Skip to main content

मेरे पतन के कारण


ऐसा भी कहीं होता है कि जो खिलता हो उसका बीज न हो। इसलिए प्रेम और दुख के भी बीज होते हैं। उनको भी चाहिए होता होगा कोई मौसम अपने रूपायन के लिए। मैंने एक ग्रीन हाउस बना रखा है। इसमें फूल रही पौध को लेकर संशय है कि बोता तो मैं प्रेम हूँ मगर उगता सिर्फ दुख ही है। इस पैदावार के सिलसिले को, इस काम को कुछ मुल्तवी किया जाने का सोचा है। इस फसल के ये कुछ ताज़ा फूल हैं।


मैंने कहा कि हम दो अलग अलग ही दिखते हैं सुंदर
कि दो सुंदर रंग मिल कर बन जाते हैं एक काला रंग।

मैंने सोचा कि उसने जवाब में कहा है
मैं बसा लूँगी इस रंग को अपनी आँखों में
मगर तब तक बावर्ची समेट लेता खाना दोपहर का
इसलिए वह चली गयी बिना कुछ कहे।
* * *

फासला था बहुत
और लोग भी कहते जाने क्या क्या

इसलिए उसने कहा कि
आदमी का सबसे अच्छा आविष्कार है, डिवाइडर
तुम उस तरफ चलो, मैं इस तरफ चलूँगी।
* * *

उसने कहा कि प्रेम रूह से होता है
इसी बात के जवाब में मैंने नहीं दिया सिर्फ एक मेसेज का जवाब
वो शायद रो पड़ी, न जाओ छोड़ कर।

मैंने सोचा कि कहाँ गए कृष्ण, राधा क्या हुई
मगर उसे न होगी कभी खबर मेरी तड़प की।

* * *

उसके पेट पर बनी हुई है कैसी धारियाँ
उसकी पीठ पर क्या बचा है कोई निशान चोट का
उसे देखो अगर पीठ के बल तो कैसा दिखता है
उसे किसी ने नोच लिया था कहाँ से?

मैंने इस सब को दबा दिया है अपनी याद के तहखाने में
जगतपुरा में ज्ञान विहार के सामने बने हुये
ज़ेबरा क्रॉसिंग को भूल जाने के लिए, कर सकता हूँ कुछ भी।
* * *

मैं गधा हूँ
जिसे मालूम है कि किस तरह किया जाता है
लेपटोप के की बोर्ड से टाइप।

मेरे गधा होने पर शक सिर्फ इसलिए है
कि एक गधा कैसे दुखा सकता है किसी का दिल कुछ ही शब्दों से।
* * *

और आप सब लोग
न सोचना मेरे महबूब के बारे में कुछ बुरा

कि वह खुद है दुख का इक दरिया है
मैं भी उसी से पाता हूँ रोशनी दर्द की।
* * *

रावण के पतन के बारे में हो सकते हैं असंख्य मत
उसका छद्म रूप धारण कर धर्म को अपमानित करना
शिव के श्रेष्ठ भक्त का घमंड से भर जाना
अपने उदार और विवेकी भाई के अधिकारों को हड़प जाना
पराई स्त्री को विवाह जैसे अतुल्य और श्रेयस्कर बंधन में बांधने का सपन देखना
युद्ध में अपने निर्दोष परिजनों को आगे कर देना
अपने भीतर छिपे जीवन कलश पर मूढ़ता से विश्वास करना।

मेरे पतन के कारण जब भी कोई गिनाए
तुम उदास मत होना
मैंने खुद ही चुना था रास्ता प्रेम करते हुये फरेब के हाथों मारे जाना।
* * *

