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Showing posts from January, 2013

इस वक़्त चाँद गायब है

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मैं उनींदा हूँ। मैं सपने में हूँ। मैं जागने से पहले के लम्हे की गिरफ़्त में हूँ। मैं जाने किधर हूँ। देखूँ तो पाता हूँ कि मैं अपने घर की छत पर बैठा हूँ। हवा में हल्की ठंड है। पहाड़ पर एक प्रार्थना की तरह प्रकाश विस्तार पा रहा है। मैं कहता हूँ, ओ प्रकाश, मुझ तक भी आओ। मेरे पास कुछ नहीं आता इसलिए एक नयी कामना करता हूँ। मुझे ज्यादा ठंडी हवा का स्पर्श चाहिए। मुझे आइस क्यूब चाहिए। मैं अपने भीतर की तनहाई को बर्फ के साथ जमा देना चाहता हूँ। मेरी तनहाई एक आग है। मेरी चाह है कि आग पानी में क़ैद हो जाए। कई रात पहले एक तारा टूटा। उसी रात मैंने उसे देखा। उसी वक़्त मैंने चाहा कि एक नाम भूल जाऊँ। किसी ने कुछ नहीं कहा भूलने या याद रखने के बारे में, इसलिए मैंने खुद से कहा कि इंतज़ार करो। एक दिन सबकी टूटने की बारी आती है। एक दिन सबके दरवाजे से झांक रही होती है महबूब की आँखें। उस एक आखिरी दिन के लिए, कई रातों पहले वाली तारा टूटने वाली रात को देखने के लिए, तुम रख देना अपनी आत्मा मेरी आँखों के सामने.... 
इस वक़्त तुम जाने कहाँ हो
किस जगह रखे हैं तुम्हारे पाँव?
मगर इस याद का किस्सा शुरू होता है
उस पल से
जब…

Best seller - A collection of stories written by Kishore Choudhary : The second edition

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These stories comprise a world revolving around the relationship between man and woman. What keeps the reader glued to the stories is the writer’s way of rendering the ‘normal’ day-to-day incidents with unconventional metaphors and images, leaving the reader overwhelmed. The characters and situations evolving out of these incidents, however, do not turn these stories into mere escapist fantasies, but pull the reader towards themselves, painting a live picture of all the characters—creating a sense of déjà-vu.
The stories do not seek perfection in human lives by passing judgments of any kind, but encompass the complexity of the minutest of human emotions, weaving a melancholic but realistic face of life. The protagonists, often caught in a web of life—in the strands of love, lust and emotions, keep going to-and-fro, tossing like a boat on the waves of their physical and sentimental world.
The stories run in a style which is poetic in narration, carrying the knowledge that rises after exp…

याद की रेज़गारी के बीच

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एक बेपरवाही का पर्दा है। मुसलसल हवा की आमद के साथ हिलता है और धोखा होता है कि कोई आया। दीवार पर बीते दिन की महीन परछाई है। उड़ते हुये रंगों की याद का कोलाज है। फूल सा फाहा है स्मृति का। हालांकि नहीं लौट कर आता कुछ भी फिर भी दुआ भी कोई चीज़ है। जहां रहे खुश रहे, आक के डोडे से बिछुड़ा हुआ सफ़ेद पंख लगा उम्मीद सरीखा बीज सा पल। उदासियों की विदाई की कुछ बातें हैं, बेवजह बातें।

कि जिंदगी के बस्ते में रखी याद की रेज़गारी के बीच
एक चेहरा खड़ा है,
रुत बदलने की उम्मीद लिए खड़े किसी पेड़ की तरह।
* * *

याद करना चाहिए उस दुख को
जिसके साथ पहली बार आया था मुक्ति का खयाल।

मैं मगर दिल में रखता हूँ, गिरफ़्त होने की घड़ी को।
* * *

तुम यहाँ सिर्फ जी नहीं रहे हो
तुम हो यहाँ पर किसी विहंगम दृश्य को देखने के लिए नियुक्त पहरेदार
तुम में भरी है अद्भुत शराब।

