Skip to main content

नया साल मुबारक हो।


शाम हो आई है। सीढ़ियाँ चढ़ कर छत पर आते हुये देखा कि रोशनियाँ कोहरे के जादू को अपने आस पास गोल गोल बुन रही है। इसी मौसम में पिछले साल रात के दस बजे अमर कढ़ी उबाल रहा था और मैं विस्की का ग्लास थामे हुये रसोई में खड़ा हुआ साल उन्नीस सौ नब्बे को याद कर रहा था। जोधपुर के पास दईजर गाँव की पहाड़ियों में वक़्त के सितमों से अनजान लड़कों की मस्तियों और साथी लड़की कड़ेट्स के लिए असीम जिज्ञासा से भरी परछाइयाँ। कई बेतरतीब नगमे और सिपाहियों के चुट्कुले और अफसरान साहिबों जैसा बन जाने के हसरत लिए हुये बीतते दिनों की याद। ज़िंदगी है तो हादसे पेश आते ही रहते हैं, हादसे हमारा पीछा करते हैं। वे कभी कभी सामने से घेर कर हमें मार गिराना चाहते हैं। कुछ लोग अलग मिट्टी के बने होते हैं वे ऐसे हादसों के बाद उसे चिढ़ाना नहीं भूलते। इसलिए अमर कढ़ी बना रहा था तभी मैंने कहा- सरदारों को इतनी तल्लीनता से काम नहीं करना चाहिए। अमर ने मुड़ कर मुसकुराते हुये अपना ग्लास उठा लिया। उस सरकारी रसोई में दो बिहार से आए हुये प्यारे बच्चे काम कर रहे थे। वे मुझे देख कर मुस्कुराने लगे। 

आभा ने कढ़ी बनाई है। लाल मिर्च की चटनी भी। मैंने साबुत लाल मिर्च को पानी से धोया और फिर बीज निकाल कर उसे हल्का सा चौप करने को रख दिया था। लहसुन आधे आधे छीले माने आधे आभा ने आधे मैंने। उसकी तबीयत ज़रा उदास है। मैंने कहा- इस दुनिया में तकलीफ का कोई हिसाब नहीं होता है। ज़िंदगी हर हाल में मुस्कुराने का हुनर जानती है। ऐसी ही बातों में लाल मिर्च और लहसुन के साथ आभा ने हरा धनिया भी ग्राईंड कर दिया। उसे अच्छा नहीं लगा कि चटनी का लाल रंग कोई और रंग हो गया। मैंने कहा अगली बार चटनी में हरा धनिया ऐसे डालेंगे कि लाल चटनी में हरी पत्तियाँ साफ दिखती रहे। हालांकि जिंदगी को रिवाईंड करने का कोई तरीका नहीं है फिर भी आगे के लिए कुछ चीजों को ठीक करने की उम्मीद तो की ही जा सकती है। सिर्फ एक उम्मीद। 

दोपहर बड़ी गुंजलक थी। समझ नहीं आ रहा था कि अब तक की ज़िंदगी के दिनों को जिस दांव पर लगा दिया था वह सही था या गलत। वे कैसी जगहें थी जहां हमारे दिन और रात गिरते गए। उनकी खुशबू का कोई टुकड़ा कहीं बचा है क्या? दफ्तर के गलियारों में सूनापन था, जाहिर है कि चीज़ें एक दिन उन कामों को करना बंद कर देती है जिनके लिए वे बनाई गयी होती हैं। इसे भी तकसीम हुये कई साल बीत गए हैं। यहाँ कभी क़हक़हों और प्रोग्रेमरों के कदमों का शोर हुआ करता था। आज इसी जगह मैं बिदेस से आए दोस्त के एक फोन काल को सुनते हुये उसकी आवाज़ की पहचान को दर्ज़ करता हुआ तनहा टहल रहा हूँ। मैंने सोचा कि कितने तो ज़रूरी काम पड़े हुये हैं और मैं वक़्त के काले सफ़ेद खानों में उचकता हुआ सा कोई ठीक रास्ता बना ही नहीं पा रहा हूँ। मेरे पास कुछ कहानियाँ है, वे मेरे मेल में सेव की हुई है। मैं अगर शाम को घर जाने से पहले मर गया तो वे भी हमेशा के लिए मर जाएगी। अचानक लगा कि कोई दोस्त अपने पुराने मेल चेक करेगा और ब्लॉग फीड से आई किसी कहानी को खोज निकालेगा। मेरे मर जाने के बाद सब उन कहानियों की खूब खुले दिल से तारीफ करेंगे। कि ज़िंदा आदमी का कोई भरोसा नहीं होता है। आज उसकी तारीफ करो और कल उसका नामालूम 'चरितर' कैसा निकले। कल वह तारीफ करने वाले को ही नालायक कह बैठे। इसीलिए मैंने खुद को कहा कि ये कुछ ड्राफ्ट्स पड़े हैं इन पर काम कर ही लो। मरने के बाद फिर इसी कहानी कहने के काम में लगना कितना वाहियात होगा। 