Popular posts from this blog

पतनशील पत्नियों के नोट्स

फरवरी का पहला सप्ताह जा चुका है मगर कुछ रोज़ पहले फिर से पहाड़ों पर बर्फ गिरी तो रेगिस्तान में भी ठण्ड बनी हुई है. रातें बेहिसाब ठंडी हैं. दिन बेहद सख्त हैं. कमरों में बैठे रहो रजाई-स्वेटर सब चाहिए. खुली धूप के लिए बाहर आ बैठो तो इस तरह की चुभन कि सबकुछ उतार कर फेंक दो. रेगिस्तान की फितरत ने ऐसा बना दिया है कि ज्यादा कपड़े अच्छे नहीं लगते. इसी के चलते पिछले एक महीने से जुकाम जा नहीं रहा. मैं बाहर वार्मर या स्वेटर के ऊपर कोट पहनता हूँ और घर में आते ही सबको उतार फेंकता हूँ. एक टी और बैगी पतलून में फिरता रहता हूँ. याद रहता है कि ठण्ड है मगर इस याद पर ज़ोर नहीं चलता. नतीजा बदन दर्द और कुत्ता खांसी. 
कल दोपहर छत पर घनी धूप थी. चारपाई को आधी छाया, आधी धूप में डाले हुए किताब पढने लगा. शादियों का एक मुहूर्त जा चुका है. संस्कारी लोगों ने अपनी छतों से डैक उतार लिए हैं. सस्ते फ़िल्मी और मारवाड़ी गीतों की कर्कश आवाज़ हाईबर्नेशन में चली गयी है. मैं इस शांति में पीले रंग के कवर वाली किताब अपने साथ लिए था. नीलिमा चौहान के नोट्स का संग्रह है. पतनशील पत्नियों के नोट्स. 
तेज़ धूप में पैरों पर सुइयां सी चुभती …

तुम्हारे सिवा कोई अपना नहीं है

वे अलसाई नन्हीं आँखों के हैरत से जागने के दिन थे. बीएसएफ स्कूल जाने के लिए वर्दी पहने हुए संतरियों को पार करना होता था. उन संतरियों को नर्सरी के बच्चों पर बहुत प्यार आता था. वे अपने गाँव से बहुत दूर इस रेगिस्तान में रह रहे होते थे. वे हरपल अपने बच्चों और परिवार से मिल लेने का ख़्वाब देखते रहे होंगे. वे कभी कभी झुक कर मेरे गालों को छू लेते थे. उन अजनबियों ने ये अहसास दिया कि छुअन की एक भाषा होती है. जिससे भी प्यार करोगे, वह आपका हो जायेगा. लेकिन जिनको गुरु कहा जाता रहा है, उन्होंने मुझे सिखाया कि किस तरह आदमी को अपने ही जैसों को पछाड़ कर आगे निकल जाना है. 
मुझे आज सुबह से फुर्सत है. मैं अपने बिस्तर पर पड़ा हुआ सूफी संगीत सुन रहा हूँ. इससे पहले एक दोस्त का शेयर किया हुआ गीत सुन रहा था. क्यूँ ये जुनूं है, क्या आरज़ू है... इसे सुनते हुए, मुझे बहुत सारे चेहरे याद आ रहे हैं. तर्क ए ताअल्लुक के तज़करे भी याद आ रहे हैं. मैं अपनी ज़िंदगी से किसी को मगर भुलाना नहीं चाहता हूँ. उनको तो हरगिज़ नहीं जिन्होंने मुझे रास्ते के सबब समझाये. नौवीं कक्षा के सर्दियों वाले दिन थे. शाम हुई ही थी कि एक तनहा द…

एक लड़की की कहानी

कहानी कहना एक अच्छा काम है. मैं कुछ सालों तक लगातार ड्राफ्ट तैयार करता रहा फिर अचानक से सिलसिला रुक गया और मैं अपने जाती मामलों में उलझ कर कुछ बेवजह की बातें लिखने लगा. मुझे यकीन है कि मैं एक दिन अच्छी कहानी लिखने लगूंगा... मेरा समय लौट आएगा.

कुछ एक मित्रों के अनुरोध पर अपनी आवाज़ में एक कहानी यहाँ टांग रहा हूँ. इस कहानी को रिकार्ड करने के दौरान किसी भी इफेक्ट का उपयोग नहीं किया है कि आवाज़ अपने आप में एक इफेक्ट होती है... खैर किसी भी तरह का बैकग्राउंड म्यूजिक नहीं है, सिर्फ आवाज़...

बिना कोई और बात किये, लीजिए सुनिए.