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काश, इतना सा हो जाये



बिना बारिशों वाले रेगिस्तान में पेड़ों की पत्तियां काँटों में तब्दील हो जाती है और अपनी ही शाखाओं पर खरोंचें लगाती रहती है. ऐसा ही हाल शैतान का भी हो गया. उसने ख़ुद से पूछा कि तुम को राहत किस करवट आएगी. फ़ौरी तौर पर जो उपाय सूझे, उनको एक कागज पर लिख कर, दीवार पर टांग दिया. वक़्त गुज़रता रहा, अक्षर धुंधले होते गये, एक दो मौसमों ने आते जाते उन पर निगाह डाली लेकिन बदला कुछ नहीं फिर भी शैतान ने सुन रखा है कि दर्द भरे दिन आखिर विदा हो जाते हैं और मुहब्बत का कोई अंज़ाम नहीं होता.

काश कि उसने उठा ली होती
अपनी नज़रें, मेरी ज़िन्दगी की किताब से.

या फिर हुआ होता
एक अच्छा इरेजर,
मिटा लेते कोई चेहरा याद के हिसाब से.

होता कोई लोकल अनेस्थिसिया ईजाद
जो दर्द में देता आराम
जब मुसलसल हो रही हों,
उसे भुलाने की नाकाम, कोशिशें हज़ार.

काश सूरज कर लेता कुछ दिनों को वाइंड अप
और घर लौटते हुए हम, भूल जाते, उसका नाम.

या पड़े होते बियाबान में, तनहा पत्थर की तरह
या फिर हो जाते,
इतने मूढ़ कि समझ न सकते, बोले - सुने बिना.

कोई लुहार भी हुआ होता
जो जानता, काटना बेड़ियाँ अहसास की.

काश लिख सकते कि सब फ़ानी है,
काश सब रास्ते बनाये जा सकें फिर से

काश, वो हो जाये किसी खोयी हुई हवा का झोंका,
मैं अटक जाऊं कंटीली बाड़ में सूखे पत्ते की तरह.

काश, इतना सा हो जाये क्योंकि बेठिकाना, बेवजह आंसू ये रोना रात भर, है ज़िन्दगी तो इस ज़िन्दगी की मुझे गरज नहीं.
* * *

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

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मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

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* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
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