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गिर गया, चाँद सा कंघा मूमल के केश से




कई सौ सालों पहले
मूमल ने रेगिस्तान को देख कर उदास
अपनी ओढ़नी में भर लिए बहुत सारे रंग.
रेत में उग आई सोनल घास,
जहां गिरा था, चाँद सा कंघा मूमल के केश से.

महेंदर चढ़ा रहता था नौजवान ऊंट की पीठ पर
चांदनी रातों में, रेत के धोरों पर पीता रहा,
दीवड़ी भर मूमल का प्रेम
उन धोरों की छाती में बहती है, विलोप हुई नदी काक.

एक ढाढी बैठा रहता, काहू गाँव की एक जाळ की छाँव में
आधी आँखें मीच कर जताता था, संशय ज़िन्दगी पर
मगर उसे प्रेम पर था यकीन
कहता, नैणा मुजरो मानजो, पिया नहीं मिलण रो जोग.
[ओ पिया हमारे मिलने का संयोग नहीं है, आँखों से अभिवादन स्वीकार लो]

चौमासे से पहले फुरसत की दोपहर में 
एक कारीगर ने लिखा बावड़ी की पाल पर
सब उड़ जासी जगत सूं,  रेसी बाकी प्रीत.
[इस दुनिया से सब कुछ खो जायेगा, प्रेम बचा रहेगा]

कुछ साल पहले
एक बिरतानी आदमी ने कहा कि यहाँ लिखा है
मैं रेगिस्तान हूँ, मुझे लूट लिया जाये, तेल के लिए.
उसने खोद दिया मूमल का दिल, नोच ली सोनल घास...

एक उदास मांगणियार ने गाना छोड़ दिया लोक गीत,
माणीगर रेवो अजूणी रात...

एक था, उथला उथला दिखने वाला मीठा गहरा रेगिस्तान...


* * *

लोद्रवा की राजकुमारी मूमल के सौन्दर्य के किस्से दूर दूर तक थे. अमरकोट का राजकुमार महेंदर उसकी एक झलक देख कर दीवाना हो गया था. उसने मूमल की निजी दासी को धन देकर किले का गुप्त द्वार खुलवा लिया था. फिर कुछ ही मुलाकातों में दोनों प्रेम में पड़ गए. अमरकोट से अपने ऊंट चीखल पर सवार होकर महेंदर लोद्रवा तक मूमल से मिलने आता. रात भर उसे निहार कर भोर होने से पहले वापस लौट जाता था. मूमल की छोटी बहन सूमल ने मूमल से कहा कि वह एक बार महेंदर को देखना चाहती है. उसी रात महेंदर को आने में देर हो गयी. इंतज़ार करती दोनों बहनें थक कर एक दूसरे की बाँहों में सो गयी. महेंदर ने देखा कि मूमल किसी की बाँहों में है तो वह उससे बोले बिना भारी मन से अमरकोट लौट गया. मूमल के संदेशों का कोई जवाब नहीं आया. विरहन मूमल ने आखिर मनिहारे का भेष धरा और महेंदर तक पहुँच गयी. उसने किसी तरह से महेंदर के साथ शतरंज खेलने के अवसर जुटाया. खेलते समय महेंदर की आँखें भीग आई. मूमल ने इसका सबब पूछा तो महेंदर ने बताया कि तुम्हारे माथे पर जो निशान है. इसे देख कर मुझे अपनी प्रेयसी की याद आ गयी है. मूमल ने उसे अपनी असलियत बताई. दोनों गले मिले किन्तु विरह की अगन में वे इतने कमजोर हो चुके थे कि फिर उस एक लम्हे से आगे जी न सके.

इस बात को एक हज़ार साल हो गए होंगे. अब यहाँ तेल के कुँओं पर आग उगलती चिमनियाँ है. विस्थापित लोग बस्तों में डॉलर लिए घूम रहे हैं. प्रेम के लिए कोई जगह नहीं है.

जन्मदिन शुभ हो मनोज. ये पोस्ट तुम्हारे लिए कि हम इसी रेगिस्तान में नंगे पांव दौड़ते हुए बड़े हुए हैं. हमें इससे प्रेम है. एक दिन आंधियां बुहार देगी हमारे पांवों के निशान मगर तब तक दिल में बसा रहे ये प्यारा रेगिस्तान...

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…