November 16, 2012

कहाँ है वो माफ़ीनामा



एक कपूर की गोली थी।

पिछली सर्दियों की किसी शाम अचानक उसकी खुशबू आई। किसी पैरहन से छिटकी होगी या किसी सन्दूक के नीचे से लुढ़क कर मेरे पास आ गयी हो। उसका रंग सफ़ेद था। इतना सफ़ेद कि उसे ज़माना सदियों से कपूरी सफ़ेद कहता था। उसका चेहरा चाँद जैसा गोल था, ठीक चाँद जैसा। मैं कई बार खो जाता था कि उसकी आँखें कहाँ और सफ़ेद होठ कहाँ पर हैं। उसके गोल चहरे पर कुछ लटें कभी आ ठहरती होगी बेसबब, ऐसा मैं सोचा करता था। उसकी हंसी में घुल जाती होंगी बंद कमरे की उदासियाँ ये खयाल भी कभी कभी आ जाता था।

एक शाम ऐसे ही छत पर बैठा शराब पी रहा था कि अचानक से कोई तीखा अहसास जीभ के एक किनारे पर ज़रा देर ठहर कर चला गया। मुझे लगा कि उसके मुंह में कोई चोर दांत है, जिसने काट लिया है प्यार से। ये मगर एक बेहद कोरा चिट्टा खयाल था जैसा कि उसका रंग था। वो जो एक कपूर की गोली थी। ऐसे ही एक बार मैंने किसी चीज़ को अलमारी से उतारने के लिए हाथ ऊपर किए तो वही खुशबू चारों और बिखर गयी। कपूर की खुशबू।

दिल्ली गया था। शहर के बीच एक खूबसूरत जगह पर साफ सुथरे कमरे में शाम होने को थी कि मैंने अपना स्वेटर बाहर निकाला। इसलिए नहीं कि ठंड थी, इसलिए कि पहन कर देखूँ कैसा दिखेगा। स्वेटर बहुत नया नहीं है, इसे पिछली सर्दियों से पहले खरीदा था। दो एक बार पहना होगा कि रेगिस्तान की सर्दियाँ बिना अलविदा कहे चली गयी थी। इस बार खोला तो लगा कि कपूर की खुशबू आने लगी है। ऐसे ही, जैसे कोई प्रिय के जाने के बाद लौट आया हो घर में।

मैंने देखा कि सामने की कुर्सी भर गयी है उसी सूरत से, सफ़ेद रंग की गोल सूरत। आप यकीन मानिए कि उसने बचाए रखा खुद को, सफ़ेद चोर दांतों को, गोल चेहरे को और न देखी जा सकने वाली आत्मा को। कि वह डूब नहीं सकती थी किसी रंग में, घुल नहीं सकती थी उसकी खुशबू किसी और रंग में कि वह नहीं थी फटे पुराने वाहियात किस्म के ऊनी कपड़े के लिए। मैंने सोचा कि अगर मेरे पास इस वक़्त कोई बारूद होता तो भी मैं खड़ा होता इस कपूर की गोली के पक्ष में... मैं जला लेता अपनी अंगुलियाँ मगर कोई आग इस कपूर को छू नहीं सकती थी।

आज की रात चाँद कुछ इस तरह खिला है जैसे वह कपूर की गोली थी। मैंने अभी पी नहीं है शराब और मैं ग्रामर का मास्टर भी नहीं हूँ वरना हो सकता है कि मैं मार देता खुद को गोली इस बात के लिए कि मैंने ही लिखा है, एक कपूर की गोली थी। मैं खुद की कनपटी पर रखता रिवाल्वर और कहता कि अभी बात खत्म नहीं हुई है इसलिए लिखो एक कपूर की गोली है। जबकि ऐसा है नहीं।


कहाँ है वो माफ़ीनामा जिस पर लिखा है कि मैंने तुमसे प्यार करने की गलती की है, मुझे मुआफ़ कर दिया जाए। लाओ, मैं लिख दूँ अपने नाम का पहला अक्षर...
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[ Painting image courtesy : Karla Aron]

ये पोस्ट कल की रात लिखी थी। पीठ में दर्द भरा था इसलिए लेपटोप को छोड़ दिया था। आज पोस्ट कर रहा हूँ मगर कहाँ कायम रहती है सब चीज़ें? देखो चाँद भी कल से बेहतर है। 

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