September 22, 2010

आओ शिनचैन लड़कियों के शिकार पर चलें

[3]
मैंने दादा के घर के बाहर फैली खुली साफ़ सुथरी रेत पर पहली बार एक गुबरैले को देखा था. तब मेरी उम्र पांच सात साल रही होगी. वह मेरे लिए विस्मय का कारक था. खुद उल्टा चलता हुआ गोबर की एक गेंद को लुढ़काता हुआ चला जा रहा था. विस्मय व्यक्ति के सुख और दुखों की तात्कालिक अनुभूति होती है. इसी से सारे रसों का बेहतर स्वाद मिलता है. किसी की सुन्दरता को देख कर जब मैं विस्मित होता हूँ तो मुझे श्रृंगार रस के तत्व याद आते हैं. इक्यानवे-बानवे के दिनों में एक सुंदर सी दिखने वाली लड़की से मिलने की तमन्ना मचलती रहती थी. आख़िरकार हम मिले और मैं विस्मित था. इस पहली मुलाकात का हासिल सिर्फ उदासी थी. इससे उबरने के लिए कई और मुलाकातें जरुरी थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मेरा विस्मय निर्जीव होकर ठहर गया. बरसों सोचे गए दृश्यों के उलट तस्वीर देखना भी विस्मित करता है.

बेटे से अविश्वसनीय घटनाक्रम वाली कहानी सुन कर मैं खो गया था. मुझे एकाएक गंभीर अफ़सोस हुआ कि इसके विस्मय को छल लिया गया है. अमेरिकी कार्टून करेक्टरों में नए विस्मयबोध की लालसा में निरंतर रचे गए अतिरंजित हादसों और उनसे उबरने के तरीकों को देख कर मेरे बेटे में स्वभाविक आनंददायी घटनाओं के प्रति रूचि नहीं बची है. आशा के लिए निराशा को रचना एक बाध्यता है. इसी बाध्यता ने कई काल्पनिक शैतानी दुनिया रची और एलियंस को चित्रित किया और उन पर जीत के लिए सुपरमैन को रचा. हम सुपरमैन से ऊब गए तो बैटमैन, शेडोमैन, हीमैन, होलोमैन, स्पाइडरमैन जैसे असंख्य चरित्रों के निर्माण को बाध्य हुए. व्यक्ति एक रहस्यमयी शक्ति चाहता है ताकि वह रोजमर्रा के जीवन में एक अद्भुत रोमांच को तलाश सके. इन्हीं काल्पनिक विराट व्यक्तित्वों की छाया में हमारे आधारभूत सुख और दुःख अनचीन्हे रह जाते हैं और उनेक आगमन के समय हमें विस्मय नहीं होता. तब कोई काल्पनिक चरित्र काम नहीं करता.

दूरदर्शन पर नब्बे के दशक में ऐसा ही एक भारतीय पात्र भी बच्चों के मुख्य आकर्षण का केंद्र था. देश भर में उसे देख कर बच्चों ने अपने घरों की छतों से छलांगे लगा दी थी. मैं जिस स्कूल में पढ़ा करता था, उसके सामने तापड़िया सर का घर था. उनका बेटा भी कथित रूप से इसी धारावाहिक को देखने के बाद अपने पांवों पर बारदाना बाँध कर दो मंजिल से कूद गया था. यह एक सम्मोहन है. अद्वितीय और अलौकिक शक्तियों को प्राप्त करने की आदिम चाह का आधुनिक रूप है. गंभीर किस्म का अफ़सोस ये है कि इसका लक्षित वर्ग बेहद कोमल और कच्चा है.

एक दिन मैंने बेटे से कहा. चलो, अपन दोनों शिनचैन और उसके पापा की तरह लड़कियों के शिकार पर चलते हैं. वह मुस्कुराया नहीं उसकी मुद्रा बेहद गंभीर हो गयी कि मैंने गलत प्रस्ताव दिया है. इस उम्र में उसने इस तरह के कार्यक्रमों के प्रयोजन जान लिए हैं. उसने मेरी इस हरकत पर मुझे एक वरिष्ठ नागरिक की तरह समझाया. सच में आठ दस साल के बच्चों के लिए रचे गए ये जापानी चरित्र उनका सहज बचपन छीनते जा रहे हैं. शिनचैन अपने पापा से कहता है "ओ हो मैंने सोचा आप मेरे साथ कबड्डी खेलोगे मगर आप तो सिर्फ मम्मा के साथ खेलते हो..." इतना कहते ही उसके गालों पर खिलते सूरज जितनी लाली का स्केच बन जाता है.

मुझे आज के दिनों की तुलना अपने बचपन से नहीं करनी चाहिए. समय के आरोहण ने हमें अलग मक़ाम पर लाकर खड़ा कर दिया है लेकिन जो नुकसान हो रहा है वह द्रुतगामी है और संवेदनशील है. मैं बाइक पर पीछे बैठे बेटे से पूछता हूँ, छोटे सरकार कभी खेत में हरे सिट्टों को छू कर देखा है ? वह प्रतिप्रश्न करता है, कैसा लगेगा ? मैं चुप कि एक अपराधबोध भीतर कुनमुनाता है. बच्चों को दिये गए लम्बे भाषण याद आते हैं. ये नहीं करना, वो नहीं करना मगर करना क्या ? इसका हमको भी नहीं पता... ऐसे ही सोच भागी चली जा रही थी और दूर तक काले - पीले सिट्टों से झूमते हुए खेत हमारे साथ भाग रहे थे.

उसकी आमद का ख़याल

शाम और रात के बीच एक छोटा सा समय आता है। उस समय एक अविश्वसनीय चुप्पी होती है। मुझे कई बार लगता है कि मालखाने के दो पहरेदार अपनी ड्यूटी क...