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इमोटिकॉन्स - भाषा में मोक्ष का मार्ग

कोई किस हाल में जी रहा है, ये तुम कभी भी जान और समझ नहीं सकते हो. इसलिए सबके लिए थोड़ा प्यार रखना. कुछ बोलकर किसी का भी दिल न दुखाना.
* * *

कल सुबह बारिश हो रही थी. बारिश के सुर में जीवन के आलाप को सुनते, मैं बहुत देर तक बालकनी से बादलों के बरसते हुए फाहे देखता रहा. चाय की ख़ुशबू, कहानी की किताबों के पन्ने, बाहर दूर तक फैली हरी झीनी चादर के बीच बने रास्ते सम्मोहक थे. जीवन में एक ठहरा हुआ सुकून भरा पल कितनी हीलिंग से भरा होता है? ये हम अक्सर समझ नहीं पाते हैं.

अगस्त की आखिरी शाम को जयपुर की सड़कों से भीड़ गायब थी.

जगतपुरा से विद्याधर नगर वहां से मानसरोवर होते हुए मालवीय नगर तक आते हुए देखा कि शहर किसी सुस्ती में डूबा है. शायद बारिश ने शहर की बदहवास दौड़ पर आराम का कोई फाहा रखा होगा.

मॉल्स पर भीड़ नहीं थी. मैंने आभा से कहा- "बताओ क्या उपहार लिया जाये. कल आपका जन्मदिन है" आभा ने अपनी आँखों से इशारा किया जिसका अर्थ था- "मैं बेहद ख़ुश हूँ और जीवन ने जो दिया है, वह बहुत है." क्या सचमुच एक इशारे भर से इतना कहा जा सकता है? आप इससे असहमत हो सकते हैं. लेकिन वास्तविकता ये है कि भाषा के संकेत कुछ नहीं कहते हैं. हमने ही उन संकेतों के अर्थ तय किये हैं. लेकिन चेहरे के संकेत, आँखों के इशारे और हमारे बदन की लय एक अलिखित और बेहद व्यापक अर्थों वाली भाषा है.

हम जिस दौर में जी रहे हैं, उसमें संकेतों की एक नई भाषा है. ईमेल से सोशल एप तक के लम्बे सफ़र में इमोटिकॉन्स हमारे संवाद का अविभाज्य हिस्सा हो गए हैं. इमोटिकॉन्स की खोज किसने की थी? आप इसे गूगल करेंगे तो एक ठीक नाम पाएंगे स्कॉट फह्लमैन. गूगल आपको ये भी बताएगा कि इस खोज का वर्ष था, उन्नीस सौ बयासी.

अल्प विरामों और बोधक चिन्हों के मेल से किसी चेहरे के साथ अनुभूति का मिश्रण इमोटिकॉन है. इमोशन और आइकॉन से मिलकर बना ये शब्द और ये जादू अद्भुत है. मैं अपने दोस्तों, चाहने वालों और प्रसंशकों से बातचीत में बहुत बार या ज्यादातर इस तरह बात करता हूँ कि शब्द दो चार लिखता हूँ और इमोटिकॉन्स सौ-डेढ़ सौ. उनको हमेशा इस बात से तकलीफ होती है. वे कहते हैं हम बोलते रहते हैं. बक-बक करते हैं. आप केवल स्माइली बनाकर चलते बनते हैं.

मैं किसी से प्रेम करूँ तो उसके लिए प्रतिक्रिया में दिल बना दूँ. मैं अपनी तारीफ सुनकर एक लजाता चेहरा बना दूँ. ब्लश करने को आप कभी उतना अच्छा नहीं लिख सकते जितना कि ब्लश करती स्माइली से अभिव्यक्त कर पाते हैं. आप किसी अच्छी बात के लिए एक तारीफ भरा अंगूठा दिखा सकते हैं. आप किसी के बुरे व्यवहार के लिए माथे पर सलवटों से भरा लाल चेहरा बना सकते हैं.

ये सब है तो क्यों अपने आपको शब्दों में बेजा खर्च करें. आपके पास कितना समय है कि गप करते जाये. अपने काम भूलकर किसी को प्रसन्न रखने के लिए लिखें. बेमन जवाब देते जाएँ. दुनिया जितनी सिमटी है, आदमी के पास वक़्त की उतनी ही कमी हुई है. आप ग्लोबल होने की जगह ग्रामीण होकर देखिये. आप पाएंगे कि उम्र लम्बी हो गयी है. लेकिन हम ग्लोबल होने को अभिशप्त हैं. इसलिए लम्बे उबाऊ संवादों की जगह अनेक अर्थ देने वाली स्माइली मुझे ज्यादा उपयोगी लगती है.

इसे आप एक बेहद मामूली और अस्थायी कहकर बिसरा सकते हैं. लेकिन ये भाषा के भीतर उपस्थित विद्रोही हैं. इमोटिकॉन्स, अक्षरों से बनी शब्दों की भाषा को चुनौती है. हमारी संस्कृति, भाषा और संवाद पर कब्ज़ा करने की अविराम होड़ में इमोटिकोंस कम तनाव और भद्र विरोधों की नयी कल्चर को आगे बढ़ा रहे हैं.

जब भी कोई बड़ी असहमति होती है तब अगर बोला या लिखा न जाये और संकेतों से विरोध जता दिया जाये तो जीवन में एक अविश्वसनीय आसानी उग सकती है. हम अपने कहे और लिखे को लेकर लम्बे कष्ट उठाते हैं. लेकिन अक्सर संकेतों की भाषा में की गयी प्रतिक्रिया के कारण कम तकलीफ पाते हैं.

