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भूख आदमी को छत तक चढ़ा देती है

नाईजीरिया को लोग भुखमरी के सिवा और किसी कारण से जानते हैं या नहीं लेकिन मैं जानता हूँ कि वहां एक अद्भुत संस्कृति है योरुबा.. योरुबा लोगों का एक लोकगीत बरसों पहले पढ़ा था. उसे एक किताब के पीछे लिख लिया. मेरी किताबें अक्सर खो जाया करती है. खोने का एक मात्र कारण उसे मांग कर ले जाने वालों का लौट कर न आना है.

भाषाएँ दुनिया के किसी कोने में बोली जाती हों या उनका विकास हुआ हो मगर उनकी समझ हतप्रभ कर दिया करती है. मनुष्य के दैनंदिन जीवन के प्रसंग देवों को दी जाने वाली बलि से अधिक महत्वपूर्ण हुआ करते हैं. सामाजिक विकास की कामना और मुश्किलों के गीत कालजयी हो जाया करते हैं. मैं सोचता हूँ कि विद्वानों को और बहुत से अनुवाद करने चाहिए ताकि हम समझ सकें कि मनुष्य मात्र एक है. उसकी खुशियाँ और भय सर्वव्यापी है.

मनुष्य द्वारा किये गए प्रेम का अनगढ़ रूप जितना खूबसूरत लोकगीतों में दिखता और चीरता हुआ हमारे भीतर प्रवेश करता है ऐसा और कोई माध्यम नहीं है. लोकगीतों में हर स्त्री-पुरुष को अपना अक्स दिखाई दे सकता है. मनुष्य का प्रेम रसायन भाषाओं के विकास से पहले का है. इस तथ्य को लोकगीत चिन्हित करते हैं. मेरा रसायन शास्त्र उसी दिन फ़ैल हो गया था जब मैं चुप देखता रहा. जब मैं उसे लिखता रहा था कि तुम बहुत ख़ास हो मगर अफ़सोस कि तब किसी केटेलिस्ट ने काम नहीं किया .

बहुत साल बीत गए हैं और फासला बढ़ता जा रहा है. हम एसएमएस करते हैं. उतनी कीमत में बात हो सकती है लेकिन नहीं होती. समय की पगडण्डी हमें अलग रास्तों पर ले गयी है. इस सफ़र में तुमने बहुत से लोकगीत पढ़े सुने होंगे. आज इसको पढो हालाँकि यह भूख का गीत है. भूख, जिसने हर बार याद दिलाया कि दुनिया में बराबरी होनी चाहिए. यह प्रेम का गीत होता तो भी कुछ ऐसा ही बनता कि प्रेम के लिए आदमी शहतीरों पर उल्टा लटका रह सकता है ...

भूख
भूख आदमी को छत तक चढ़ा देती है
और वह शहतीर से लटका रहता है

जब भूखा नहीं होता मुसलमान, वह कहता है
हमें मना है वानर खाना
पर जब भूखा होता है इब्राहिम
तब खा लेता है बन्दर.

भूख जब सताती है स्त्री को हरम में
वह दिन में ही सडकों पर निकल आती है
भूख पुजारी को उकसाएगी
वह अपने ही देवस्थान में करेगा चोरी.

जब मृत्यु बंद करती है द्वार
भूख खोल देती है उन्हें....
भूख के लिए बेमतलब है ये
कि "मैंने कल ही तो पेट भरा था. "

मेरा डिनर अभी शेष है. मुझे खाने में काफी पोष्टिक चीजें मिलेगी. मेरी भार्या अपने परिवार की बेल के पोषण को प्रतिबद्ध है. वह सुबह पांच बजे जागती है और रात ग्यारह बजे तक सोती है मगर आज उसको मैंने निवेदन किया है कि वह मेरे बगैर खाना खा ले. मैं इस समय एक सस्ते दर्जे कि ज़िन पी रहा हूँ और सोचता हूँ कि अभी शुभरात्रि कह दूं तो कोई हर्जा नहीं होगा शायद...

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

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* * *
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