July 11, 2010

कुत्ते, तुम रोते क्यों हो यार ?

साल भर से मेरी स्थिति पंडित श्रीनारायण जैसी हो गयी है.
रांगेय राघव की कहानी रोने का मोल में पंडित श्रीनारायण का किरदार आते ही कहता है "धर्म नहीं रहा वरना दिनदहाड़े कहीं भला सड़क पर कुत्ता रोने दिया जाता है" बड़े लडके गोविन्द ने कहा "चाचा इसकी तो गरदन काट देनी चाहिए" छोटे मनोहर ने कुछ समझा कर कहा "रो लेने दो उसे, उसी ने उस दिन मेहरा के घर से उतरते चोर को पकड़वाया था." माँ ने टोक कर शीघ्रता से कहा "नहीं रे, यह बुरा सौं है. यम दर्शन होते हैं. क्यों मोहल्ले में मारे हैं सबको" श्री नारायण गरज पड़े "मनोहर, अबकी कहियो "
मनोहर उठ कर गंभीर हो गया. अँधेरा स्याह पड़ने लगा था. गोविन्द ने झटके से दरवाजा भेड़ दिया. अन्धकार में से कुत्ते ने सर घुमा कर इधर उधर देखा. दरवाजा बंद था. क्षण भर में वह सड़क पर आया और जोर जोर से रो पड़ा और द्वार खुलने से पहले ही अँधेरे में विलीन हो गया.

मेरे पड़ौसी राणा राम ने अपनी उम्र के अंतिम दिन विक्षिप्तता में बिताये. मैं उनको सुनता और उत्तर दिया करता था इसलिए सदा मुस्कुरा कर मिलते थे. एक सुबह वे घूमने निकले तो बीच रास्ते से एक पिल्ला उठा लाये. अब वे और पिल्ला दोनों परम मित्र हो गए. उनके लिए अपने दो बेटों और पत्नी से बढ़ कर पिल्ला था क्योंकि उसमे हर बात पर प्यार जताने और चाटने का गुण था. वह राणा राम की किसी बात का बुरा नहीं मानता था. उस पिल्लै को लाने के बाद वे एक साल तक जीवित रहे. वे चले गए तो उनकी याद में परिवार वालों ने कुछ महीने कुत्ते की ये सोच कर सेवा की कि पिताजी की आत्मा प्रसन्न रहेगी.

पिल्ला जब कुत्ता बन गया तो हर बात पर अधिकार जताने लगा. घर के आगे से निकलते हुए लोगों को काटने लगा. लोग आते और राणा राम के परिवार को गालियां सुनाते और लौट जाते. कुछ ने कुत्ते की मौका मिलते ही हजामत भी की. मार खाए कुत्ते को परिवार के लोग सहलाते और चाटते किन्तु वह दो दिन बाद फिर अपनी हरकतों पर उतर आता. गली के दूसरे कुत्तों से भय खाने के कारण वह ज्यादा दूर नहीं जाता और पडौसियों के दरवाजों पर अपने मूत की छाप लगाने लगा तो पडौसियों ने भी कुत्ते को राणा राम नाम दे दिया. हर दिन सुबह चाहे किसी और कुत्ते की करतूत हो स्त्रियाँ घर से बाहर निकलते ही एक दूसरे से कहती "ये कौन मरा" उत्तर मिलता "राणा राम..."

अपनी दीवार से लगते पड़ौसी राणा राम कुत्ते से मैं बहुत दुखी हूँ कि ये दिन और रात घर में बंधा हुआ रोता रहता है. इसके रोने से मुझे अब तक हल न हुई मुश्किलें याद आने लगती है और एक पढ़े लिखे आदमी की सारी पढाई हवा हो जाती है और वह सोचने लगता है कि कुत्ते का रोना वाकई बड़ा अपशकुन है.

उसकी आमद का ख़याल

शाम और रात के बीच एक छोटा सा समय आता है। उस समय एक अविश्वसनीय चुप्पी होती है। मुझे कई बार लगता है कि मालखाने के दो पहरेदार अपनी ड्यूटी क...