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और दर्द है जैसे...


मौसम की नई कोंपलें फूटती रहती हैं और मैं नए दिनों को उदासी की तह देता जाता हूँ। खुशी की वजहों के दिन दोहराए नहीं जा सकते हैं। वे दिन अपने अनूठेपन के साथ कुछ इस तरह आते हैं कि उनकी नकल कहीं नहीं मिलती। वे जाते भी इस तरह हैं जैसे बहुत देर से अटका हुआ कोई सिंदूरी रंग अचानक से टूट कर गिर गया हो पहाड़ के पीछे। किसी ने कहा कि तुम ज़िंदगी लेकर आए हो। मुझे लगा कि यही सबसे झूठी बात है कि मैं अपनी समझ से कुछ लेकर आता तो क्या एसी चीज़ लाता? मुझे इतना मालूम होता कि ज़िंदगी में इस तरह का कारोबार है तो कौन आता इस दरवाज़े? मैं फिर अपनी छत पर उतर रहे अंधेरे और उजाले के खेल को देखता हुआ सोचता हूँ कि चल फिर मुकम्मल हुआ एक दिवस। एक और दिन न जीने की तोहमत से बचे। 

एक दिन अचानक से मैंने अपनी हथेली को देखा। उसमें कुछ नहीं था। एक दिन स्टुडियो में किसी आरजे ने एक मेहमान विदुषी से कहा- "मेम मेरा हाथ भी देखिये" उन्होने उस नवयुवती का हाथ अपने हाथ में लेते हुये कहा- "इन हाथों से जैसा काम करोगे, भाग्य वैसा ही हो जाएगा" मैंने इस याद की रोशनी में पाया कि मैं उसी से घिरा हुआ हूँ जिसे जीने की कामना करता हूँ। मुझे तनहाई प्रिय है, तो वह है इस वक़्त। मुझे प्रेम चाहिए, तो बेचैनी ने थाम रखा है बाजू, मुझे सुकून चाहिए तो देखो आसमान के तारों की ओर। तुम्हें साफ सुथरा दृश्य मिला है। तुम एक दिन इस मिट्टी में मिल जाओ तब तक के लिए खुद को इसी दृश्य के हवाले कर दो। 

किसी ने पुकारा आसमान से- "फरेबी, ओ फरेबी... कैसा चल रहा है तुम्हारा काम? क्या सचमुच लिख पाओगे कभी अपनी आत्मकथा जिसका शीर्षक तुमने सोचा है, एक ऐसा आदमी जो खुद को धोखे देने की बीमारी से पीड़ित था" उसकी आवाज़ को भूल कर, मैंने सोचा कि कितनी बातें हमारे साथ चलती है? वो साल दो हज़ार दस के जून महीने की रात थी। घबराया हुआ बिस्तर की तहों के बारे में सोचता गरमी में आती हवा को जी रहा था। उस रात कई बीते हुये सालों का काफिला मुझे घेर कर खड़ा रहा। एक निरीह आदमी, याद के नुकीले भालों से घिरा हुआ। हरे दरख्तों के टूटने जैसा हाल कि कोई आवाज़ भी नहीं और दर्द का कोई हिसाब भी नहीं। उन्हीं दिनों के जैसे दिन लौट लौट कर आते हैं। इन दिनों मेरे साथ चल रहे हैं। 

तुम इसे जाने क्या समझो और मैं इसे जाने क्या समझता हूँ। हाल कुछ ऐसा है कि पिछले एक साल से मेरी पीठ के दायें हिस्से में खूब दर्द रहता है। इस दर्द की जड़ें हैं। इनमें सलीके से आरोहण होता है। कार में बैठे सामने देखते हुये, लेपटोप की स्क्रीन, किसी को सुनने के लिए उसका रुख किए हुये, ये दर्द शुरू हो जाता है। ये पीठ से होता कंधों तक आता। इसके बाद गरदन के दायें हिस्से को और फिर मेरे चेहरे के सामने वाले भाग को जकड़ लेता है। जैसे किसी विषधर ने डस लिया है। मुझे लगता है कि दायाँ गाल और आँख ज़हर से भर गए हैं। एक डॉक्टर दोस्त ने कहा कि गरदन में दर्द हो और रक्तचाप असामान्य हो यानि पसीना भी आने लगे और घबराहट भी हो तो तुरंत अस्पताल का रुख कर लेना चाहिए। मैंने कहा कि क्या ऐसे में दिल धोखा दे देगा? उन्होने कहा कि नहीं ये धोखा देने से पहले के लक्षण हैं। बाकी कुछ तय भी नहीं है.... मैं मुस्कुराया कि तय है कि एक दिन जीवन को नष्ट हो कर पूर्णता को प्राप्त हो जाना है। इसलिए दिल धोखा दे उससे पहले मैं खुद को धोखे देने के खेल में लगे रहना चाहता हूँ। चिंताओं से अधिक प्रिय है, महबूब की आँखें। लेकिन मैं इस दर्द को किस पहलू में रखूँ कि ज़िंदगी संभल कर चलती रहे। 

न लड़ो ऐसे, चुप बैठो कि सांसें बड़ी कम है।
* * *
[तस्वीर : शहर जिसे दिल्ली कहते हैं की एक सड़क] 

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…