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बस यही माल मुसाफिर का है...

तुम्हारी अँगुलियों में ये खुशबू कैसी है ?

रात एक ख़ुशबाश ख़्वाब को बिना सिलवटों के समेटते हुए नीद आ गई थी. कॉफ़ी के खाली कासे को खुली खिड़की में रखने के बाद सुबह की आँख खुली तो सामने घूमेश्वर महादेव मुस्कुरा रहे थे. इस मुस्कराहट के ऊपर एक बड़ा पीपल खिला हुआ था जिसकी एक बाँह डिवाइडर के उस पार तक जाती थी. फूल वाला भी पीपल की छाँव का बराबर का हिस्सेदार था. सुबह की धूप में फूलों को पिरोता हुआ बिजली के ट्रांसफार्मर के नीचे रखी टोकरियाँ संभालता जाता. उसकी ज़िन्दगी का ख़याल पीठ में बैठे महादेव रखते हैं. हल्के हरे रंग के सेल्फ प्रिंटेड सलवार कुरते में आई अधेड़ महिला मंदिर में विराजमान महादेव के लिए घंटी बजाती है. मैंने सोचा अब वह झुक कर नंदी के कान में अपनी अर्जी रख देगी लेकिन उसने हाथ जोड़े और विनम्र भाव से मुड़ गई. उसके मोजों का रंग मेरी ट्राउज़र से मिलता था.

मौसम में नमी थी. पीपल के पत्तों के बीच से आते धूप के टुकड़े मेरी आँखों पर गिरते और मैं ख़यालों से लौट आता. घूमेश्वर महादेव के पार चौराहे पर आधुनिक शिल्प की प्रतिनिधि जोधपुरी लाल पत्थर की मूरत खड़ी है. दो लम्बी पत्तियां एक दूसरे से सर्पिल ढंग से लिपटी हुई है. उनके बीच के गोल हिस्से किसी जिनोम कोड से दिखते हैं. सम्भव है कि ये प्रेम का प्रतीक है या हो सकता है कि बरसों के बिछोह के बाद का आलिंगन या फिर शोधकर्ताओं को खुदाई में मिले आलिंगनबद्ध दो मनुष्य कंकालों की स्मृति. चाय वाला मेरी ओर अर्ध प्रश्नवाचक सा था किन्तु मैं अपने काले जूतों पर जम आई गर्द पर अटका हुआ था.

कांच के भद्र दरवाज़ों के पार सीढ़ियों के ऊपर गोल टेबलें रखी थी. रंगों के कोलाज वाला कुरता पहने हुए खुले बालों में लड़की बैठी थी. हैरत से भरी नम आँखों को संभालती हुई. ज़रा सा हाथ को आगे किया तो सामने बैठे लड़के ने थाम लिया. मैं अपनी नज़रें कहीं और रखता हूँ मगर वे लौट कर उसी ओर मुड़ जाती है. लड़की गालों को छू रहे बालों को दाहिने हाथ से कान के पीछे करती है लेकिन वे फिर से हर बार उसके गालों को चूमने लगते हैं. इस बार देखा तो पाया कि लड़का कुछ कह रहा है शायद उसने कहा मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ. लड़की अपनी अँगुलियों में खेलती हुई कुछ और अँगुलियों को देखती है. वह पोरों की नर्म नाजुक रेखाओं को डिकोड कर लेना चाहती है.

ब्लेक चोकलेट पेस्ट्री के बाद की कॉफ़ी पीते हुए पास से गुजरी किसी गाड़ी के शीशे से आई चमक टेबल पर क्षणभर बिखर कर चली गई. मुझे फूलवाले की अँगुलियों का ख़याल आया. शाम होने बाद उसकी प्रेयसी कभी खुशबू भरी उन अंगुलियों को चूमती होगी तो क्या सोचती होगी ? क्या फूल वाला उसके बदन को अपने हाथों में उन्हीं नाजुक फूलों की तरह सम्भालता होगा ? कांच का दरवाज़ा खुला और वे बाहर निकल रहे थे.

सड़क पर दुआ देती भिखारिन से लड़का हँसते हुए कहता है, दुआ करो कि हमारी जोड़ी बनी रहे. लड़की उसकी कोहनी को छूती हुई मुस्कुराती है. सोचता हूँ कि घर जाते ही लड़का शहर में भीड़ बहुत है कहता हुआ सोफे में धंस जायेगा, लड़की उड़ती हुई धूल को कोसती हुई अपनी आँखें पौंछेगी. ऐसी मुलाकातों के बाद ऊदी घटाओं का मौसम घेर लेता है. एकांत में आँखें मूँद किये गए बोसों की याद रुलाती रहती है. फूलवाले के पास से गुजरते हुए, मैं एक लम्बी सांस लेता हूँ. घूमेश्वर महादेव निर्विकार बैठे हैं. संजय को फोन करने के लिए सेल को कान के पास रखते ही चौंक जाता हूँ कि मेरी अँगुलियों में ये खुशबू कैसी है ?

अँगुलियों में बची हुई जो खुशबू है, बस यही माल मुसाफिर का है !

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

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* * *
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प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…