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कुत्ते, तुम रोते क्यों हो यार ?

साल भर से मेरी स्थिति पंडित श्रीनारायण जैसी हो गयी है.
रांगेय राघव की कहानी रोने का मोल में पंडित श्रीनारायण का किरदार आते ही कहता है "धर्म नहीं रहा वरना दिनदहाड़े कहीं भला सड़क पर कुत्ता रोने दिया जाता है" बड़े लडके गोविन्द ने कहा "चाचा इसकी तो गरदन काट देनी चाहिए" छोटे मनोहर ने कुछ समझा कर कहा "रो लेने दो उसे, उसी ने उस दिन मेहरा के घर से उतरते चोर को पकड़वाया था." माँ ने टोक कर शीघ्रता से कहा "नहीं रे, यह बुरा सौं है. यम दर्शन होते हैं. क्यों मोहल्ले में मारे हैं सबको" श्री नारायण गरज पड़े "मनोहर, अबकी कहियो "
मनोहर उठ कर गंभीर हो गया. अँधेरा स्याह पड़ने लगा था. गोविन्द ने झटके से दरवाजा भेड़ दिया. अन्धकार में से कुत्ते ने सर घुमा कर इधर उधर देखा. दरवाजा बंद था. क्षण भर में वह सड़क पर आया और जोर जोर से रो पड़ा और द्वार खुलने से पहले ही अँधेरे में विलीन हो गया.

मेरे पड़ौसी राणा राम ने अपनी उम्र के अंतिम दिन विक्षिप्तता में बिताये. मैं उनको सुनता और उत्तर दिया करता था इसलिए सदा मुस्कुरा कर मिलते थे. एक सुबह वे घूमने निकले तो बीच रास्ते से एक पिल्ला उठा लाये. अब वे और पिल्ला दोनों परम मित्र हो गए. उनके लिए अपने दो बेटों और पत्नी से बढ़ कर पिल्ला था क्योंकि उसमे हर बात पर प्यार जताने और चाटने का गुण था. वह राणा राम की किसी बात का बुरा नहीं मानता था. उस पिल्लै को लाने के बाद वे एक साल तक जीवित रहे. वे चले गए तो उनकी याद में परिवार वालों ने कुछ महीने कुत्ते की ये सोच कर सेवा की कि पिताजी की आत्मा प्रसन्न रहेगी.

पिल्ला जब कुत्ता बन गया तो हर बात पर अधिकार जताने लगा. घर के आगे से निकलते हुए लोगों को काटने लगा. लोग आते और राणा राम के परिवार को गालियां सुनाते और लौट जाते. कुछ ने कुत्ते की मौका मिलते ही हजामत भी की. मार खाए कुत्ते को परिवार के लोग सहलाते और चाटते किन्तु वह दो दिन बाद फिर अपनी हरकतों पर उतर आता. गली के दूसरे कुत्तों से भय खाने के कारण वह ज्यादा दूर नहीं जाता और पडौसियों के दरवाजों पर अपने मूत की छाप लगाने लगा तो पडौसियों ने भी कुत्ते को राणा राम नाम दे दिया. हर दिन सुबह चाहे किसी और कुत्ते की करतूत हो स्त्रियाँ घर से बाहर निकलते ही एक दूसरे से कहती "ये कौन मरा" उत्तर मिलता "राणा राम..."

अपनी दीवार से लगते पड़ौसी राणा राम कुत्ते से मैं बहुत दुखी हूँ कि ये दिन और रात घर में बंधा हुआ रोता रहता है. इसके रोने से मुझे अब तक हल न हुई मुश्किलें याद आने लगती है और एक पढ़े लिखे आदमी की सारी पढाई हवा हो जाती है और वह सोचने लगता है कि कुत्ते का रोना वाकई बड़ा अपशकुन है.

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…