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स्त्री विमर्श की किंवदंती पाकिस्तान चली गयी, तनहा कवि अब दीवारों से सर फोड़ता होगा

कवि के लिए दो ख़िलाफ़त भरे शब्द कोई कह दे तो उसके चमचे कांव - कांव करते हुए सर पर मंडराने लगते हैं, यही एक कवि के सफल और महान होने की पुष्टि का एक मात्र तरीका भी है. मेरी एक परिचित ने जब दूज वर चुना तो मुझे पहले हेमा मालिनी से लेकर करिश्मा और फिर सानिया मिर्ज़ा के बहाने अनिल गंगल की एक कविता की याद गयी. वे कितने बड़े या छोटे कवि हैं ये बहस का विषय नहीं है, मुझे जो बात गुदगुदा रही है. वह है कि उन्होंने भारत की इस टेनिस खिलाड़ी के लिए कविता लिखी. इस कविता को हंस ने प्रकाशित किया. इस कविता के प्रथम पाठ पर मुझे याद आया कि हंस ने कई प्रतिभावान कवियों को रुलाया है. वह सिर्फ उन्हें छापने से गुरेज करता रहा है बल्कि उनकी कविताओं को पाठकों के पत्रों के बीच प्रकाशित ( कर शर्मसार ) करता रहा है. इस पर हंस दावा ये भी करता है कि आप खुशियाँ मनाइये कि कहीं हंस ने आपको जगह तो दी. तौबा ये कवि और ये हंस का अभिमान.

अनिल गंगल, हंस जनवरी 2009 में छपी अपनी कविता 'सानिया मिर्ज़ा के लिए' में लिखते हैं, हाथों में भारी रैकेट लिए तुम्हें टेनिस खेलते देख मैं विस्मित और रोमांचित होता हूँ... जैसे शेष सभी महिला खिलाड़ी फूल छाप झाड़ू से खेलती हैं. वे लिखते हैं कि स्त्री विमर्श की नवीनतम किंवदंती हो तुम... अब ये स्त्री विमर्श, कुछ दिनों तक राष्ट्रवाद का विमर्श बना रहा कर सुप्तावस्था में चला गया है. आगे उन्होंने कविता में खेल और स्त्री देह पर खड़े बाजारवाद पर बने बनाये फोर्मुले में प्रहार किये हैं.

आपने कविता में सानिया के निजी जीवन को, उसके इश्क़ को और मुश्किलों को रेखांकित करते हुए अंत में बड़ी बेतुकी बात कही है कि कहीं तुम कोक, पेप्सी, क्रीम और पाउडर में दिखो ...? अगर सानिया मिर्ज़ा इन विज्ञापनों में दिखती तो क्या अनिल गंगल या उनके पाठक उन्हें जानते होते ? कोई पूछे कि पिछले सैफ खेलों में पदक लाने वाली उत्तर पूर्व की खिलाड़ी का नाम बताओ, जिसके घर से सड़क तक आने के लिए तीन किलोमीटर तक कोई साधन नहीं है ? जिसको जूते भी स्थानीय स्पोंसर ने दिए हैं और बरसात के दिनों में उसकी छत न टपके ये अभी भी पक्का नहीं है ? इस सवाल का उत्तर देने में, मेरे विचार से कई कवियों की फूंक निकल जाएगी .

मैं भी जाने कैसी बक बक में लग जाया करता हूँ शाम सात बजे छत पर आया था और सोचा था कि टहलती हुई नयी शाम को देखूंगा, नए बन रहे मकानों की खुली पड़ी खिड़कियों से कूदते फांदते हुए बच्चों को अपनी आँख में भर लूँगा और फिर रात ढलने लगेगी तब हाथ में चिल्ड वोदका होगी मगर शाम इसी लेपटोप के काले सफ़ेद पैड पर बीत गयी है. मैं नयी नयी मुहब्बतों के लिए बदनाम हूँ इसलिए अब अपने वजूद को समेटता फिरता हूँ. सानिया, कविता और स्त्री विमर्श को गोली मारो और सुनों कि आज की शाम मेरे साथ तुम्हारी याद है और अमज़द इस्लाम का एक शेर.

जो उतर के ज़ीना-ए-शब से तेरी चश्म-ए-खुशबू में समां गए
वही जलते बुझते से महर-ओ-माह मेरे बाम-ओ-दर को सजा गए.

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…