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स्त्री तुम सदा सुहागन रहो, अभी हमारे पास दूसरे काम हैं...


फैंव्किस बर्नियर विदेशी क्रिस्तान था और उसने शाहजहाँ के समय भारत में रहते हुए मुगलों की नौकरी की थी. उसने दुनिया भर में लम्बी यात्रायें की और सामाजिक जीवन को दर्ज किया. विकासशील किन्तु रुढियों से जकड़े हुए इस देश के लोगों को और खुद को देखता हूँ तो लगता है कि पांच सौ साल में भी अगर हम लिंग भेद और सामाजिक बराबरी का सफ़र तय नहीं कर पाए हैं तो आगे भी क्या उम्मीद हो ?

बर्नियर ने अपनी भारत यात्रा में लिखा था कि मैंने देखा एक बहुत बड़ा गड्ढा खोदा हुआ था और उसमे बहुत सी लकड़ियाँ चुनी हुई रखी थी. लकड़ियों के ऊपर एक मृत देह पड़ी है जिसके पास एक सुंदरी उसी लकड़ियों के ढेर पर बैठी हुई है चारों और से पांच ब्राहमण उस चिता में आग दे रहे है थे. पांच अधेड़ स्त्रियाँ जो अच्छे वस्त्र पहने थी एक दूसरे का हाथ पकड़ कर चिता के चारों और नाच रही थी और इन्हें देखने के लिए बहुत सी स्त्रियों और पुरुषों की भीड़ लगी थी. इस समय चिता में आग अच्छी जल रही थी क्योंकि उस पर बहुत सा तेल और घी डाल दिया गया था. मैंने देखा कि आग उस स्त्री के कपड़ों तक जिसमे सुगन्धित तेल, चन्दन और कस्तूरी आदि मली हुई थी - भली भांति पहुँच गयी. मैंने अनुमान किया कि यह पांचों स्त्रियाँ यों ही नाच गा रही हैं पर मुझे यह देख कर आश्चर्य हुआ कि जब उनमे से एक स्त्री के कपड़ों तक आग पहुंची तो वह भी चिता में कूद पड़ी और इसी तरह बाकी सब भी. मैं इसका मतलब न समझ सका पर मुझे शीघ्र ही मालूम हो गया कि ये पांचों स्त्रियाँ दासियाँ थी.

इसी तरह के भयावह किस्सों का वृतांत लिखते हुए बर्नियर ने आगे लिखा कि मैं जल्द ही ऐसी असंख्य घटनाएँ देख कर उकता गया क्योंकि मैं बहुत भयभीत भी हो जाता था. उसने लिखा कि माताएं इन्हें बचपन में ही ये शिक्षा देती है कि पति के साथ सती हो जाना प्रशंसा और पुण्य का काम है पर वास्तव में यह मर्दों की धूर्तता है जो इस प्रकार स्त्रियों को अपने वश में कर लेते हैं और फिर इन्हें यह भय नहीं होता कि बीमारी में उसकी स्त्री अच्छी तरह से सेवा नहीं करेगी या उसे ज़हर नहीं देगी. बर्नियर को ये दो उपरी और छिछले कारण ही समझ आये किन्तु सच तो था कि स्त्री को पति के जीते जी भी उचित सम्मान नहीं मिलता था तो मरने के बाद उसे असंख्य कष्टों का का सामना करना पड़ता था. माताएं अपनी पुत्रियों के तिल तिल मरने से बेहतर जानती थी कि वे एक ही बार मर जाएं.

पाच छः सौ साल बाद भी मैं अपने आस पास सामाजिक बराबरी और सुसंस्कृत होने के संकेत नहीं देख पाता हूँ. समाज में अशिक्षित और निराश्रित स्त्रियों की संख्या बहुत बड़ी है. मेरी नानी को जीवन यापन के लिए चार सौ रुपये पेंशन से मिलते है. उनका भी कोई पक्का हिसाब नहीं है. वे कहती हैं बेटा मेरे पैसे कोई खा जाता है मुझे मिलते ही नहीं... तो मैं बोलता हूँ मुझसे ले लो, यानि मैं भी भ्रष्ट व्यवस्था के साथ हूँ. मेरे नाना, मामा और मामियां इस संसार में नहीं रहे अब उनके साथ दो पोते हैं जो दुनियादारी से अभी अनभिग्य हैं. पड़ौसी उनकी ज़मीन को हड़प लेना चाहते हैं. वह बूढ़ी औरत, अपने दोहित्रों के मजिस्ट्रेट और पुलिस अधिकारी होने का दम भर कर जिंदा है और पड़ौसी भी इससे परिचित हैं. मेरी नानी ने अभी थक हार कर अपनी बीस भेड़ें बेच दी हैं. पेंशन समय पर आती नहीं और बरसात का कोई ठिकाना नहीं...

स्त्री को सदा सुहागन होने का आशीर्वाद देते रहो.

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

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मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
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और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

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हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

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* * *
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