हमारी संकेतों की प्राचीन दुनिया के बीजक अभी तक पढ़े नहीं जा सके हैं. हम चाँद सितारों को जान लेने के लिए जितना काम कर रहे हैं, वह बहुत महत्वपूर्ण है. लेकिन हमारे पुरखे संकेतों की जो भाषा गुफाओं, तहखानों, पिरामिडों और ज़मीं में दबे हुए खंडहरों में छोड़ गए हैं. उसे पढने के लिए इतना काम नहीं कर सके हैं. मनुष्य वस्तुतः अपने भविष्य को लेकर जितना संवेदनशील हैं. अतीत के लिए ठीक उतना ही असंवेदन से भरा है.

हम होड़ में हैं इसलिए आगे ही देखना चाहते हैं. हम बीजकों में छिपे रहस्य भरे सूत्रों को समझने में वक़्त इसलिए नहीं गंवाना चाहते कि उस आनंद की प्राप्ति के प्रति आश्वस्त नहीं है. हम मंगल पर नया जीवन बसा पाएंगे या नहीं मगर इस सम्भव के लिए आशा रखते हैं.

इमोटिकॉन्स पर दुनिया भर में हजारों शोध किये गए हैं. ये शोध सामाजिक, व्यावहारिक और भाषा के साथ मनोविज्ञान से सरोकार रखते हैं. ये शोध अस्सी के दशक में हुए इस अविष्कार के उपयोग और फिर नब्बे के दशक में जापान में टेलीकम्युनिकेशन की भाषा में शामिल आइकॉन के प्रभाव को बहुत व्यापक बताते हैं. सबसे पहले जापान में ज्यादातर टेली ओपरेटर स्माइली की लेंग्वेज को अपडेट कर रहे थे. लोग इनका तेज़ी से उपयोग करने लगे थे. बहुत से लोग ये मानते हैं कि जापान ही स्माइली की उर्वरा भूमि है. जिसने इनको सुन्दर और प्रचलित बनाया है. वहीँ से इमोजी शब्द से हमारा परिचय हुआ है.

राकयेल एम ब्रिग्ग्स ने अपने शोध में इमोटिकॉन्स के बारे में कहा हैं- "मनुष्य के वृहद् सामाजिक इतिहास में हमारे व्यवहार विकास और सामाजिक अनुभव में इमोटिकोंस की उपस्थिति महत्त्वपूर्ण और व्यापक है."

इमोटिकॉन्स के बाद ये स्माइली, पिक्चर मेसेज के अगले पायदान पर है. जापान और चीन में तीन पीढियां इनके माध्यम से संवाद कर रही है. स्पेनिश लोग तो कलात्मक रूप से इनका उपयोग कर रहे हैं. सुविधाओं के उच्च शिखर पर बैठे दुनिया के शोषक अमेरिकन भी अपने हताश जीवन में नयी आशा के लिए स्माइली, इमोटिकॉन्स, पिक्चर मेसेज पर गहरा शोध कर रहे हैं.

भारत देश को बहुत बार सौ साल पीछे होने के लिए कोसा जाता है. पाश्चात्य अविष्कारों के सर्वाधिक प्रयोगकर्ता देश के सर पीछे होने का लेबल बेजा नहीं है. हम असल में सन्यास की अवधारणा और निठल्ले होने में सुख खोजने वाले लोग हैं. दुनिया भर के स्पेस कार्यक्रम को भारत ने अंगूठा दिखा दिया है. अन्तरिक्ष में उपग्रह स्थापित करने के कारोबार को भारत अगले दस साल में अधिग्रहित कर ले तो भी कोई आश्चर्य नहीं होगा. असल में आश्चर्य तब होगा जब हम फिर से नदी के घाट और सूने रेगिस्तान की बावड़ी के किनारे बैठकर सोचना शुरू करेंगे. कि धरती कैसे बनी है. प्राणी क्या हैं और हम सब कहाँ जायेंगे?

ये इमोटिकॉन्स हमारी भाषा में मोक्ष का मार्ग बना रहे हैं.

साल दो हज़ार दस से दुनिया भर में प्रचलित हुई नयी भाषा के स्टीकर अद्भुत हैं. लेकिन भारत में पिक्चर मेसेज ज्यादातर उधार के हैं. हमें जिस किसी एप ने जो दिया हमने अपना लिया. हमारे अपने ओरिजनल काम में दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज में हिंदी की एसो. प्रोफ़ेसर अपराजिता शर्मा बेहतरीन हैं. उनके नाम और काम से मेरा परिचय नीलिमा चौहान की किताब पतनशील पत्नियों के नोट्स में किये गए इलेस्ट्रेशन से हुआ था. उसके बाद मैंने फेसबुक पर उनके बहुत सारे काम को देखा. अपराजिता का काम इसलिए अच्छा है कि वे अपनी कल्पना की कश्ती को व्योम में उतार देती हैं. जब तक वे कल्पना को ठहरने न देंगी ये काम और सुन्दर होता जायेगा. लेखन और कलाएं कल्पनाशक्ति से ही प्राण पाती हैं.

आज की सुबह मैंने आभा को व्हाट्स एप पर एक बेहद सुन्दर बधाई भेजी है. ये अपराजिता का 'सितम्बर महीने का स्वागत' है. मेरे लिए सितम्बर का पहला दिन स्वागत का ही दिन है कि इसी दिन वो लडकी दुनिया में आई जिसने मुझे अपने बराबर बनाये रखा. जो मेरी तमाम खामियों और खूबियों को सहजता से स्वीकारती रही. जिसने मुझे लिखने के लिए स्पेस दिया. जिसने प्यार किया.

हैप्पी बर्थडे आभा.

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