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कौन गुज़रा था अभी..



रात के बेहूदा ख्वाबों से बच कर सुबह आँख खुलने के बाद जी कहीं लगता ही नहीं. देखता हूँ कि ड्राफ्ट में बहुत सारे शब्दों का जमावड़ा हो गया है. कुछ भी तरतीब से नहीं, सब कुछ बेकार. हर बार यही सोच कर उठ जाता हूँ कि इसे डिस्कार्ड कर दिया जाये. कई बार हम खुद से कनेक्ट नहीं हो पाते हैं. अपना ही लिखा हुआ बेमानी लगता है. आखिर खुद को याद दिलाता हूँ कि ये मेरी अपनी ही डायरी है. इसमें दर्ज़ किया जा सकता है बेकार की बातों को भी... 

हम कितनी ही बार कर देते हैं
खुद की हत्या
और वह आत्महत्या नहीं कहलाती.
* * *

हम देखते हैं बालकनी में आकर
कि कौन गुज़रा था अभी गली से.

गली, जो सूनी है, बरसों से.
* * *

एक बच्चा सलेट पर लिखे हुए को मिटा कर 
फिर से शुरू करता है लिखना.

लोग आते जाते रहते हैं,चलती रहती है जिंदगी.
* * *

खबर थी मुझको
कि इस दौर में प्रचलित चीज़ है, धोखा
मगर यह पक्की खबर न निकली.

कि नायकों ने चुन लिया था
कुछ अजनबी औरतों को ख़ुद के लिए
और वे कभी साबित न हो सकी अजनबी.
* * *

दुनिया भर के भरम चुनते हुए
हमें लौट आना चाहिए हमारे खुद के पास.
* * *

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उसका नाम चेन्नमा था. उसके माता पिता ने उसे बसवी बना कर छोड़ दिया था. बसवी माने भगवान के नाम पर पुरुषों की सेवा के लिए जीवन का समर्पण. चेनम्मा के माता पिता जमींदार ब्राह्मण थे. सात-आठ साल पहले वह बीमार हो गयी तो उन्होंने अपने कुल देवता से आग्रह किया था कि वे इस अबोध बालिका को भला चंगा कर दें तो वे उसे बसवी बना देंगे. ऐसा ही हुआ. फिर उस कुलीन ब्राह्मण के घर जब कोई मेहमान आता तो उसकी सेवा करना बसवी का सौभाग्य होता. इससे ईश्वर प्रसन्न हो जाते थे.
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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
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मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।