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मैं इधर तन्हा बैठा हुआ हूँ

मैं रूआँसा हूँ। विवेकानंद चौराहे से आती माँ भारती की आरती के स्वर से आँख खुली। सुबह के छह बजे थे। हल्का उजास दरवाज़ों और पर्दों के बीच से जगह बनाता हुआ आ रहा था। मुझे लगा कि दो साल से टूटे फूटे चौराहे के बीच धूल मिट्टी से भरी आदमक़द प्रस्तर प्रतिमा पर अनेक फूलों की मालाएँ पड़ी हुई है। सामने बिछी हुई दरियों पर कुछ बच्चे और पीछे लगी हुई कुर्सियों पर वृद्ध लोग बैठे हुये हैं। मैं इन आवाज़ों को रिकॉर्ड कर लेना चाहता हूँ। इन आवाज़ों में सम्मोहन है। मैंने स्कूल यूनिफ़ोर्म में ऐसी प्रतिमाओं के फेरे लगाए हैं। मैंने लाउड स्पीकरों पर बजते हुये सुना है हिम्मत वतन की हम से हैं। इन शब्दों और सुरों ने मेरे पाँवों में जान फूंकी। चुपके से एक उत्साह मन में उतर आया। कोई शब्द मुझे नाचने जैसी ऊर्जा से भरता रहा है। कई बार मेरी आँखों की कोरों तक अपने वतन से प्रेम की नमी का दरिया आकर ठहर गया।

ज तीसरी रात है जब मैं ठीक से सो नहीं पाया हूँ। पिछली तीन रातें करवटें बदलते हुये, नामाकूल ख्वाब देखते हुये बीती। हरारत और उलझा हुआ मन लिए जागा। बड़ी मुश्किलों से ताज़ा सुबहों को बिताया। इन उलझनों को कोई नहीं समझ सकता है कि मनुष्य बड़ी सीमित बुद्धि के साथ इस दुनिया में आया है। वह सदा अपने लघुतम ज्ञान से इस आदमी के जटिल मन की थाह लेने की कोशिशें करता रहता है। अक्सर पाता हूँ कि जिनसे मेरी दुनिया बनती हैं वे मुझे मेरे हाल पर क्यों छोड़ नहीं देते। कैसा तो प्रेम होता है और कैसे किया जाता है? मुझे मालूम नहीं है। अवसाद की चुप्पी और अजनबीयत को बरदाश्त करना सीख पाना कठिन काम है। इसे तुम कभी सीख न पाओगे। मुझे यकीन है कि ज़िंदगी जा रही है। इसी पल चली गयी है, चली ही जा रही है।

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्‌ ॥

इस रास्ते पर उलझनें हैं, बेखयाली है, कोहरा है, नासमझी है कि ज़िंदगी मुझे कई सारी बातें एक साथ कह रही है। इसके कारण मेरी बुद्धि सम्मोहित हो गयी है। मैं अनेक बातों के बीच उलझ गया हूँ। मैं चाहता हूँ कि एक ही बात कहे। कायदे की बात कहे ताकि मैं कल्याण को प्राप्त हो सकूँ। मुझे मेहनतकशों और वतन के लिए लड़ने का पाठ पढ़ाया था। मैं इस पाठ को भूल कर रूआँसा बैठा हुआ इस वक़्त सिर्फ अपने पापा से बात करना चाहता हूँ। मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि पापा मैं रोने जैसा क्यों हूँ। मुझे किस चीज़ की कमी है। मैं कहाँ उलझ गया हूँ कि मुझे किसी से प्रेम, किसी से नफ़रत की हविश ही नहीं है। मैं कुछ न पाना चाहता हूँ न ही कुछ खोना। फिर ये सौदा क्या है। इसकी दीवानगी क्यों मेरे सर पर सवार है। मैं बेक़रार क्यों हूँ।

मुझ पर समाज के हाल का सदमा है। हालातों से लड़ रहे लोगों को देखते हुये उदास होने लगता हूँ कि मंज़िल बहुत दूर है। व्यवस्था एक पठार और आंदोलन इसे चीरती हुई जल धाराएँ। इस रूढ़िवादी, चारित्रिक रूप से कुपोषित, बदशक्ल हो रहे समाज को बदला ही जाना चाहिए। नौवीं कक्षा के तीसरे या चौथे पीरियड में पापा सामाजिक विज्ञान पढ़ा रहे थे। उन्होने कहा "जिसे हम धारण करते हैं, वह धर्म है।" सोच रहा हूँ कि मैंने क्या धारण किया हुआ है, उदासी। समाज ने क्या धारण किया हुआ है, दुश्चरित्र। राज्य ने क्या धारण किया हुआ है, भ्रष्टाचार। दुनिया ने क्या धारण किया है, लालच। हम सबका धर्म कैसा हो गया है।

मुद्दत के बाद उसने जो की लुत्फ की निगाह
जी खुश तो हो गया, मगर आँसू निकल पड़े।

कैफ़ी साहब मुझे ऐसा हाल भी किसी सूरत नज़र नहीं आता। न कोई निगाह होती है न कोई लुत्फ आता है। घबरा कर मयकशी को बैठो तो उसी से जी उचटने लगता है। बंद कमरे से बाहर खुली छत तक कुर्सी को खींच लाता हूँ। सर्द हवा में गालों पर कोई छूअन, रात के पहलू में कोई अजनबी तसव्वुर, बेहिसाब अंधेरे में रोशनियों के दीये, बीता हुआ ज़माना और बेड़ियों में जकड़े हुये आज के बीच, एक के बाद एक पैमाना खाली मगर वही हाल। सुकून गायब, सीढ़ियाँ उतर कर खाने की मेज तक सिर्फ इसलिए जाना कि देर से नीचे जाने पर उसे ज्यादा दुख होगा। उठने से पहले सोचता हूँ कि रात जा रही है और मैं इधर तन्हा बैठा हुआ हूँ। कभी सोचता हूँ कि उसे कह दूँ ऊपर का माला खराब हो चुका है। मैं अपने ही वश में नहीं हूँ। मैं होना ही नहीं चाहता हूँ।

कोई न दो आवाज़ मेरे नाम को कि मैं बरबाद हूँ। मैं फ़िनिश्ड हूँ और किसी उम्मीद में मैंने रेडियो की आवाज़ को तेज़ कर दिया।

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…