तुम छूकर आए थे, एक लिफ्ट के आखिरी क्षणों में महबूबा के बाल।
* * *

और मेरी पसंद के बारे में पूछते ही
मैं खो गया रंगों के ऐंद्रजाल में
मगर उचक कर दिया मैंने जवाब कि सवाल ही गलत है।

इसलिए कि हर कोई जानता है
मेरा महबूब रख दे जिस रंग पर नज़र, मुझ…

मैं इधर तन्हा बैठा हुआ हूँ

मैं रूआँसा हूँ। विवेकानंद चौराहे से आती माँ भारती की आरती के स्वर से आँख खुली। सुबह के छह बजे थे। हल्का उजास दरवाज़ों और पर्दों के बीच से जगह बनाता हुआ आ रहा था। मुझे लगा कि दो साल से टूटे फूटे चौराहे के बीच धूल मिट्टी से भरी आदमक़द प्रस्तर प्रतिमा पर अनेक फूलों की मालाएँ पड़ी हुई है। सामने बिछी हुई दरियों पर कुछ बच्चे और पीछे लगी हुई कुर्सियों पर वृद्ध लोग बैठे हुये हैं। मैं इन आवाज़ों को रिकॉर्ड कर लेना चाहता हूँ। इन आवाज़ों में सम्मोहन है। मैंने स्कूल यूनिफ़ोर्म में ऐसी प्रतिमाओं के फेरे लगाए हैं। मैंने लाउड स्पीकरों पर बजते हुये सुना है हिम्मत वतन की हम से हैं। इन शब्दों और सुरों ने मेरे पाँवों में जान फूंकी। चुपके से एक उत्साह मन में उतर आया। कोई शब्द मुझे नाचने जैसी ऊर्जा से भरता रहा है। कई बार मेरी आँखों की कोरों तक अपने वतन से प्रेम की नमी का दरिया आकर ठहर गया।
आज तीसरी रात है जब मैं ठीक से सो नहीं पाया हूँ। पिछली तीन रातें करवटें बदलते हुये, नामाकूल ख्वाब देखते हुये बीती। हरारत और उलझा हुआ मन लिए जागा। बड़ी मुश्किलों से ताज़ा सुबहों को बिताया। इन उलझनों को कोई नहीं समझ सकता ह…

कमअक्ल ये सब क्योंकर सोचता हूँ

शैतान की अक्ल भी जवाब देने लगी है। अच्छा खासा आराम की ज़िंदगी बसर कर रहा है मगर खयाल ऐसे लिखने लगा है कि कल को कोई कह दे, चलो बुलावा आया है। फिर सोचता है कि यूं भी ज्यादा से ज्यादा बीस एक साल बची है उम्र। साथ वाले कितने ही लोग बिना कुछ कहे निकल लिए है। हम जाते हुये दिल की बात तो कह कर जाएँ।

वो जो क़ाफ़िला है बख्तरबंद कारों का और घूमता फिरता है अपने ही वतन की गलियों में, अपने ही लोगों के चेहरों के बीच किस खौफ से घिरा है, क्यों इस कदर पेट्रोलिंग दस्तों में महफूज,  पायलट कारों के दिखाये रास्ते पर है बढ़ता, कौन है दुश्मन इन बख्तरबंद कारों में बैठे गोरे चिट्टे नाज़ुक लोगों का?

मैं सिपाही सीमा की सर्द चट्टानों पे बैठा सोचता हूँ
मैं सिपाही सीमा की तपती रेत पे बैठा सोचता हूँ।

वे खुशबाश गंधों से नहाये, शोफरों के सजदों से बेपरवाह, जिनके बस्ते नौकर उठाए, जो चल के जाएँ तो लगे कि गुलाबी रुई के फाहे उड़ते जाते हैं। उनके लिए ब्रितानी और अमरीकी स्कूलों के दरवाजे खुले हैं, वे कौन है बच्चे?

