Skip to main content

कुछ शामें भूलने लायक नहीं होती

हर शाम ऐसी नहीं होती कि उसे भुलाया जा सके. उस दिन मौसम बेहतर था. वक़्त हुआ होगा कोई सात बजे का और गर्मी के दिन थे. शेख कम्प्यूटर्स के आगे दो कुर्सियों पर लड़कियां बैठी हुई थी. उन कुर्सियों पर अधपके कवि, कथाकार और नाट्यकर्मी मिल जाते थे. मैंने उनके साथ बेहतरीन शामें बितायी थी. हम यकीनन दुनिया की बेहतरी की बातें नहीं करते थे मगर मनुष्य के छोटे-मोटे, सुख- दुःख बातों का हिस्सा जरुर हुआ करते थे. 

उन दो लड़कियों के ठीक सामने की कुर्सी खींच कर बैठते हुए पाया कि आज दोस्तों की गैरहाजिरी है. वे दो लड़कियां छोटी और राज़ भरी बातें बाँट रही होंगी कि बातों के टुकड़े पकड़ कर मुस्कराने लगती और ऐसा लगता कि बात पूरी होने से पहले ही सुनने वाला समझ गया है. दोनों लड़कियों ने सलवार कुरते पहन रखे थे. उनके पांवों में स्पोर्ट्स शू थे. वे कुछ इस बेखयाली में बैठी थी कि उनको देखते हुए लगता था. अब छुई-मुई लड़कियां बीते दिनों की बात है. 

मैं उनसे बात करने लगा. वे एकदम सपाट ज़ुबां वाली थी. ऐसी लड़कियां आपको चौंका देती हैं. वे छोटे और सलीके वाले जवाब दे रही थी. थोड़ी ही देर बाद मालूम हुआ कि वे पुलिस में कांस्टेबल हैं. पडौस वाले रेडियो मेकेनिक के यहाँ अपना टू इन वन ठीक हो जाने का इंतज़ार कर रही थी. मैंने उनसे पूछा कि कितनी कठिन है आपकी नौकरी? जिस लड़की के बाल छोटे कटे हुए थे. उसने कहा "सर, ज़िन्दगी में आसान क्या होता है." मुझे लगा, मैं उससे कहूं कि औरत होने से आदमी होना आसान होता है. मगर मैं चुप रहा. 

एक लड़की अपने सेल फोन पर बात करने लगी. इस बातचीत में उसने किसी बेहूदा आदमी के लिए चार बार गाली दी. कुछ और लोगों की बखिया उधेड़ी. जो गाँव में उसके बारे में कुछ गलत बातें घरवालों को कहते होंगे. फिर उसने आखिर में कहा कि मैं इस बार गाँव आउंगी तब उसे देख लूंगी. उस वार्तालाप को सुनते हुए आप चौंक जाते कि रेगिस्तान के इस हिस्से में लड़कियां ऐसी तो न थी. मैंने स्कूल के दिनों में स्त्री विषयों पर बोलते हुए, अबला तेरी यही कहानी... को जाने कितनी ही बार दोहराया था क्योंकि डिबेट वाले सर ने यही सिखाया था. मगर उस शाम सामने कुर्सी पर न अबला थी ना उसकी वही कहानी थी. 

हम फिर बात करने लगे. गाँव कौनसा है, आपका? दोनों ने अपने गाँव के नाम बताये. इस मरुस्थल में सनावड़ा, हाथी का तला, डुगेरों का तला गाँव के स्कूल की लड़कियां हर साल विभिन्न खेलों में राजस्थान का प्रतिनिधित्व किया करती है. मैंने पूछा कभी खो खो खेला है. उनमें से एक लड़की मुस्कुराई. सर, नेशनल तक... और मुझे याद आने लगा कि मैं सनावड़ा सीनियर स्कूल की लड़कियों का आकाशवाणी के लिए इंटरव्यू कर रहा हूँ. वे शर्मीली लड़कियां राष्ट्रीय स्तर तक खेलने के बाद पूरी तरह बदल चुकी थी. दसवीं की एक लड़की से पूछा. बड़ी होकर क्या बनोगी? और वह कहती है, अध्यापक. स्कूल का सारा स्टाफ मुस्कुराने लगता है. उस मुस्कान को टेप पर दर्ज नहीं किया जा सकता था मगर वह दिल से कभी मिटाई भी नहीं जा सकती. 

मेरे सामने जो लड़कियाँ बैठी थी, उसके क़दमों के नीचे वैसी ही ज़मीन थी, जैसी मेरे क़दमों के तले थी. उनके पास दो मजबूत पांव थे. उसके पास हौसला था कि बेहतरी से जीवन जीने का सभी को समान रूप से हक़ है. हम फिर बातें करने लगे. वे लड़कियां अपने घरों की देख भाल कर रही थी. उन्होंने अपने छोटे भाइयों के लिए बेहतर शिक्षा के प्लान बना रखे थे. एक चाहती थी कि गाँव के बच्चों को भी सिविल सर्विस परीक्षा के बारे में मालूम होना चाहिए. 

मैंने कहा कि हमारा समाज लड़कियों को पसंद नहीं करता. एक हँसते हुए कहती है. इतना पसंद करते हैं कि पीछे घूमते हैं, लोग. हम थोड़ा मुस्कुराने के बाद फिर उसी बात पर आये कि लड़कियां अक्सर चिंता की तरह आती है. इतने में मेकेनिक ने आवाज़ दी. वे उठ कर चल दी. मैं शाम के नए रंग को देखता रहा. अचानक मेरी बेखयाली को उनमें से एक की आवाज़ ने तोड़ा. सर, हमारे गाँव में लड़कों से ज्यादा लड़कियां नौकरी करती है. वे मुझसे विदा लेने आई थी. एक शिकायत भी कर गयी "आपने फोन इन कार्यक्रम पेश करना क्यों बंद कर दिया? आप वैसे ही बोलते हैं जैसे आज आपने हम से बात की... सर, फिर से फोन इन करना, आपको सुनना अच्छा लगता है." 

वे लड़कियां किसी कॉन्वेंट या मिशनरी स्कूल में पढ़ कर प्रबंधन में स्नातक की डिग्री लिए हुए नहीं थी. उन्होंने दसवीं पास की, पचास नंबर की एक परीक्षा दी, तीन किलोमीटर की दौड़ लगायी और पन्द्रह फीट दूर तक गोला फैंक कर पुलिस में भर्ती हुई थी. उन्होंने मुझमे एक यकीन का बीज रख दिया. गाँव में बेटियों को बोझ नहीं समझा जाता मगर उनके साथ पेश आने वाली तकलीफों के कारण माएं सोचती है कि लड़का हो तो अच्छा. अब वक़्त बदल गया है. ढाणियों में बसे हुए लोग जानने लगे हैं कि बेटियों को पढ़ाया जाये तो वे ज्यादा मजबूत लाठी बनती हैं. कन्या भ्रूण हत्या, एक कुत्सित आपराधिक विचार है, यह हमारे गाँव का तो नहीं हैं... बेहतर है कि इसे "न्यात-बार" ही रखा जाये. सच कुछ शामें भूलने लायक नहीं होती. 
* * *

इस रेगिस्तान के एक गाँव की जाट खांप पंचायत ने हुक्म दे रखा है कि जो भी व्यक्ति बेटी को स्कूल नहीं भेजेगा या स्कूल छुड़वा देगा, दंड का भागी होगा. इसका पालन इतना कड़ाई से हो रहा है कि सौ फीसद लड़कियां दसवीं तक पढ़ी है या पढ़ रही है.

Popular posts from this blog

मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…