June 16, 2010

खुद को धोखे देने की बीमारी, तुम्हारी याद और जिम मोरिसन

दो यातना भरे दिन सुलगते रहे. रात को कड़कती बिजली की चीख पुकार के बावजूद रोने को आतुर आसमान के तले नशे में आराम से सोया रहा. स्मृतियों का जो बचा हुआ सामान है, उस पर कमबख्त समय नाम की दीमक भी नाकाम है. कोई हल नहीं होता कोई याद नहीं जाती. सत्रह साल पहले कभी छत और कभी आसमान को देखते हुए मैं तुम्हारी सांसों को अपनी हथेलियों में कैद करने की कोशिशें किया करता था और तुम मेरी बाँहों पर अपने सर को रखे हुए मौन के तार बुनती थी. एक ऐसा ही नामुराद सपना कल सुबह देखा.

मैं उस सपने को हज़ार लानतें भेजता हूँ क्योंकि ऐसा नहीं है कि तुम्हारे ही ख़यालों में जीता हूँ और हर दिन नयी ख्वाहिशों का दिन है फिर भी कुछ हसीन चेहरे और भी हैं जो दिल के सुकून को काफी है. सपने ने मेरा तमाम दिन वहशी हवाओं में टूटते हुए कच्चे पेड़ों जैसा कर दिया था. मैं हर आहट पर घबराता रहा, भरी भरी सी आँखों के छलक जाने के डर से भागता रहा, तुम्हारी सुवासित गेंहुआ देह से आती पसीने की गंध के आस पास उलझी हुई मेरी सोच को पछाड़ने की कोशिश में नॅशनल ज्योग्राफिक चेनल पर देखता रहा कि किस तरह मादा तेंदुआ घात लगाती है. वो चीखें जो मदांध युवा मृग के गले में दब कर रह गई मेरी सी थी...

होने और न होने के बीच के वीरान फासले में, तुम्हारे साथ जुड़े अपने नाम को ही मुजरिम पाता हूँ. इसलिए तुम्हें भूल जाने को, उस वीरान फासले को मिटा देने को, मैंने खुद पर कई सितम किये हैं लेकिन एक सपना उन बरदाश्त तकलीफों को फिर से नाकाम कर गया. रात को पीने को नहीं मिली, रखी थी मगर पी नहीं सका. एक थका हुआ मन थकी देह से अधिक परास्त होता है इसलिए सोते ही नींद आ गई. नयी सुबह में सपने के कारणों को तलाशते हुए सवाल मेरे सिरहाने रखे थे. मैं काम पर नहीं गया, मैं घर पर भी नहीं था, मैं था भी ? रात किसी ने पूछा कि कोई था ज़िन्दगी में जिसे याद करते हो? आज सोचता हूँ तो खुद पर तरस आता है कि क्या कुछ बक जाया करता हूँ जूनून में. इन दिनों वही एक आसरा है. फसल के मौसम से पहले सूने खेत में खड़े एक पेड़ जैसा आसरा.

काश जेम्स डगलस मोरिसन जैसी बुलंदी भले ही ना पाता मगर उस की तरह मर जाता तो कितना अच्छा था. मेरे तनहा बीते बचपन में मुझे गीत गाने का शऊर नहीं आया किन्तु मेरी स्मृतियों में भी नहीं है कि मैं अपने पिता के गले में बाहें डाल कर झूल रहा हूँ. मैं देह-सुवास से कई चेहरे अब भी बुन सकता हूँ.
तीन चार घूँट जब पी लेता हूँ सिर्फ उस वक्त मैं अपने पास पाता हूँ एक अलौकिक स्पर्श. जब तुम्हारे स्पर्श का आभास नहीं होता तब वाकई सोचता हूँ कि आदमी के काम करने का समय सात आठ साल ही होना चाहिए और चंद खूबसूरत चेहरों के दिल में उतर जाने के बाद हेरोइन जैसे किसी मादक पदार्थ का भरपूर सेवन करके बाथ टब में ही मर जाना चाहिए वो भी पैंतीस साल की उम्र से पहले...

ओह जिम, तुम जिस फायर की अपेक्षा करते हो, मैं उसी में तड़प रहा हूँ. मेरा कोई चाहने वाला मेरे बारे में कुछ लिखना चाहेगा तो मैं उससे कहना चाहूँगा कि मेरी बायोग्राफी का नाम 'नो वन हियर गेट्स आउट अलाइव' से अलग कुछ ऐसा साउंड करे कि एक आदमी जो खुद को धोखे देने की बीमारी से पीड़ित था.

उसकी आमद का ख़याल

शाम और रात के बीच एक छोटा सा समय आता है। उस समय एक अविश्वसनीय चुप्पी होती है। मुझे कई बार लगता है कि मालखाने के दो पहरेदार अपनी ड्यूटी क...