मैं सिपाही स्कूल जाते बिना पोलिश जूते पहने बच्चों को देखता हूँ
मैं सिपाही स्कूल जाते ट्रेक्टर में बैठे धूल सने …

नहीं लौटना चाहता हूँ दम तन्हा

उन दो मामूली लोगों के लिए जिनकी याद में कीमती लोगों के मुंह पर थूकने को जी चाहता है


हाँ उनके ही लिए बहुत सारे दुख उठाने होंगे लोगों को
हाँ उनके ही खातिर, अगर आप करते हैं प्रेम अपने लोगों से। इस वक़्त, अपना हाथ उठाना वे लोग
सिर्फ वे जो कह सके कि मैंने क्या बोया है
क्या खो दिया इस कोशिश में
किस तरह से लड़ा हूँ इसके लिए
सिर्फ उन्हीं के दिलों को हक़ है इज़्ज़त से सर उठाने का।

मुझे प्रेम है अपनी मातृभूमि से
मैं बहता हुआ आँसू हूँ, उन सिपाहियों के लिए जो न आ सके लौट कर
मैं हिकारत से देखता हूँ उन लोगों को जो उनके न लौटने की नाजायज वजह बने

कि मुझे नहीं खेला जाता आस्तीन के साँपों के साथ
कि ये कमजोरी है मेरे जींस के साथ आई है
कि मैं नहीं गया कंधार, मैंने नहीं गाया, कोई गीत आगरा का
कि मैं खराब हूँ किसी धतूरे के बीज की तरह, किसी बीज के बीच के लाल रंग की तरह
कि एक दिन हथियारों के खिलाफ हम लड़ेंगे सब्ज़े के लिए
कि एक दिन....

दुआ करूंगा कि रास्ते में न मिल जाएँ उन सिपाहियों के बच्चे
कि नहीं लौटना चाहता हूँ दम तन्हा, मैं अपने घर। 

नया साल मुबारक हो।

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शाम हो आई है। सीढ़ियाँ चढ़ कर छत पर आते हुये देखा कि रोशनियाँ कोहरे के जादू को अपने आस पास गोल गोल बुन रही है। इसी मौसम में पिछले साल रात के दस बजे अमर कढ़ी उबाल रहा था और मैं विस्की का ग्लास थामे हुये रसोई में खड़ा हुआ साल उन्नीस सौ नब्बे को याद कर रहा था। जोधपुर के पास दईजर गाँव की पहाड़ियों में वक़्त के सितमों से अनजान लड़कों की मस्तियों और साथी लड़की कड़ेट्स के लिए असीम जिज्ञासा से भरी परछाइयाँ। कई बेतरतीब नगमे और सिपाहियों के चुट्कुले और अफसरान साहिबों जैसा बन जाने के हसरत लिए हुये बीतते दिनों की याद। ज़िंदगी है तो हादसे पेश आते ही रहते हैं, हादसे हमारा पीछा करते हैं। वे कभी कभी सामने से घेर कर हमें मार गिराना चाहते हैं। कुछ लोग अलग मिट्टी के बने होते हैं वे ऐसे हादसों के बाद उसे चिढ़ाना नहीं भूलते। इसलिए अमर कढ़ी बना रहा था तभी मैंने कहा- सरदारों को इतनी तल्लीनता से काम नहीं करना चाहिए। अमर ने मुड़ कर मुसकुराते हुये अपना ग्लास उठा लिया। उस सरकारी रसोई में दो बिहार से आए हुये प्यारे बच्चे काम कर रहे थे। वे मुझे देख कर मुस्कुराने लगे। 
आभा ने कढ़ी बनाई है। लाल मिर्च की चटनी भी। म…