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कुछ बीती हुई शामों का हिसाब और एक अफ़सोस ?

अक्सर दीवारों पर उनके पते लिखे होते हैं जिनके मिलने की आस बाकी नहीं होती. महीनों और सालों तक मुड़ा-तुड़ा, पता लिखा बदरंग पन्ना किसी उम्मीद की तरह जेब में छुपाये घूमते रहते हैं मगर एक दिन कहीं खो जाया करता है. मेरी उलझनें, तुमसे हुई मुहोब्बत जैसी हो जाती है. यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि उसका होना जरूरी था या फ़िर ज़िन्दगी का गुज़ारा इस बे-पर की लगावट के बिना भी सम्भव होता.

पिछले सप्ताह एक विवाह में शामिल होना था. एक रात बनोला जीमने के लिये और दूसरी रात प्रीतिभोज के नाम हो गई यानि अपनी कही जाने वाली शाम को कुछ और लोगों के साथ बांटना पड़ा. इधर एनडीए में पासिंग आउट परेड में शामिल हो कर बच्चे अपने भाई को ग्रेजुएट होने की डिग्री दिला लाये तो मेरी कुछ और शामें बच्चों के नाम हो गई. मेरे फ़ौजी को चालीस दिन की छुट्टी मिली है और वह इन दिनों को भरपूर एन्जोय करना चाहता है. आज शाम की गाड़ी से वह अपने दोस्तों के पास जोधाणें चला जायेगा.


मेरी इन शामों में मदिरा का सुकून भरा सुख नहीं बरसा है. अभी फ्रीजर की आईस ट्रे को पानी से भर कर आया हूँ. सुबह एक दोस्त से बात की, वैसे हर रोज़ ही होती है मगर लगती नयी और जरूरी सी है. बात करने के साथ वाशिंग मशीन में कपड़ों पर भी ध्यान था फिर थोड़ी देर में धुल रहे कपड़ों के साथ अपनी पहनी हुई जींस भी डाल दी. वाश टब में कुछ टकराने की आवाजें आने लगी तो हाथ घुमा कर देखा, सोचा पांच रुपये का सिक्का होगा मगर निकला मेरा सेल फोन.


महीने भर पहले खरीदा था, पांच एमपी का केमरा और शानदार म्यूजिक सपोर्ट वाला ये फोन दम तोड़ चुका था और उसके साथ फोनबुक में सेव किये गए नंबर भी. इस सोच में उलझा हूँ कि कितने ऐसे लोगों के नंबर थे जो मुझे प्यार करते थे और कितने ऐसे नम्बर थे जो किसी अनवांटेड कुकी की तरह घुसे बैठे थे ? मुझे कौन फोन करता है ये ख्याल आते ही खुद को एक ऐसी तनहा शाम की तरह पाता हूँ जिसमे कभी - कभी कोई एक परिंदा उड़ता दिखता है.


अब कोई उतना ख़ास अफ़सोस भी नहीं
कि मेरे पास अपने ही बनाये हुए कई बड़े अफ़सोस पहले से ही हैं.

मैंने जाने कितनी प्रतीक्षा भरी आँखों में नीरवता को बने रहने दिया है, मैं कई - कई बार वादे कर के भी मिलने नहीं गया, मैंने कई सौ बार झूठ बोला है कुछ मुहोब्बतों के बचाने के लिए और कई हज़ार बार अपनी सुविधा की ज़िन्दगी जीने के लिए... मुझ से इन्सान से उस सेल फोन को अधिक उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. मेरा अफ़सोस जाने कैसा है कि मैं कुछ रिश्तों के लिए आंसू बहाता हूँ और कुछ को बिखरने देता हूँ समय की थाप पर.

ओ मेरे सेल फोन ! मैंने रात - रात भर तेरे जरिये सुने थे लोकगीत.

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…