शोक का पुल और तालाब की पाल पर बैठे, विसर्जित गणेश

[4] ये हमारी यात्रा की समापन कड़ी है.

सड़क एक पुल में बदल गई है. यह पुल चार साल पहले आई एक नदी की स्मृति है और सैंकड़ों परिवारों का शोकगीत है. इसे आश्चर्य कहते हैं कि रेगिस्तान में सौ साल में एक बार नदी बहती है. यह आश्चर्य शीघ्र ही दुःख में तब्दील हो जाता है. जब भी यहाँ से गुजरता हूँ तो वही दिन याद आते हैं, रेगिस्तान में बाढ़ के दिन... हम एक हेल्प लाइन प्रोग्रेम कर रहे थे. जिले के आला अधिकारियों और बाढ़ में फंसे हुए लोगों को मोबाइल और रेडियो के जरिये जोड़े हुए थे. लगान फिल्म का भजन बज रहा था कि मेरा फोन चमकने लगा. ये मेरा निजी नंबर था मगर बेसिक फोन्स के ठप हो जाने के कारण इसे ऑन एयर कर दिया गया था. एक श्रोता का फोन था. उसने कहा "मेरे सामने सौ फीट दूर हमारे पड़ोसी का पक्का घर है, उस पर पांच लोग बैठे हैं और वे डूबने वाले हैं... वे नहीं बचेंगे और हम भी कुछ नहीं कर सकते." मैं उनके फोन को कंट्रोल रूम में ट्रांसफर करता हुआ रेडियो पर सहायता दल को लोकेशन के बारे में बताता हूँ. तभी उधर से आवाज़ आती है "वे डूब गए... " मैं ऑन एयर चल रहे फोन का फेडर डाउन कर देता हूँ.

असहाय, हताश और चिंतित उस श्रोता को फोन लगाता हूँ और खैरियत पूछता हूँ. वह कहता है, हम अभी बचे हुए हैं. रेत का पचास फीट ऊँचा धोरा बह गया है और पानी आया तो शायद हम भी मुश्किल में हों. कंट्रोल रूम से फोन आता है कि आपने लोकेशन सही बताई है ? मैं कहता हूँ कि हाँ... उधर से दबी हुई आवाज़ आती है हमारे ऐ डी एम साहब ठीक इसी लोकेशन पर हैं और उनसे संपर्क टूट गया है. वे भी बह गए थे. एक बड़े पेड़ के सहारे से बचे. उन फोन काल्स को सुनना और प्रकृति के सामने बौना हो जाना घोर विवशता थी.

सड़कें टूट गई, बिजली गुल हो गई फोन सेवाएं ठप हो गई थी. एक मात्र नेटवर्क काम कर रहा था लेकिन मोबाइल की बेट्रियाँ जवाब देने लगी. रेगिस्तान की बाढ़ में दो सौ पच्चीस लोग लापता हो गए. वे शव यात्राओं के दिन थे, हर दिन... टेलीफोन के पुराने पोल्स पर जानवरों के शव तैरते हुए अटके थे. बचाव कर्मी डूब गए तो वायुसेना में मातम पसर गया. चार दिन बाद एक दुर्गंध फैलने लगी. महामारी की आशंका के बीच देश भर के बचाव और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के दल पहुँच गए थे. यूपीए की चेयरपर्सन ने देखा और अफ़सोस जताया. सच में ये पुल उन्हीं शोक के दिनों की स्मृति से बढ़ कर कुछ नहीं है.

पुल और मेरा पैतृक घर तीन किलोमीटर के फासले पर हैं. घर को याद करते ही दुखों के आवेग कम होने लगते हैं. हरे खेतों में तना हुआ लाल पीले रंग वाला शामियाना कितना सुंदर दिखता है. यहाँ एक विवाह का भोज है. मेरे बेटे को जीमण का बहुत कोड (चाव) है. वह इस तरह के समारोहों में डट कर खाता है और भोजन के स्वाद की कड़ी समीक्षा करता है. यहाँ आकर हम सुख से भर जाते हैं जैसे शहर की भीड़ में खो गए थे और फिर से ठिकाने लग गए हैं. ग्रामीण आत्मीयता को बहुराष्ट्रीय तेल कंपनी निगल चुकी है फिर भी अपनों के चेहरे देखना सुकून देता है. जाने क्यों मुझे यकीन है कि मैं यहीं पर अपना घर बनाऊंगा. इसी सोच में अपनी पत्नी को देखता हूँ. मारवाड़ी पहनावे में वह कितनी सुंदर दिखती है. पलक झपकते ही, वह घर के आँगन में पचरंगी ओढ़णों से बने रंगों के कोलाज में खो जाती है.

हम लौटते समय उतरलाई नाडी पर रुके. मैं चाहता था कि बेटा इसे करीब से देखे, इसके पानी को छुए. वह तालाब के पानी पर पत्थरों को तैराने की कोशिश करने लगा और मैं चबूतरे पर बैठा रहा कि हवा अच्छी लग रही थी. किनारे पर बहुत सी गणेश भगवान की मूर्तियाँ रखी थी. यहाँ पानी की कीमत है इसलिए गणेश पूजन के बाद विसर्जित की जाने वाली गणेश प्रतिमाओं को स्थानीय ग्रामीण तालाब में डालने के स्थान पर पाल पर रखवा लेते हैं. एयरफोर्स में नौकरी करने वाले मराठी परिवार इस रेगिस्तान में गणेश विसर्जन के लिए समंदर का किनारा नहीं पा सकते लेकिन फिर भी विसर्जन तो होना ही है ताकि भगवान अगले साल फिर से आये. भगवान हमेशा साथ रहें तो उनके आने का रोमांच नहीं रहता.

एक मूषक पर सवार गणेश प्रतिमा को देख कर बेटा पूछता है कि पापा ये चूहा इतना बड़ा क्यों है और भगवान इतने छोटे क्यों हैं ? मैं उसकी गहरी भूरी निश्छल आँखों में झांकते हुए कहता हूँ. बेटा, चूहे को भगवान ने बनाया है और भगवान को इंसान ने...

Popular posts from this blog

पतनशील पत्नियों के नोट्स

तुम्हारे सिवा कोई अपना नहीं है

एक लड़की की कहानी