शाम को जब घर आया तो मालूम हुआ कि दुष्यंत को पतंग और मंजा चाहिए। जयपुर में रेलवे स्टेशन जाते समय भी रास्ते में बहुत सारी पतंगों वाली दुकाने दिखाई दी थी। हमने उसे हर बार छेड़ा था। देखो दुशु पतंग की दुकान। वह अपनी एक खास मुस्कान के साथ एक दो बार बर्दाश्त करता और फिर कहता गाड़ी रोक लो न, खरीद लेते हैं। कानजी ने अपनी सब्जी की दुकान के पास वाली दुकान में कुछ पतंगें और चरखियाँ रखी हुई हैं। दुशु को काँच वाला मंजा चाहिए। ये एक सख्त कानून बनाने की इच्छा जैसा मामला है। वह चाहता है कि दखल देने और अनुशासनहीनता करने वाली पतंगों को सबक सिखाया जा सके। मैं कहता हूँ- बेटा काँच वाले मंजे से कई निर्दोष और बेज़ुबान पंछियों के पर कट जाते हैं। कानजी कहते हैं- अरे नहीं इस मंजे से करंट आ जाता है कि इसके ऊपर काँच लगा होता है। एक सौ चालीस रुपये में पाँच पतंग एक मंजे से भरी चरखी, एक खाली छोटी चरखी लेकर हम घर आ जाते हैं। अभी ये सारा सामान करीने से मेरे सामने वाले आले में सजा हुआ है। अब इस कमरे में दो तरह की चीज़ें हैं। एक पतंग उड़ाने से जुड़ी हुई दूसरी शराब और किताबें। शराब अच्छी नहीं बची है। सिर्फ रॉयल स्टेग की दो बोतलें हैं। पतंगों के बारे में कुछ कहना मेरे बूते की बात नहीं है। 

मैंने अच्छी कवितायें सिर्फ इसलिए लिखी कि मैं प्रेम करता हूँ। मैंने बुरी कवितायें इसलिए नहीं लिखी कि मैं प्रेम नहीं करता था। बीते सर्दी के मौसम में एक लड़की मिली थी। उसके दिमाग में कुछ अजब तरह के रसायन थे। वह अपनी उम्र से ज्यादा सोचा करती थी। मैं उसके बारे में सोचते हुये डरता था। उसके लिए एक कविता में लिखा था कि पगले ज़हीन होना भी एक रोग है। वक़्त का बे-पटरी का पहिया घूमता रहा और मैं उससे मिलकर बिछड़ गया। ये ज़िंदगी का ही उसूल है। चीज़ें और रिश्ते जब तक आभासी हों प्यार बना रहता है। जब वे हक़ीक़त में ढलते हैं तो उनको बचाए रखने लिए बहुत सारे एफर्ट करने होते हैं। लेकिन अक्सर मालूम ये होता है कि उसे जाना कहीं और था मुझे कहीं और। लेकिन ये वो झूठ होता है जो हम खुद से बोलते हैं, सच ये होता है कि हमने एफर्ट लेने बंद कर दिये होते हैं। अच्छी बात सिर्फ ये होती है कि हम उन दिनों में भरे भरे रहते हैं। जैसे उसके फोन नंबर मांगने से लेकर सेलफोन पर चमकते हुये उसके नाम को देख कर खुशी से चौंक उठते हैं। बाद महीनों के उसका नाम नहीं चमकता और हर तरफ एक उदासी आ बैठती है। ना मैं हाल पूछता हूँ ना वो हाल पूछती है। याद मगर आता है कि बेहतर लिखने को एक खयाल भर ही काफी है। 

अभी जब से इधर बैठा हूँ बहुत सारी कवितायें लिखने का मन हो रहा है। कई दिनों से पुरानी कवितायें अपने फेसबुक पन्ने पर लगा रहा हूँ। नए नए दोस्त आ रहे हैं। वे लाइक करते हैं तो मैं खुश हो जाता हूँ कि चलो मेरी बात किसी और के दिल की बात भी है। वे सब अच्छे हैं मगर मैं ज़रा बुरा बुरा सा हूँ। जैसे मैं अभी चाहता हूँ कि ये लिखना बंद करूँ और विस्की का एक पेग बना लूँ। ऐसा इलसिए नहीं कर रहा हूँ कि फिर जाने क्या लिखने लगूँ। होश में होने का भरम भी बड़ा अच्छा भरम होता है। आप इसे भ्रम भी कह सकते हैं। अचानक से आप पाते हैं कि आप इगनोर हुये जाते हैं। अक्ल कहती है कि चुप रहो, दिल कहता है कह दो कि तुम सिर्फ दोस्त ही नहीं हो, तुमसे प्यार भी है। फिर इस तरह के बेढब स्पीड ब्रेकर्स से गुज़रने की उम्र विदा हो चुकी है। आज मगर दफ्तर के आहाते में लगी बेरी के बेर खाते हुये खट्टे दिनों की खूब याद आई। मिट्टी में गिरे हुये बेर उठा कर जींस से रगड़ते हुये सोचा कि कोई प्यार करता है तो क्या और न करता हो तो क्या? 

