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मदहोशी में, होश है कम कम


ये ट्राईटन मॉल के हॉयपर सिटी स्टोर के अधबीच का भाग था. मैं वस्तुओं की प्रदर्शनी में अपने लालच और जरुरत का तौल भाव कर रहा था. रौशनी के इस बाज़ार में चीज़ों के आवरण बेहद चुस्त और सम्मोहक थे. अचानक मेरे पीछे से एक नौजवान आवाज़ आई. " मैं, ओलिव आयल के बिना खाना नहीं खा सकता हूँ." मैंने मुड़ कर उस आदमी को देखा. गठीला बदन चुस्त जींस और गोल गले का टी शर्ट पहने हुए था. उसने ये बात अपने साथ चल रही, एक महिला से कही थी. 

नौजवान की कही हुई इस बात पर अनेक तरह की प्रतिक्रियाएं की जा सकती थी. सबसे बेहतर प्रतिक्रिया होती कि इग्नोर कर दिया जाता लेकिन मेरे मन में पहला ख़याल आया कि इस आदमी को शाम का खाना भी मिलेगा या नहीं. अपने छोटे भाई की तरफ देखते हुए. मैंने कहा. "भाई शाम का खाना तय है?" भाई ने कहा कि हम अच्छे खाने की उम्मीद कर सकते हैं. मुझे ख़ुशी हुई कि अभी हम भ्रम में नहीं जी रहे हैं. 

ओलिव आयल के बिना खाना न खा सकने वाले उस आदमी को अभी मालूम नहीं है कि कई बार खाना सामने रखा होता है मगर ज़िन्दगी उसे खाने की इजाज़त नहीं देती. 
* * *

रामनिवास बाग़, जयपुर शहर के बीच स्थित है. अलबर्ट हॉल, जिसे सेंट्रल म्यूजियम कहा जाता है और चिड़ियाघर को मिलाकर कोई पचहत्तर एकड़ में फैली यह ज़मीन सुकून की जगह है. शहर पर ट्रेफिक का दबाव इतना है कि इस बाग़ के बीच से यातायात निर्बाध चलता रहता है. दाना चुगते हुए कबूतरों के झुण्ड को उड़ा कर उनके बीच फोटो खिंचवाने की तवील परम्परा को आगे बढ़ा रहे लोगों को देखता हूँ. क्या सब लोग जानते हैं कि एक दिन कबूतर की तरह उड़ जाना है और कुछ सालों के लिए हमारी तस्वीर यादगार बन कर बची रहेगी. 

मगर ऐसा नहीं है, ये सिर्फ़ रोज़मर्रा की उदास छतरी को भेद कर खुले आसमान में उड़ जाने की चाह है. 
* * *

बाग़ से बाहर जाते हुए रास्ते के दायीं तरफ वाली फुटपाथ के पास ट्राई सायकिल पर एक विकलांग गुटखा और तम्बाकू मिश्रित उत्पाद बेच रहा था. उसकी मुड़ी हुई लकवाग्रस्त टांगों से बेख़बर और शातिराना मुस्कान से रूबरू दो आदमी अचरज भरे चेहरे से जुगलबंदी कर रहे थे. अचानक मेरी नज़र एक और आदमी पर पड़ी जिसने अपनी गोदी के बीच में एक पोलीथिन रखी थी. उसमें कुछ खाने की चीज़ें थी. उसने मुट्ठी भर कर उनको अपने मुंह में ऐसे रखा कि कोई चोरी का काम कर रहा हो. 

हम सब ईमानदार हैं. दूसरों की चोरी पकड़ लेना चाहते हैं. मैंने भी पल भर किसी के इंतजार का ड्रामा किया ताकि देख सकूँ कि वह क्या खा रहा है. उस आदमी के पास खाने को सत्तू जैसा कुछ था. वह इस भोजन को सार्वजनिक स्थान पर पूर्ण निजता के साथ कर रहा था. उसके पास विलासिता का अहंकार नहीं था. उसके पास कमतर खाने की शर्म या फिर ज़िन्दगी की लाचारी को छुपा लेने का इरादा था. 

दुआ कि जीवन भर सुख की रोटी नसीब होती रहे. खाने को भले ही कमतर चीज़ें नसीब हों मगर आदमी के पास भ्रम की दुनिया नहीं होनी चाहिए. याद आया कि किसी ट्रक पर लिखा था "ख़बर नहीं है पल की, बातें करता है कल की." हालाँकि ख़बर में ख के नीचे नुक्ता नहीं था. यूं भी हर एक ज़िन्दगी में कुछ न कुछ अधूरा होता ही है. 
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[Image : Kabir, Tanya and Mahendra at Ramnivas garden, Jaipur.]

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…