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असल में कुछ नहीं हूँ मैं

पहले लोग दुआ सलाम करते हैं। फिर बात करने लगते हैं। उसके बाद अपना मन बांटते हैं। अपने बारे में सब बता देने के बाद जो उनको अच्छा लगा, वह पढ़कर सुनाते हैं। हज़ार बहाने खोजते हैं फोन पर एंगेज रखने के। उनको सुनते हुए। उनसे बात करते हुए। हम भी अपना मन कह देते हैं। फिर अचानक वे लोग कहीं खो जाते हैं। उनसे पूछो तो कहते हैं कि कोई बात है। तुम न समझोगे।

इस तरह अचानक अपनी इच्छा से आये लोग, अचानक खो जाते हैं।

अच्छी बात ये है कि अब तक उन्होंने वे बातें शायद सार्वजनिक न की जो हमने उनकी बातों के बहकावे में आकर कह दी थी।

उनका शुक्रिया।
* * *


मैं आपे से बाहर आया समंदर हूँ
मैं स्याह जादुई रात हूँ
मैं बहुत समय से भूखा शिकारी जीव हूँ
मैं श्मशान में चिता की राख में लेटा अघोरी हूँ.

अनवरत मंत्र पाठ की तरह
संभावनाएं जताता रहूँ अपने बारे में
तो भी जिन अंगुलियों में है
मेरी अंगुलियां छूने की चाहना, वे छू लेती हैं।
 
असल में कुछ नहीं हूँ मैं
हर कोई अपने स्वप्न/दुस्वप्न को छूता है और जाग जाता है।
* * *

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चुड़ैल तू ही सहारा है

रेगिस्तान में चुड़ैलों के कहर का मौसम है. वे चुपके से आती हैं. औरतों की चोटी काट देती हैं. इसके बाद पेट या हाथ पर त्रिशूल जैसा ज़ख्म बनाती हैं और गायब हो जाती हैं.
सिलसिला कुछ महीने भर पहले आरम्भ हुआ है. बीकानेर के नोखा के पास एक गाँव में चोटी काटने की घटना हुई. राष्ट्रीय स्तर के एक टीवी चैनल ने इस घटना को कवर किया. पीड़ित और परिवार वालों के इंटरव्यू रिकॉर्ड किये. कटी हुई चोटी दिखाई. बदन पर बनाया गया निशान दिखाया. गाँव के बाशिंदों की प्रतिक्रिया दर्ज की. पुलिस वालों के मत लिए. इसके बाद इसे एक कोरा अंध विश्वास कहा. घटना के असत्य होने का लेबल लगाया. टीवी पर आधा घंटे का मनोरंजन करने के बाद इस तरह सोशल मिडिया के जरिये फैल रही अफवाह को ध्वस्त कर दिया.
इसके बाद इस तरह की घटनाओं का सिलसिला चल पड़ा. बीकानेर के बाद जोधपुर जिले की कुछ तहसीलों में घटनाएँ हुईं. जोधपुर से ये सिलसिला बाड़मेर तक आ पहुंचा. सभी जगहों पर एक साथ पांच-सात स्त्रियों के साथ ऐसी घटनाएँ हुईं. उनकी कटी हुई चोटी का साइज़ और काटने का तरीका एक सा सामने आया. शरीर पर बनने वाले निशानों की साइज़ अलग थी मगर पैटर्न एक ही था.
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पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।