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जबकि ऐसी कोई वजह नहीं...



इन सुस्ताई हुई रातों की भोर के पहले पहर में आने वाले ख्वाबों में बच्चों की सेहत और एक उपन्यास जितना लम्बा अफ़साना लिखने के दृश्य होने चाहिए थे. लेकिन आज सुबह बदन में ठण्ड की ज़रा झुरझुरी हुई तब देखा कि एक मुसाफ़िर बाहर वाले कमरे में अपना सामान खोल रहा था. रात घिर आई थी. मुझे किसी सफ़र पर जाना था और चीज़ें सब बिगड़ी हुई थी. ग्यारह दस पर छूटने वाली गाड़ी का कोई मुसाफ़िर मुझे फोन पर पूछता है कि क्या सामने वाली बर्थ आपकी है? सपने की नासमझी पर अफ़सोस हुआ कि किसी मुसाफ़िर को मेरा फोन नम्बर कैसे मालूम हो सकता है.

एक पेढी पर से फांदता हुआ अपने थैले के पास आ जाता हूँ. बोध होता है कि मेरे बैग में बेकार पुराने कपड़े भरे हैं. मैं उनको बाहर कर देने के लिए उसको देखता हूँ. लेकिन उसमें पिछली सर्दियों में लिए गये दो नए स्वेटर खाकी रंग के कागज के लिफाफे में रखे हैं. ये जरुर जया ने किया होगा, ऐसा सोचते हुए भाई की आवाज़ सुनता हूँ. वह मुझे लगातार होती जा रही देरी में भी ट्रेन तक पहुंचा देने के लिए चिंतित है. मेरा टिकट खो गया है. वह सब दराजों और बैग के खानों में तलाश लिए जाने के बावजूद नहीं मिलता. मैं अपने कमीज की जेब से कुछ कागज निकालता हूँ तो मेरा हाथ किसी बनिए की तरह कागजों से भर जाता हैं. ये सब पर्चियां किसी हिसाब की हैं और मुझसे संभल नहीं रही. इनमें खोजने के चक्कर में भय बढ़ता जा रहा है कि गाड़ी निकल जाएगी.

अचानक दूर पिताजी दिखाई दे जाते हैं. मद्धम कदमों से मेरे पास आते हैं. उनका कद मेरे से ऊँचा है. मेरे माथे पर चूमते हैं. इस 'फोरहैड किस' के दौरान सोचता हूँ कि वे बहुत उदास होंगे. जैसे ही मैं अपना सर ऊपर की ओर उठाता हूँ तो पाता हूँ कि उनका मुख प्रसन्नता से भरा है. वे एक ओजपूर्ण निर्मलता से भरे हैं और सौम्य चहरे पर देवीय मुस्कान है. मैं अचरज से भर जाता हूँ कि वे किस बात के लिए आनंद में हैं. अचानक याद आता है कि मैं उनको कब का खो चुका हूँ. कई बरस हुए...  आख़िरी बार मैंने उनको पीले वस्त्रों में हलके उजले रंग में पालथी की मुद्रा में बैठे हुए देखा था.

रेल एक नए ट्रेक से गुजर रही है. स्कूल के दिनों में भाप के इंजन की दिशा बदलने के लिए बनी हुई घूम चक्कर वाली पटरी पर अब नयी पटरी बन गयी है. गाड़ी बहुत धीरे रेंग रही है. कच्ची बस्ती के घरों के बीच से होती हुई अपना रास्ता बना रही है. मैं समझ नहीं पाता हूँ कि क्या सही गाड़ी में आ गया हूँ या फिर इस गाड़ी के सहारे उस गाड़ी तक पहुँच जाऊँगा. दुविधाओं की गिरहों में घिरा हुआ पाता हूँ कि मेरी धमनियां सिकुड़ती जा रही है. रक्त प्रवाह पर किसी अजगर ने कुंडली मार ली है. रात के अँधेरे में सफ़र जारी है. सोचता हूँ कि वह क्या है, जो आने वाला है... ये किस सफ़र की गाड़ी है?

* * *

उसकी सुवासित भुजाओं के बीच अपने होठों को रखते हुए मैंने कहा कि रात बीत गयी है और जीवन जीने का युद्ध अपने चरम पर साबित हुआ है, एक धोखा... बेमौसम हवा में उड़ती आती थी हल्दी वाली क्रीम की गंध, जबकि वे दिन खो गये हैं, चाँद सितारों से परे धूसर अँधेरे में.

* * *
मगर अब भी मैं सोच रहा हूँ कि अनार के नीचे बिखरे फूलों को कोई लड़की चुन लेगी, एक दिन.

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…