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ईश्वर, दोस्तों को मुहोब्बत से पहले यकीन दे या पीना सिखा दे

कल शाम से सोच रहा हूँ कि कुछ दिनों के लिए शराब पीना छोड़ दूं और ऐसा आदमी बन कर देखूं जो प्रेम से नहीं हिसाब से दुनिया में जीये. कल दोपहर में अपना लेपटोप खोला. मेल नहीं थे. कुछ दोस्तों के पन्ने देखे, वहां भी उदासी थी. एक मित्र से चेट करने लगा, इसी चेट के दौरान कल दोपहर तीन बज कर चालीस मिनट पर फोन आया.
कहाँ हो...? ऑफिस में हूँ... मैं आपके शहर में हूँ, मेरे पास आधा घंटा है और मैं ऑफिस रही हूँ. मैंने कहा जाओ.
टेबल पर रखी काम्पेक्ट डिस्क को हटाया. कुछ किताबों को अपने लेपटोप केस में डाला. पांव जूतों में डाल कर तस्मे कस लिए. बाहें ऊपर से नीचे करके दो दो बटन बंद किये. आराम कुर्सी से उठ कर ऑफिस चेयर पर बैठ गया. कुछ देर बाद उठा और रिसेप्शन के पास आकर खड़ा हो गया. बाहर नीले आसमान से आग बरस रही थी. इक्का दुक्का बादल किसी उधेड़बुन में इधर उधर हो रहे थे. नीम के नीचे बैठा द्वारपाल किसी आगुन्तुक से बतिया रहा था.

मैं खड़ा नहीं रह सका तो टहलने लगा. अंदर वातानुकूलन संयंत्र से शीतलता बरस रही और बाहर बेचैन कर देने वाली उमस. मैंने एक्वेरियम में मछलियों को देखा वे तैर रही थी. उन्हें भी मेरी तरह कहीं नहीं पहुंचना था. मेरा चार बार तबादला हुआ और मैं फिर से इसी क़स्बे में लौट आया यानि अपने एक्वेरियम में. मेरे जैसे और भी लोग हैं मैं उनसे टकराता हूँ एक आवश्यक तरीके का अभिवादन या क्षमा व्यक्त कर के आगे बढ़ जाता हूँ फिर से घूम कर टकराने के लिए.

बाहर सफ़ेद रंग की लम्बी कार रुकी शायद असेंट होगी. पिछले दरवाजे से सर पर लाल चुन्नी डाले और उसी चुन्नी से एक नन्हीं बची को ढके हुए वह बाहर आई. सफ़ेद कुरता, डेनिम जींस और बैंगनी रंग का जूट का बैग लिए हुए. ऑफिस के मुख्यद्वार में प्रवेश करते ही मैं उसकी ओर बढ़ा. दो कदम चलते हुए हम एक दूसरे के सामने थे. कैसी हैं आप ? फाइन...

ये ? मेरी बेटी है. बहुत सुंदर है... थैंक्स. क्या नाम है ? विदा... विदा ?
हमने एक दूसरे से सवाल दोहराए और उनके वही के वही उत्तर दिये. जैसे सब दिया करते हैं. जया कैसी है ? एकदम मस्त. मैंने पूछा, सुरेन्द्र ? वह चुप हो गई... तो मैं भी चुप. लो मैं आपके लिए सोफ्ट ड्रिंक लाई कि आपने कहा था जंगल में रहता हूँ जबकि ये तो शहर है. उसने तीन ग्लास में खुद सर्व किया. बिटिया चुप थी मगर अपनी उत्सुकता को दबाये हुए थी. उसे बहुत सिखाया गया होगा कि किस तरह पेश आना है.

भीतर नमी अधिक थी. ग्लास के आस पास पानी की बूंदें तैर रही थी. वे सरक कर नीचे आई तो उसने टिश्यू पेपर निकाला. अचानक मेरे मुंह से निकला. रहने दो यार... उसने एक नज़र देखा और सच में रहने ही दिया. पानी ग्लास के चारों और घेरा बनाने लगा. वह फ़ैल जाना चाहता था.
क्या चल रहा है ?
कुछ खास नहीं. उसी कंपनी में ला कंसल्टेंट हूँ इन दिनों कानून एवं मिडिया से जुड़े विषय पर शोध कर रही हूँ. कितना हुआ ? बस समय ही हुआ है काम नहीं... पांच सौ किलो मीटर से हाई कोर्ट तक आई और यहाँ काम भी था, फिर फिर आप भी थे. मैंने उसका आभार व्यक्त किया. मैं उसको देख कर खुश था. ऐसे ही कभी मैं, रज़िया और वह यूनिवर्सिटी की सड़कों के किनारे लगे पेड़ों की छाया तले बैठा करते थे. रज़िया आज कल नवोदय विद्यालय में प्रिंसिपल है. पोस्टिंग कहाँ है पता नहीं ? हाँ उसे मैंने ऑरकुट और फेसबुक पर खोजा पर 'तेरी तस्वीर से नहीं मिलती किसी की सूरत' वाला हाल बना रहा.

विदा के लिए मेरे ऑफिस में कुछ नहीं था मगर उसने ढूंढ लिया. वह काम्पेक्ट डिस्क से घर बनाने लगी.
कभी दिल्ली आते हो ? मैंने कहा नहीं. कभी आना होगा ? पता नहीं. इसके बाद उसने मेरे भाईयों, उनके बच्चों और कुछ पुराने दोस्तों के बारे में पूछा. यही मैंने भी पूछा तो बोली मैंने घर बना लिया है... खूबसूरत घर. उसमें एक मशीन भी जो मेरे आने जाने के मिनटवार ब्योरे दर्ज करती है. मेरे लिए पोस्ट पेड फोन और आउट गोईंग काल्स के नंबर वाले सब नाम याद रखना जरूरी है... सेलेरी हेड की डीटेल्स को हर महीने डिस्कस करने से भी घर मजबूत होता है. बस ऐसे चल रहा है.

सुरेन्द्र ? मैं आश्चर्य से पूछता हूँ.
वह शांत बने हुए कहती है, जाने दो...
शराब पीता है क्या ?
नहीं

वह बेस्ट स्कालर थी. उसने अपनी पसंद से एक प्रतिभावान लड़के से शादी की थी. मुझ पर हंसती थी... बेचारी जया... वह पहले भी कम ही रुका करती थी कल भी पंद्रह मिनट बाद उठते हुए बोली मेरी माँ और बहन मेरे साथ है. वे नक्काशीदार फर्नीचर देख रही हैं. बहन ने नया घर बनाया है. उसके आर्मी ऑफिसर पति को यहीं का फर्नीचर चाहिए था.

चलते हुए...
मैंने विदा से पूछा कि क्या आपको हग कर सकता हूं ? उसने अपनी मम्मा की तरफ देखा. वह मुस्कुरा रही थी. मैंने उसे गोदी में उठाया और बाहर कार तक छोड़ा. वे चले गए, मैं घर गया. शाम को जया ने आवाज़ लगाई फर्स्टफ्लोर के खिड़की दरवाजे बंद करके आओ काली आंधी रही है.

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…