November 8, 2010

यही मौसम क्यूँ दरपेश है ?

मौसमों की कुंडली में सेंधमारी करके उन्हें तोड़ देने का हुनर अभी आया नहीं है. कुछ दिन बिना पिए रहे, कुछ सुबहों का मुंह देखा, कुछ शामें घर में बितायी, कुछ रातों को देर तक दीये जलाये और आखिर में रविवार को फिल्म देखने के लिए गए. इससे पहले मैंने साल दो हज़ार दो में गुजराती नाटक 'आंधलो पाटो' जैसी फिल्म आँखें देखी थी. वह फिल्म बैंक के एक मैनिक अधिकारी पर केन्द्रित थी. जो तीन अंधे लोगों को बैंक लूटने के लिए मजबूर करता है. इसे अंजाम तक पहुँचाने के लिए नायिका उन्हें दक्ष करती है. उसमे कई सारे शेड्स थे. उस फिल्म को देखे हुए आठ साल हो गए हैं.

आँखें फिल्म से पहले जनवरी सत्तानवे में जयपुर के एक सिनेमा हाल में 'सपने' फिल्म देखी थी. उस फिल्म में गायक एस. पी. बाला सुब्रह्मण्यम ने अभिनय किया था. काजोल पर फिल्माए गए गीत आवारा भंवरे के अलावा मुझे फिल्म से अधिक उस दिन की याद है कि वह बीता किस तरह था. जाने क्यों अँधेरे कमरों में बैठ कर गल्प और अनुभूतियों के तिलिस्मों को देखना कभी रास आया ही नहीं. कितनी ही खूबसूरत फ़िल्में आई. उनको क्रिटिक से लेकर आम दर्शक ने सराहा. मैं फिर भी जाने किस दुनिया में रहता हूँ. घर पर कभी हल्ला होने लगता है और कोई मुझे पूछता भी नहीं कि फिल्म देखने चलोगे ?

कल फिल्म देखने क्यों गया था ? कह नहीं सकता. पत्नी ने कहा आखिर आप हमारे करीब तो आये. ये उसकी शरारत थी क्योंकि मैं घर में सारे दिन उसी से चिपके रहने को बहाने ढूंढता रहता हूँ. सिनेमा हाल में दर्शकों का अजब शोर था. वे समवेत स्वर में चिल्ला रहे थे. फिल्म में एक ही जगह मुझे ऐश्वर्या में अपील लगी मगर उस समय दर्शकों की सीटियाँ बुझी रही तो मुझे लगा कि मेरे सेन्स बराबर नहीं है. फिल्म हमारी उसी पुरातन ख्वाहिश पर आधारित थी कि अगर चांस मिले तो हम जिंदगी को फिर से जीते हुए गलतियों को दुरस्त कर सकें. बकवास फिल्म थी. कितना अच्छा होता कि फिल्म के नायक - नायिका अपने बच्चों के जीवन में कुछ इस तरह अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप करते कि वे उन गलतियों को दोहराने से बच जाएँ.

फ़िल्में नहीं देखना एक फोबिया है और निरंतर फ़िल्में देखना किसी डिस-ऑर्डर का संकेत है. मैं अभी इस ओर हूँ. यानि इससे बच कर खुश रह सकता हूँ. उस ओर होना अधिक घातक होता क्योंकि ये शराब पीने जैसा काम है. आप निरंतर बढ़ता हुआ नशा खोजते हैं लेकिन फिल्म हो या कोई और माध्यम सबकी अपनी सीमायें हैं. हर काम एक दिन आपको सन्यास जैसी किसी अवधारणा की ओर प्रेरित करता है. काम का बोझ और विफलताएं अवसाद से भर देती है फिर हमें एकाएक किसी नए धर्म में आशा की किरणे दिखाई देने लगती है. कोई बनारस के घाटों पर मालाएं धारण कर रहा होता है, कोई मस्जिदों के आहातों में चुप बैठना पसंद करने लगता है तो कोई मोमबत्तियां जला कर प्रार्थनाएं करने में ख़ुशी खोजने लगता है. मुझे ऐसा करने में रूचि नहीं है क्योंकि ये भी एक क्रिया है और एक दिन इससे भी विरक्ति होना स्वभाविक है.

मैं जिस मौसम को बिखेर देना चाहता हूँ. वह अभी ठहरा हुआ ही है.

उसकी आमद का ख़याल

शाम और रात के बीच एक छोटा सा समय आता है। उस समय एक अविश्वसनीय चुप्पी होती है। मुझे कई बार लगता है कि मालखाने के दो पहरेदार अपनी ड्यूटी क...