Skip to main content

शाम के टुकड़े


कभी कभी कोई इंतज़ार नहीं होता. चेहरों से उतर जाती है पहचान, स्मृतियाँ कायम नहीं रह पाती. सिटी कोतवाली से कुछ आगे ऊपर की ओर जाती संकड़ी पेचदार गलियों के किनारों को कुछ अधिक काट कर बनाया गया रास्ता ज़रा बायीं तरफ मुड कर ख़त्म होता सा दीखता है. वहीं पर बड़ी हवेली की गोद में राज के कारिंदों के लिए मकान बने हुए हैं. पीछे पहाड़ी का हिस्सा है और सामने नीचे की ओर सर्पिल रास्ते घाटी में खो जाते हैं. इन रास्तों के किनारे बेढब सिलसिले से मकान बुने हुए हैं.

हर शाम घरों के चौक में रखी सिगड़ी से उठता धुंआ पत्थरों की दीवार को चूमता रहता है. इच्छाओं की अनगढ़ सफ़ेद लकीर हवेली की छत तक जाते हुए जाने क्या सोचती हुई, मुड़ मुड़ कर देखती रहती है. सुबह सूरज सिर्फ किले के दरवाज़ों पर ही दस्तक देता. दोपहर की बिना धूप वाली गलियों में तम्बाकू बाज़ार से तीन गली पहले पान वाले से मुनक्का खाते हुए बीता दिन, किसी विस्मृत शहर की तस्वीर सा याद आने लगता है.

ढलुवा पथरीली सड़कों पर आहिस्ता चढ़ते उतरते, याद के पायदानों पर बीते दिनों के पांव नहीं दिखते. एक कड़ा वर्तमान बाहं थामे रखता है. नीले घरों के आगे भांग के ठहाके लगाता, अधबुझी आँखों से नष्टोमोह का उद्घोष करता शहर. नीम अँधेरा उतरता, उससे थोडा पहले भरे बदन वाली कमसिन लड़की बाल्टी भर पानी से घर के आगे का चौक धोती और निवार से बुनी लोहे की चारपाई लाकर बिछा देती. ख़ुद दरवाज़े के पागोथियों पर बैठी शाम के छोटे टुकड़े करती. कुछ स्टील के भगोने में, कुछ गल्टी की परात में और कुछ को अपनी कमीज के जेबों में भर कर अन्दर चली जाती. 

शाम के जो टुकड़े पीछे छूट जाते थे. उनके लिए, उसकी माँ उसे कोसती. कभी कहती थी. "... ज़रा संभाल कर काट डूबते दिनों को, दुःख घने हैं और रास्ता बड़ा संकड़ा है." मगर लड़की पचास सीढ़ी नीचे उतरने के बाद दायीं तरफ के मोड़ पर मिलने वाले एक मुसलमानों के लड़के के बारे में सोच रही होती थी. गाढ़ा कत्थई रंग उसको अपनी बाहों में भरता जाता. वह लम्बी सांसे लेती हुई अंगूठे और तर्जनी से पकड़ कर ढ़क्कन को पतीले से उतार ही लेती. माँ फिर कोसती हुई दरवाज़े से बाहर झांकने लगती मगर दूर तक कुछ दिखाई नहीं देता था. बड़े नीले रुमाल वाला लड़का सिर्फ़ उस लम्बी चोटी वाली लड़की को ही दीखता था.

"आह, हट जाओ" यह कहते हुए लड़की ने उसके बारे में बताया कि लड़के के खुशबूदार हाथों से बनी सलवटों को उसने लोहे के बक्से के पीछे छिपा रखा है. रात गए अपने कमीज को सूँघा करती है. उसने फिर से दो तीन बार लरज़िश भरी फुसफुसाहट में मेरा नाम पुकार कर कहा. "हटो.." आवाज़ पास बुला रही थी. शब्द कहते थे, चले जाओ. "वह मेरा हर शाम चार बजे इंतजार करता है. कल भी आएगा. मैं जी न सकूंगी, उसके बिना." ऐसा कहते हुए उसने अंगुलियाँ मेरे बालों में डाले रखी. रात का अँधेरा गहरा था.

इसी घर में किसी दीवान के कारिंदे ने कूत से लौट कर आने में कुछ अधिक रातें लगा दी होंगी. फिर शराब के नशे कह दिया होगा कि फलां गाँव की औरतें छः हाथ से ऊंची होती है. उनके नाक तीखे होते हैं और बदन से नदियों के मोड़ लिपटे रहते हैं. शायद सदियों पुरानी इसी एक बात के लिए लड़कियां बेसलीका काटती होगी शाम के टुकड़े और रात को खोजती होगी बची हुई खुशबुओं वाला कोई पुराना पैरहन...

पहाड़ वहीँ खड़े हैं. गलियों के पेच कायम हैं. अधबुझी हसरतों की राख में कभी कभी चमकते हैं, कारिंदों के घर...

Popular posts from this blog

मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…