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खुद को धोखे देने की बीमारी, तुम्हारी याद और जिम मोरिसन

दो यातना भरे दिन सुलगते रहे. रात को कड़कती बिजली की चीख पुकार के बावजूद रोने को आतुर आसमान के तले नशे में आराम से सोया रहा. स्मृतियों का जो बचा हुआ सामान है, उस पर कमबख्त समय नाम की दीमक भी नाकाम है. कोई हल नहीं होता कोई याद नहीं जाती. सत्रह साल पहले कभी छत और कभी आसमान को देखते हुए मैं तुम्हारी सांसों को अपनी हथेलियों में कैद करने की कोशिशें किया करता था और तुम मेरी बाँहों पर अपने सर को रखे हुए मौन के तार बुनती थी. एक ऐसा ही नामुराद सपना कल सुबह देखा.

मैं उस सपने को हज़ार लानतें भेजता हूँ क्योंकि ऐसा नहीं है कि तुम्हारे ही ख़यालों में जीता हूँ और हर दिन नयी ख्वाहिशों का दिन है फिर भी कुछ हसीन चेहरे और भी हैं जो दिल के सुकून को काफी है. सपने ने मेरा तमाम दिन वहशी हवाओं में टूटते हुए कच्चे पेड़ों जैसा कर दिया था. मैं हर आहट पर घबराता रहा, भरी भरी सी आँखों के छलक जाने के डर से भागता रहा, तुम्हारी सुवासित गेंहुआ देह से आती पसीने की गंध के आस पास उलझी हुई मेरी सोच को पछाड़ने की कोशिश में नॅशनल ज्योग्राफिक चेनल पर देखता रहा कि किस तरह मादा तेंदुआ घात लगाती है. वो चीखें जो मदांध युवा मृग के गले में दब कर रह गई मेरी सी थी...

होने और न होने के बीच के वीरान फासले में, तुम्हारे साथ जुड़े अपने नाम को ही मुजरिम पाता हूँ. इसलिए तुम्हें भूल जाने को, उस वीरान फासले को मिटा देने को, मैंने खुद पर कई सितम किये हैं लेकिन एक सपना उन बरदाश्त तकलीफों को फिर से नाकाम कर गया. रात को पीने को नहीं मिली, रखी थी मगर पी नहीं सका. एक थका हुआ मन थकी देह से अधिक परास्त होता है इसलिए सोते ही नींद आ गई. नयी सुबह में सपने के कारणों को तलाशते हुए सवाल मेरे सिरहाने रखे थे. मैं काम पर नहीं गया, मैं घर पर भी नहीं था, मैं था भी ? रात किसी ने पूछा कि कोई था ज़िन्दगी में जिसे याद करते हो? आज सोचता हूँ तो खुद पर तरस आता है कि क्या कुछ बक जाया करता हूँ जूनून में. इन दिनों वही एक आसरा है. फसल के मौसम से पहले सूने खेत में खड़े एक पेड़ जैसा आसरा.

काश जेम्स डगलस मोरिसन जैसी बुलंदी भले ही ना पाता मगर उस की तरह मर जाता तो कितना अच्छा था. मेरे तनहा बीते बचपन में मुझे गीत गाने का शऊर नहीं आया किन्तु मेरी स्मृतियों में भी नहीं है कि मैं अपने पिता के गले में बाहें डाल कर झूल रहा हूँ. मैं देह-सुवास से कई चेहरे अब भी बुन सकता हूँ.
तीन चार घूँट जब पी लेता हूँ सिर्फ उस वक्त मैं अपने पास पाता हूँ एक अलौकिक स्पर्श. जब तुम्हारे स्पर्श का आभास नहीं होता तब वाकई सोचता हूँ कि आदमी के काम करने का समय सात आठ साल ही होना चाहिए और चंद खूबसूरत चेहरों के दिल में उतर जाने के बाद हेरोइन जैसे किसी मादक पदार्थ का भरपूर सेवन करके बाथ टब में ही मर जाना चाहिए वो भी पैंतीस साल की उम्र से पहले...

ओह जिम, तुम जिस फायर की अपेक्षा करते हो, मैं उसी में तड़प रहा हूँ. मेरा कोई चाहने वाला मेरे बारे में कुछ लिखना चाहेगा तो मैं उससे कहना चाहूँगा कि मेरी बायोग्राफी का नाम 'नो वन हियर गेट्स आउट अलाइव' से अलग कुछ ऐसा साउंड करे कि एक आदमी जो खुद को धोखे देने की बीमारी से पीड़ित था.

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…