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साहेब, इंडिया ले चलो


"जब आप मीरपुर खास के भिटाई कस्बे में पहुंचेंगे तो चौराहे के ठीक बीच में एक तम्बूरा आपका स्वागत करेगा। तंबूरे की विशाल प्रतिमा वाली इस जगह का नाम भी तम्बूरा चौराहा है।" मुझसे ऐसा कहते हुये संगीत के साधक नरसिंह बाकोलिया के चेहरे पर तंबूरे की विशाल प्रतिमा से भी बड़ा सुख उतर आया। 

"मैं मई में पाकिस्तान गया था। शंभू नाथ जी के साथ पंद्रह दिन मीरपुर खास के क़स्बों में उनके शिष्यों की आवभगत में रहने के बाद एक शाम संगीत की बात चल पड़ी। ठीक उसी शाम से उन महफिलों का दौर शुरू हुआ जिनमें भाषा और सियासत की सरहदों के निशान भूल गए। अगले पंद्रह दिन मेरा मिलना ऐसे लाजवाब संगीतकारों और रसिकों से हुआ कि मुझे दिन और रात छोटे जान पड़ने लगे। वे गरीब लोग हैं। मगर बहुत सम्मान देते हैं। इतना सम्मान मैंने कभी अपने घर आए प्रिय से प्रिय को न दिया होगा। उनका जीवन बहुत कठिन है। वहाँ अब भी बरसों पुराने घरों जैसे घर हैं। वैसी ही रेत उड़ती है। वैसे ही घरों में साग छोंके जाने की खुशबू आती है। उनका पहनावा मगर अलग है कि वे सलवार कुर्ता और सर पर टोपी पहनते हैं।

किसी काम में डूबे हुये आदमी या औरत को इंडिया नाम किसी ज़ुबान से सुनाई दे जाए तो सब कुछ भूल कर उसी तरफ चल पड़ते हैं जहां से इंडिया नाम की आवाज़ आई थी। मेरा कोई परिचय करवाता कि ये इंडिया से आए हैं तो सब मुझे आँखों में भर लेने और जिस मुनासिब तरीके से प्यार का इजहार किया जा सके उसी में लग जाते। मेरी आँखें भर आती। मैं सोचने लगता कि आदमी के दुख और उसकी उम्मीदें किस तरह हिलोरें मारती रहती है। मैं हर दोपहर और रात को किसी के घर संगीत महफिल में होता। गरीबों की लंबी कतारों में कुछ एक रईस लोगों के इक्के दुक्के घर भी हैं मगर जो प्यार मिलता है उसमें रत्ती राई का भी अंतर नहीं आता।

पंडित तारचंद, भिटाई कस्बे में रहते हैं। सत्तर साल की उम्र के ये शख्स उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ साहब के शिष्य हैं। संगीत में ही उम्र गुज़ार दी है। आपने शास्त्रीय संगीत की गायिकी के उन पहलुओं और सलीकों को ज़िंदा रखे हुये हैं जिनके बारे में हम कभी ख़याल भी नहीं कर सकते हैं। तारचंद जी ने मेरे साथ मिल कर अपनी गायिकी से रातों को सुबहों में बदल दिया। उनको लोग पंडित तारचंद कहते हैं लेकिन पंडित जी ज़रा सा वक़्त मिलते ही बड़ी नाउम्मीदी से कहते हैं "नरसिंह, मुझे अपने साथ इंडिया ले चलो" उनकी आँखों में कोई खोयी हुई तस्वीर उतर आती है।

नब्बे साल की उम्र के गायक सोम जी भाटिया से भी मैं मिल सका। वे इस उम्र में भी पांचवे सुर पर गा लेते हैं। ऐसा गाना कि जैसे कोई तड़पती हुई आत्मा की पुकार हो। उनकी आवाज़ दबे कुचले गरीब हिंदुओं और मुसलमानों के घरों में उजाला और उम्मीद भरती हुई सब दिशाओं में कूच कर जाती है। वे बेइंतिहा खुश होते हैं इंडिया का नाम सुन कर। कहते हैं ज़िंदगी एक ही लिखी थी और उसके भी नब्बे साल ऐसी जगह चले गए हैं... फिर ज़रा रुक कर अपने बच्चों की ओर आँखें रखते हुये मुझसे कहते हैं। इंडिया ले चलो साहिब, जान वहीं छूटे तो सुकून हो। कच्चे पक्के घरों में ज़िंदगी अपने निचले पायदान पर मगर किसी उम्मीद का दामन थामे हुये चलती रहती है।
अमरकोट में साठ फीसद हिन्दू हैं। बड़ा जिला है। एक तरफ आमों के बाग हैं एक तरफ रेत के टीले। बाज़ार ऐसे जैसे किसी गाँव की हाट में आ गए हों। सड़कें, रास्ते और गलियाँ अब भी किसी पुराने जमाने की धूल को फाँकती हुई। मगर मैंने देखा कि कबीर के भजन हर घर में बजते हैं। कबीर को सुनना पाकिस्तान में भी सुकून की बात है। इतना ही नहीं वहाँ एक शफ़ी फ़कीर नाम के ख्यात गायक हैं, वे कबीर को गाते हैं और वह भी प्रहलाद सिंह टिप्पणिया और साथियों की कॉपी करते हुये, ठीक उसी अंदाज़ में।"

मैंने पूछा- कैसा है उन लोगों का जीवन? 
नरसिंह बाकोलिया के चहरे पर कोई खुशी न आई। उनका चेहरा अचानक से सघन उदासी से भर आया। जैसे कहना चाहते हों कि हम बड़े भाग्य वाले हैं जो इंडिया में पैदा हुये। हमने आज़ादी की साँसे ली। हमने जिंदगी को सुख से जीते हुये कबीर को याद किया। जबकि वे कबीर को गा रहे हैं किसी उम्मीद और किसी संतोष के लिए। मैंने कहा नरसिंह आप मेरे प्रिय गायक हैं। आज लोक संगीत की हमारी राजस्थानी भाषा को ज़रा भूल कर मेरे कुछ दोस्तों के लिए कबीर को गा दीजिये। 


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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…