यूं तुम उदास न होना कि फरेबी बातें करने में भी बड़ा मजा है। नया साल मुबारक हो। 
* * *

बीते साल के आखिरी दिनों की ये तस्वीर तोषी की है। आपका पूरा नाम कबीर चौधरी है। आप हैरत से इतनी रंग बिरंगी गेंदों को देख रहे हैं और समझने की कोशिश मैं है कि आखिर पापा और मेरे भाई बहन कर क्या रहे हैं। 

Popular posts from this blog

पतनशील पत्नियों के नोट्स

फरवरी का पहला सप्ताह जा चुका है मगर कुछ रोज़ पहले फिर से पहाड़ों पर बर्फ गिरी तो रेगिस्तान में भी ठण्ड बनी हुई है. रातें बेहिसाब ठंडी हैं. दिन बेहद सख्त हैं. कमरों में बैठे रहो रजाई-स्वेटर सब चाहिए. खुली धूप के लिए बाहर आ बैठो तो इस तरह की चुभन कि सबकुछ उतार कर फेंक दो. रेगिस्तान की फितरत ने ऐसा बना दिया है कि ज्यादा कपड़े अच्छे नहीं लगते. इसी के चलते पिछले एक महीने से जुकाम जा नहीं रहा. मैं बाहर वार्मर या स्वेटर के ऊपर कोट पहनता हूँ और घर में आते ही सबको उतार फेंकता हूँ. एक टी और बैगी पतलून में फिरता रहता हूँ. याद रहता है कि ठण्ड है मगर इस याद पर ज़ोर नहीं चलता. नतीजा बदन दर्द और कुत्ता खांसी. 
कल दोपहर छत पर घनी धूप थी. चारपाई को आधी छाया, आधी धूप में डाले हुए किताब पढने लगा. शादियों का एक मुहूर्त जा चुका है. संस्कारी लोगों ने अपनी छतों से डैक उतार लिए हैं. सस्ते फ़िल्मी और मारवाड़ी गीतों की कर्कश आवाज़ हाईबर्नेशन में चली गयी है. मैं इस शांति में पीले रंग के कवर वाली किताब अपने साथ लिए था. नीलिमा चौहान के नोट्स का संग्रह है. पतनशील पत्नियों के नोट्स. 
तेज़ धूप में पैरों पर सुइयां सी चुभती …

तुम्हारे सिवा कोई अपना नहीं है

वे अलसाई नन्हीं आँखों के हैरत से जागने के दिन थे. बीएसएफ स्कूल जाने के लिए वर्दी पहने हुए संतरियों को पार करना होता था. उन संतरियों को नर्सरी के बच्चों पर बहुत प्यार आता था. वे अपने गाँव से बहुत दूर इस रेगिस्तान में रह रहे होते थे. वे हरपल अपने बच्चों और परिवार से मिल लेने का ख़्वाब देखते रहे होंगे. वे कभी कभी झुक कर मेरे गालों को छू लेते थे. उन अजनबियों ने ये अहसास दिया कि छुअन की एक भाषा होती है. जिससे भी प्यार करोगे, वह आपका हो जायेगा. लेकिन जिनको गुरु कहा जाता रहा है, उन्होंने मुझे सिखाया कि किस तरह आदमी को अपने ही जैसों को पछाड़ कर आगे निकल जाना है. 
मुझे आज सुबह से फुर्सत है. मैं अपने बिस्तर पर पड़ा हुआ सूफी संगीत सुन रहा हूँ. इससे पहले एक दोस्त का शेयर किया हुआ गीत सुन रहा था. क्यूँ ये जुनूं है, क्या आरज़ू है... इसे सुनते हुए, मुझे बहुत सारे चेहरे याद आ रहे हैं. तर्क ए ताअल्लुक के तज़करे भी याद आ रहे हैं. मैं अपनी ज़िंदगी से किसी को मगर भुलाना नहीं चाहता हूँ. उनको तो हरगिज़ नहीं जिन्होंने मुझे रास्ते के सबब समझाये. नौवीं कक्षा के सर्दियों वाले दिन थे. शाम हुई ही थी कि एक तनहा द…

एक लड़की की कहानी

कहानी कहना एक अच्छा काम है. मैं कुछ सालों तक लगातार ड्राफ्ट तैयार करता रहा फिर अचानक से सिलसिला रुक गया और मैं अपने जाती मामलों में उलझ कर कुछ बेवजह की बातें लिखने लगा. मुझे यकीन है कि मैं एक दिन अच्छी कहानी लिखने लगूंगा... मेरा समय लौट आएगा.

कुछ एक मित्रों के अनुरोध पर अपनी आवाज़ में एक कहानी यहाँ टांग रहा हूँ. इस कहानी को रिकार्ड करने के दौरान किसी भी इफेक्ट का उपयोग नहीं किया है कि आवाज़ अपने आप में एक इफेक्ट होती है... खैर किसी भी तरह का बैकग्राउंड म्यूजिक नहीं है, सिर्फ आवाज़...

बिना कोई और बात किये, लीजिए सुनिए.