September 20, 2010

हरे रंग के आईस क्यूब्स

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दक्षिण अफ्रीकी देश से आया कोयले का चूरा उड़ रहा है. हर सप्ताह कत्थई लाल रंग के बीस डिब्बों वाली एक रेल गाड़ी आकर उतरलाई स्टेशन पर रुकती है. दूर देश की खदानों का कोयला ट्रकों में लादा जाता है. काले रंग की गर्द रेलवे ट्रेक से होती हुई चारों और बरसने लगती है. ये कोयला हाल ही में रेगिस्तान में उग आये थर्मल बिजली कारखानों तक जाता है. दिन के दो बजने को है, जोधपुर जाने वाली पेसेंजर के निकलने का समय है. उन्नतीस रुपये में दो सौ दस किलोमीटर का सफ़र, डिब्बे भरे हुए और सफ़र से बंधी आशाएं सरपट भागती हुई.

उत्तरलाई स्टेशन से तीन सौ मीटर दूर एक नाडी है. रेल छूटती है और हम एक दिशा में चल रहे हैं. सोचता हूँ कि घर से बाहर आते ही मैं रूपांतरित होने लगता हूँ. पुराने सुख दुखों के बीच नए रंग की कोंपलें मन की धरती को फोड़ते हुए खिलने लगती है. अभी थोड़ी देर पहले पत्नी का इंतजार कर रहा था और सोच रहा था कि क्या वाकई हर व्यक्ति के लिए घर बनाना अनिवार्य है ? मेरे पास बहुत पैसे नहीं है कि घर बना सकूँ. हम दोनों ने सत्रह अट्ठारह साल उस घर के लिए दिये हैं जिसने हमें जीवन दिया है. इन सालों की कमाई से जो बचा वह बस थोड़ा सा प्यार है. मैं अभी तक उसके लिए घर नहीं बना सका, घर तो क्या ज़मीन का एक टुकड़ा भी नहीं खरीद सका जबकि ये उसकी बहुत बड़ी ख्वाहिश है. क्या वो इसके बावजूद भी उतना ही प्यार करती है ?

बेटा कहता है, पापा रेल से आगे निकलें. मैं पूछता हूँ कि क्यों ? वह कहता है मजा आएगा. इसका अभिप्राय हुआ कि किसी को पछाड़ कर आगे निकलने में मजा है. मेरे हाथों में बहुत से हाथ थे वे बारी बारी से मुझे पीछे छोड़ते हुए आगे निकल गए थे, उनको भी बहुत मजा आया होगा ? फिर मैं मन में सोचता हूँ कि सामने की नाडी तक अगर हम पहले पहुंचे तो जो सोचा है, वह हो जायेगा. रेल के पास सैंकड़ों पहिये हैं. इन पर सवार होकर कितने ही सुख सात समंदर पर चले गए हैं और मैं उससे होड़ करने चला हूँ. सड़क के किनारे जिप्सम खोद लिए जाने के कारण चौकड़ियाँ बनी हुई है. उनमे बरसात का पानी भरा है दूर से देखो तो लगता है कि फ्रीज़र में बर्फ जमाने के लिए हरे रंग के पानी की विशाल आईस ट्रे रखी है. सर्दियों तक ये पानी बचा रहा तो हरे रंग के आईस क्यूब्स कितने सुन्दर दिखेंगे.

रेल पास ही है. मैं नॅशनल हाईवे पर रफ़तार नहीं बढ़ाता हूँ कि मैं जबरन नहीं जीतना चाहता. रेल, परी लोक को जाती हुई सी है रंग बिरंगे ओढने खिड़कियों से बाहर थोड़ा सा उड़ते हुए. डिब्बों के दरवाजों पर बैठे हुए लड़के, हत्थियाँ पकड़े हुए नौजवान रेल के साथ उड़े जाते हैं. चौमासा है इसलिए हल्की उमस में बाहर से आती हवा उनके मन को ठंडा करती होगी. मुझे भी गर्मी नहीं लग रही. एक हाथ से बेटे को अपने पास सरकता हुआ कहता हूँ, ध्यान से बैठो. मेरे पापा भी सायकिल चलाते हुए रास्ते भर मुझे हाथ से छू कर टटोलते रहते थे. उनकी नज़र जरूर सामने होती थी लेकिन मन शायद सायकिल के करियर पर ही अटका रहता था. हर आदमी के पास एक सुखों की पोटली होती है. जिसे वह उम्र भर ढ़ोने का साहस रखता है.

अब तक उसे जिप्सम हाल्ट तक पहुँच जाना चाहिए था लेकिन नहीं, रेल पीछे छूट गई थी. नाडी के बाहर बबूल के नीचे बैठे देवताओं के पास से एक जीप होर्न बजाते हुए निकली. छोटू उस रेल को ही देख रहा था लेकिन आश्चर्य कि उसे रेल को हरा देने में मजा नहीं आया. ये कुछ ऐसा ही था जैसे आसमां से बड़े, समन्दरों से अधिक गीले, व्योम से अधिक मटमैले रंग के प्रेम का कोमा में चले जाना. आप जानते हैं मटमैला प्रेम कैसा होता है ? मुझे भी नहीं पता.

हम चौदह किलोमीटर आ चुके थे. जिस घर में मेरे पिता जन्मे, जहाँ मुझे दादी ने गले लगाया, उस तक पहुँचने के लिए अभी भी और पंद्रह माइल स्टोंस पर बैठी चिड़ियाओं को उड़ाना शेष था.

उसकी आमद का ख़याल

शाम और रात के बीच एक छोटा सा समय आता है। उस समय एक अविश्वसनीय चुप्पी होती है। मुझे कई बार लगता है कि मालखाने के दो पहरेदार अपनी ड्यूटी क...