक कोई साधन नहीं है ? जिसको जूते भी स्थानीय स्पोंसर ने दिए हैं और बरसात के दिनों में उसकी छत न टपके ये अभी भी पक्का नहीं है ? इस सवाल का उत्तर देने में, मेरे विचार से कई कवियों की फूंक निकल जाएगी .

मैं भी जाने कैसी बक बक में लग जाया करता हूँ शाम सात बजे छत पर आया था और सोचा था कि टहलती हुई नयी शाम को देखूंगा, नए बन रहे मकानों की खुली पड़ी खिड़कियों से कूदते फांदते हुए बच्चों को अपनी आँख में भर लूँगा और फिर रात ढलने लगेगी तब हाथ में चिल्ड वोदका होगी मगर शाम इसी लेपटोप के काले सफ़ेद पैड पर बीत गयी है. मैं नयी नयी मुहब्बतों के लिए बदनाम हूँ इसलिए अब अपने वजूद को समेटता फिरता हूँ. सानिया, कविता और स्त्री विमर्श को गोली मारो और सुनों कि आज की शाम मेरे साथ तुम्हारी याद है और अमज़द इस्लाम का एक शेर.

जो उतर के ज़ीना-ए-शब से तेरी चश्म-ए-खुशबू में समां गए
वही जलते बुझते से महर-ओ-माह मेरे बाम-ओ-दर को सजा गए.

उसकी आमद का ख़याल

शाम और रात के बीच एक छोटा सा समय आता है। उस समय एक अविश्वसनीय चुप्पी होती है। मुझे कई बार लगता है कि मालखाने के दो पहरेदार अपनी ड्यूटी क...