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कुछ ख़त जेब से गिर जाते हैं

तुम्हारी भाषा को संवारने की जरुरत है.

छोटी चेरी जैसे नाक वाली सुंदर लड़की, मैं तुम्हे सबसे प्रिय लगने वाले नाम से पुकारना चाहता हूँ. लेकिन बरसों से मेरी भाषा में ऐसे शब्दों ने स्थान बना लिया है जो सिर्फ देश, काल और घटनाओं के सूचक मात्र हैं. इनमें सिर्फ ठण्ड है. ऐसे में संवाद करते समय मेरे अवचेतन की भाषा मुझे उसी रास्ते हांक कर ले जाती है. सम्भव है कि गहरे प्रेम के शब्द खो गए हैं और मैं स्थूल प्रकृति वाले शब्दों से ही काम चलाता रहा हूँ. इसी तरह मेरी भाषा निर्जीव होती चली गई है. लड़कियाँ अपनी बाँहों से परे धकलते हुए गालियां देंगी, इसलिए उनसे छुप गया. दुकानदार मुझे शराबी न समझे इसलिए मैं ऑफिस के ड्राईवर से ही आर सी मंगाता रहा हूँ. ऐसे कई फोबियाओं से घिरे होने ने मुझे नए शब्दों से वंचित रखा है.

मुझ में अधैर्य भरा है. खुद को धूसर रंग की ठहरी हुई चीजों से घिरा हुआ पाता हूँ. प्रकृति की जिस सुंदर तस्वीर से तुम बात करना चाहती हो, जिस नीले आसमान की तुम महबूबा हो, दरियाओं के जो गीले किनारे तुम्हारे दिल के कोनों से टकराते हैं, पंछियों का कलरव या बारिश की धुन या फिर तुम्हारे बालों को छू कर गुजरे हुए हवा के झोंके जैसे अहसास के लिए सबकी ज़िन्दगी में स्पेस नहीं होता है. मैं उन दीवारों को देखते हुए आँख खोलता हूँ. जिन पर आसमान सा ही रंग पुता हुआ है. लेकिन वह रंग खिड़की से दिखते उस छोटे टुकड़े से मेल नहीं खाता, जो दूर चमकता रहता है.

बरसों से स्वनिर्मित यातना गृह के रोशनदानों से आते हुए रौशनी के छल्ले देखते हुए कभी चौंकता नहीं हूँ. बस उठता हूँ कि सूरज चढ़ आया है. मैं बाहर नहीं जाता हूँ. अपनी कहानियों के जरिये बाहर को अपने भीतर लाता हूँ. इस तरह नुकसान की भरपाई करने की कोशिशों में लगा रहता हूँ. मेरी कविताओं में सिर्फ उदासी है. वे उन स्मृतियों के टुकड़े हैं, जो मैंने कभी जीये ही नहीं. उन कविताओं की प्रोपर्टी को देखना कि मैं अपने भीतर कितनी कम और उदास चीजें जमा कर के बैठा हूँ. उनमें शाम, रेत, हवा, किसी लड़की का ख़याल, चांद और शराब के सिवा कुछ नहीं है. ये वास्तव में अंधरे की आरज़ू है. जो तुम्हारी बाँहों में होने के विचार का प्रतिबिम्ब है.

मैं अच्छे और महान लेखकों की तरह नहीं सोच पाता हूँ. मेरे मस्तिष्क में इनसे बेहतर सवाल नहीं आते हैं कि क्या तुम्हारी बाहें हरी और सुवासित है ? क्या उनकी छुअन से उपजे अहसास का संचरण कठोर आवरण में कैद बीज के अंदर तक जाता है ? क्या वे सदानीरा नदी की तरह गीली हैं और उनमें गुदगुदी मछलियों के स्पर्श सी तैरती है ? मुझे इन सवालों के उत्तर नहीं मालूम है. ये क्या जरुरी है कि जैसा हम सोचते हैं, वह कुछ होता होगा. सम्भव है कि यह सब एक घना निर्वात है. जिसका अंदर और बाहर अलग नहीं किया जा सकता. मैं इसी विचार में अपनी शाम को बुझा देता हूँ.

मैं लेखन को व्यवसाय अथवा प्रतिष्ठा के तौर पर नहीं अपनाना चाहता हूँ. मैं पढना भी नहीं चाहता हूँ कि सामन्यतया पुस्तकें मुझमें आकर्षण नहीं जगाती हैं. वे ब्योरों से भरी होती हैं. उनमें दहकते हुए बोसे नहीं होते बस उनका हल्का फुल्का विवरण हुआ करता है. वे पुस्तकें नाकारा हैं, इंसानों के बारे में कुछ नहीं बता पाती हैं. यहाँ तक कि पालतुओं की थूथन की नमी के बारे में लिखते समय स्नेहभरी आँखों और बांहों में आ जाने को खुजा रहे पंजों को भूल जाती है. तुम बहुत सुंदर लिखती हो इसलिए समझ सको कि मुझे अपनी भाषा को संवारने के लिए ऐसी पुस्तक की जरुरत है. जो तुम्हारे रोम-रोम के पुलकित और फिर निस्तेज हो जाने के बारे में लिखी हो.

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
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मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…